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सामान्य अध्ययन-3: प्रमुख फसलें, देश के विभिन्न भागों में फसल पैटर्न, कृषि उपज का परिवहन और विपणन तथा इससे संबंधित मुद्दे एवं बाधाएं; किसानों की सहायता के लिए ई-प्रौद्योगिकी।
संदर्भ: भारत विश्व स्तर पर नारियल उत्पादन में प्रथम और नारियल की खेती के क्षेत्रफल में तीसरे स्थान पर है। यह क्षेत्र पारंपरिक खेती से आगे बढ़कर मूल्य संवर्धन, निर्यात, उत्पादकता में वृद्धि तथा ग्रामीण आजीविका के विविधीकरण की दिशा में तेजी से आगे बढ़ रहा है।
भारत का नारियल क्षेत्र

- भारत की विश्व के कुल नारियल उत्पादन में 31.24% तथा वैश्विक नारियल क्षेत्रफल में 17.90% हिस्सेदारी है।
- 2024-25 के दौरान भारत ने 2.19 मिलियन हेक्टेयर क्षेत्र से 20,301.22 मिलियन नारियल का उत्पादन किया, जिसकी औसत उत्पादकता 9,249 नारियल प्रति हेक्टेयर रही।
- केरल में नारियल की खेती का सर्वाधिक क्षेत्रफल लगभग 7.54 लाख हेक्टेयर है, जबकि तमिलनाडु उत्पादन में अग्रणी है।
- आंध्र प्रदेश में नारियल की उत्पादकता सर्वाधिक है, जिसके बाद पश्चिम बंगाल और तमिलनाडु का स्थान है।
- यह क्षेत्र लगभग 3 करोड़ लोगों, जिनमें लगभग 1 करोड़ किसान शामिल हैं, को आजीविका प्रदान करता है और ग्रामीण आजीविका के लिए महत्वपूर्ण बना हुआ है।
- भारत की नारियल निर्यात टोकरी पारंपरिक उत्पादों से आगे बढ़कर वर्जिन नारियल तेल, नारियल दूध, नारियल पानी, एक्टिवेटेड कार्बन (Activated Carbon), ताजा/जमे हुए/कद्दूकस किए हुए नारियल, कोपरा तथा सूखा नारियल जैसे विविध उत्पादों तक विस्तृत हो गई है।
- 2025-26 में नारियल उत्पादों का निर्यात ₹7,038.35 करोड़ (794.70 मिलियन अमेरिकी डॉलर) तक पहुँच गया, जो 2024-25 के ₹4,349.03 करोड़ की तुलना में 62% की वृद्धि है।
- इसके प्रमुख निर्यात बाजारों में अमेरिका, संयुक्त अरब अमीरात (UAE), श्रीलंका, जर्मनी, रूस, तुर्किये, बेल्जियम, यूनाइटेड किंगडम (UK) और नीदरलैंड शामिल हैं।
नारियल क्षेत्र के लिए सरकारी पहल

- नारियल की खेती का विस्तार: नए क्षेत्रों में नारियल के पौधों के रोपण के लिए ₹56,000 प्रति हेक्टेयर की वित्तीय सहायता प्रदान की जाती है।
- गुणवत्तापूर्ण रोपण सामग्री का उत्पादन: नारियल विकास बोर्ड प्रदर्शन-सह-बीज उत्पादन फार्म, बीज उद्यान (Seed Gardens) और नर्सरियों को सहायता प्रदान करता है।
- उत्पादकता में सुधार: नारियल-आधारित फसल प्रणाली के माध्यम से उत्पादकता सुधार (PICCS) के अंतर्गत एकीकृत नारियल-आधारित खेती के लिए ₹42,000 प्रति हेक्टेयर की सहायता प्रदान की जाती है। 2025-26 में इस कार्यक्रम के अंतर्गत 18,800 हेक्टेयर क्षेत्र को कवर किया गया और 48,696 किसानों को लाभ मिला।
- नारियल संवर्धन योजना: केंद्रीय बजट 2026-27 में घोषित यह योजना गुणवत्तापूर्ण पौधों, संभावित क्षेत्रों में विस्तार, पुनःरोपण एवं पुनर्योजीकरण, फसल-स्वास्थ्य प्रबंधन तथा एकीकृत प्रसंस्करण इकाइयों पर केंद्रित है।
- यह उच्च-मूल्य कृषि के लिए ₹350 करोड़ के आवंटन का हिस्सा है, जिसमें नारियल, काजू और कोको शामिल हैं।
- न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) सहायता: कोपरा उन 22 अनिवार्य कृषि फसलों में शामिल है, जिन्हें न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) व्यवस्था के अंतर्गत कवर किया जाता है।
- NAFED और NCCF इसकी खरीद के लिए केंद्रीय नोडल एजेंसियाँ हैं।
- मूल्य संवर्धन एवं निर्यात संवर्धन: नारियल की मूल्य श्रृंखला को मजबूत करने के लिए सरकार प्रसंस्करण, गुणवत्ता प्रमाणन, ब्रांडिंग, व्यापार मेलों, क्रेता-विक्रेता बैठकों, बाजार आसूचना तथा निर्