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सामान्य अध्ययन-3: विज्ञान और प्रौद्योगिकी में भारतीयों की उपलब्धियाँ; देशज रूप से प्रौद्योगिकी का विकास और नई प्रौद्योगिकी का विकास; सूचना प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में जागरूकता।

संदर्भ: नीति (NITI) आयोग ने वर्ष 2035 तक 120-150 बिलियन अमेरिकी डॉलर का सेमीकंडक्टर मूल्य श्रृंखला  बनाने और भारत को वैश्विक सेमीकंडक्टर इकोसिस्टम में एक अनिवार्य दिग्गज के रूप में स्थापित करने के उद्देश्य से भारत का पहला व्यापक 10-वर्षीय रोडमैप, “भारत के सेमीकंडक्टर उद्योग का भविष्य” (Future of India’s Semiconductor Industry) जारी किया।

रोडमैप के मुख्य बिंदु

  • भारत को अब क्यों कार्रवाई करनी चाहिए?
    • भारत की सेमीकंडक्टर संबंधी लगभग 90-95% मांग को आयातों के माध्यम से पूरा किया जाता है।
    • आयातित चिप्स पर निर्भरता रक्षा, हवाई क्षेत्र और महत्वपूर्ण अवसंरचना प्रणालियों के लिए रणनीतिक जोखिम उत्पन्न करती है।
    • भारत ने वित्तीय वर्ष 2017-2025 के दौरान सेमीकंडक्टर आयात पर लगभग 150 बिलियन अमेरिकी डॉलर खर्च किए, जिसके परिणामस्वरूप बड़े पैमाने पर विदेशी मुद्रा का बहिर्वाह हुआ।
    • भविष्य की प्रौद्योगिकियों, जैसे कि 5G/6G उपकरणों को अधिक किफायती और सुलभ बनाने के लिए घरेलू सेमीकंडक्टर उत्पादन अत्यंत आवश्यक है।
    • वैश्विक आपूर्ति-श्रृंखला विविधीकरण और ‘चाइना-प्लस-वन’ रणनीति ने भारत के लिए सेमीकंडक्टर मूल्य श्रृंखला में प्रवेश करने के एक सीमित परन्तु अत्यंत महत्वपूर्ण अवसर का सृजन किया है।
  • भारत का सेमीकंडक्टर अवसर:
    • वैश्विक सेमीकंडक्टर बाजार के 2035 तक 1.5 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर से अधिक होने की उम्मीद है।
    • भारत की सेमीकंडक्टर मांग 2035 तक लगभग 200 बिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुँचने का अनुमान है।
    • वर्तमान में, भारत की सेमीकंडक्टर संबंधी लगभग 90-95% मांग को आयातों के माध्यम से पूरा किया जाता है।
    • वैश्विक आपूर्ति-श्रृंखला पुनर्संरेखण और विश्वसनीय विनिर्माण स्थलों की खोज भारत को मूल्य श्रृंखला में अपनी स्थिति मजबूत करने का एक ऐतिहासिक अवसर प्रदान करती है।
  • विज़न 2035: अनुकरणीय नहीं, अपरिहार्य बनना
    • भारत का लक्ष्य 2035 तक वैश्विक सेमीकंडक्टर बाजार का 10-13% हिस्सा हासिल करना है।
    • इस रोडमैप का उद्देश्य स्थानीय डिज़ाइन, पैकेजिंग, सामग्री और विनिर्माण इकोसिस्टम के माध्यम से सेमीकंडक्टर मूल्य संवर्धन का 55-70% हिस्सा भारत के भीतर ही बनाए रखना है।
    • इस रोडमैप के तहत 2035 तक 120-150 बिलियन अमेरिकी डॉलर के सेमीकंडक्टर मूल्य श्रृंखला के निर्माण का लक्ष्य रखा गया है।
    • यह रणनीति तीन स्तंभों पर आधारित है:
      • रणनीतिक आत्मनिर्भरता
      • सुदृढ़ इकोसिस्टम
      • वैश्विक अपरिहार्यता
    • इसमें सेमीकंडक्टर उद्योग के प्रत्येक खंड में सीधे प्रतिस्पर्धा करने के बजाय उन क्षेत्रों में नेतृत्व स्थापित करने पर बल दिया गया है जहाँ भारत को संरचनात्मक लाभ (प्राप्त हैं।
    • भारत का लक्ष्य 2030 तक चिप उत्पादन में 15-25% आत्मनिर्भरता प्राप्त करना है।
    • वर्ष 2035 तक इस आत्मनिर्भरता को बढ़ाकर 35-50% करने की उम्मीद है।
  • उन्नत पैकेजिंग और OSAT में नेतृत्व:
    • भारत का लक्ष्य उन्नत पैकेजिंग और OSAT (आउटसोर्स सेमीकंडक्टर असेंबली एंड टेस्टिंग) के लिए शीर्ष तीन वैश्विक स्थलों में से एक के रूप में उभरना है।
    • इसके तहत केंद्रित क्षेत्रों में चिपलेट्स, 2.5D और 3D एकीकरण, फैन-आउट वेफर लेवल पैकेजिंग (FOWLP), पैनल-लेवल पैकेजिंग (PLP) और सिस्टम-इन-पैकेज (SiP) प्रौद्योगिकियां शामिल हैं।
    • उभरते हुए “मोर-दैन-मूर” (More-than-Moore) युग में उन्नत पैकेजिंग को एक बड़े अवसर के रूप में चिह्नित किया गया है।
  • यौगिक और वाइड-बैंडगैप सेमीकंडक्टर्स पर ध्यान:
    • इस रोडमैप में सिलिकॉन कार्बाइड (SiC) और गैलियम नाइट्राइड (GaN) प्रौद्योगिकियों में नेतृत्व हासिल करने को प्राथमिकता दी गई है।
    • भारत का लक्ष्य वाइड-बैंडगैप सेमीकंडक्टर सामग्रियों का एक प्रमुख आपूर्तिकर्ता बनना है।
    • ये प्रौद्योगिकियां इलेक्ट्रिक वाहनों, नवीकरणीय ऊर्जा प्रणालियों, पावर इलेक्ट्रॉनिक्स, दूरसंचार अवसंरचना (टेलीकॉम इंफ्रास्ट्रक्चर) और रक्षा अनुप्रयोगों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
  • सेमीकंडक्टर डिज़ाइन क्षमताओं का सुदृढ़ीकरण:
    • डिज़ाइन लागत को कम करने तथा स्टार्टअप्स और शोधकर्ताओं के लिए पहुंच में सुधार करने के लिए इलेक्ट्रॉनिक डिज़ाइन ऑटोमेशन (EDA) टूल्स हेतु श्रेणीबद्ध (टियर-आधारित) सब्सिडी का प्रस्ताव किया गया है।
    • एजेंटिक एआई टूल्स और स्वचालन के माध्यम से चिप-डिज़ाइन चक्र को छोटा करने के लिए एक एआई-सक्षम सेमीकंडक्टर इंजीनियरिंग मिशन  का प्रस्ताव है।
    • इस रोडमैप के तहत 2035 तक 100 से अधिक उन्नत सेमीकंडक्टर डिज़ाइन आईपी के निर्माण का लक्ष्य रखा गया है।
    • प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में एआई-नेटिव चिप डिज़ाइन, हाई-परफॉर्मेंस कंप्यूटिंग, क्वांटम कंप्यूटिंग, सिस्टम आर्किटेक्चर और चिपलेट-आधारित डिज़ाइन शामिल हैं।
    • इसका उद्देश्य एक डिज़ाइन-सेवा केंद्र से आगे बढ़कर वैश्विक रूप से प्रतिस्पर्धी सेमीकंडक्टर आईपी के निर्माता के रूप में विकसित होना है।
  • घरेलू विनिर्माण क्षमता का निर्माण:
    • वेफर फैब्रिकेशन के प्रयास मुख्य रूप से 28 nm और 65 nm के बीच के परिपक्व लॉजिक नोड्स पर केंद्रित होंगे।
    • ऑटोमोटिव, आईओटी (IoT) और औद्योगिक अनुप्रयोगों में उपयोग की जाने वाली एनालॉग, मिक्स्ड-सिग्नल और पावर-मैनेजमेंट चिप्स पर विशेष बल दिया गया है।
    • इस रूपरेखा में सेमीकंडक्टर फैब्रिकेशन क्लस्टर्स के लिए विश्वसनीय एवं समर्पित विद्युत आपूर्ति सुनिश्चित करने हेतु छोटे मॉड्यूलर रिएक्टरों (SMRs) के उपयोग की संभावना तलाशने की सिफारिश की गई है।
  • भारत सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) 2.0 के साथ संरेखण:
    • यह रोडमैप केंद्रीय बजट 2026 में घोषित भारत सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) 2.0 के उद्देश्यों का पूरक है।
    • यह भारत के इकोसिस्टम के ‘निर्माण’ से इकोसिस्टम के ‘गहन सुदृढ़ीकरण’ (डीपनिंग) की ओर संक्रमण को चिह्नित करता है।
    • इसके तहत डिज़ाइन, विनिर्माण, पैकेजिंग, सामग्री, प्रतिभा विकास, अनुसंधान एवं नवाचार तथा वैश्विक साझेदारियों पर अधिक बल दिया गया है।
  • पहचानी गईं प्रमुख चुनौतियाँ:
    • बढ़ती तकनीकी जटिलता के कारण सेमीकंडक्टर डिज़ाइन और विनिर्माण उत्तरोत्तर कठिन होता जा रहा है।
    • भारत को फैब्रिकेशन, पैकेजिंग और उन्नत अनुसंधान के लिए आवश्यक विशिष्ट प्रतिभा की कमी का सामना करना पड़ रहा है।
    • सेमीकंडक्टर विनिर्माण के लिए अत्यधिक पूंजी निवेश, ऊर्जा संसाधनों और जल की उपलब्धता की आवश्यकता होती है।
    • वैश्विक आपूर्ति श्रृंखलाओं के भीतर भारत-निर्मित चिप्स के लिए विश्वास और स्वीकृति स्थापित करने हेतु निरंतर प्रयासों की आवश्यकता होगी।
    • लंबी परिपक्वता अवधि और प्रतिफल में देरी सेमीकंडक्टर निवेश से जुड़े वित्तीय जोखिमों को बढ़ा देते हैं।
  • रोडमैप के प्रमुख समाधान:
    • अग्रणी सेमीकंडक्टर अनुसंधान एवं विकास (R&D) में तेजी लाने के लिए एक राष्ट्रीय फ्रंटियर सेमीकंडक्टर अनुसंधान कार्यक्रम की स्थापना करना।
    • स्वदेशी डिज़ाइन क्षमताओं को सुदृढ़ करने के लिए एक राष्ट्रीय डिज़ाइन और पैकेजिंग सह-डिज़ाइन मंच  का निर्माण करना।
    • सेमीकंडक्टर क्षेत्र के लिए पूर्णतः तैयार कार्यबल तैयार करने के उद्देश्य से एक राष्ट्रीय फैब अकादमी का विकास करना।
    • दीर्घकालिक निवेश जुटाने के लिए एक राष्ट्रीय सेमीकंडक्टर पूंजी ढांचा  स्थापित करना।
    • सेमीकंडक्टर डिज़ाइन, अनुसंधान और उन्नत पैकेजिंग में संप्रभु क्षमताएं विकसित करना।
    • रणनीतिक और उच्च-मूल्य वाले खंडों पर केंद्रित एक सुदृढ़ घरेलू विनिर्माण इकोसिस्टम का विकास करना।
    • तकनीशियनों से लेकर समाधान आर्किटेक्ट्स तक का एक पूर्ण सेमीकंडक्टर प्रतिभा पिरामिड तैयार करना।
    • सरकारी सहायता और निजी क्षेत्र की भागीदारी के माध्यम से दीर्घकालिक पूंजी जुटाना।
    • प्रौद्योगिकी अधिग्रहण और इकोसिस्टम के विकास में तेजी लाने के लिए विश्वसनीय अंतर्राष्ट्रीय साझेदारियों को बढ़ाना।
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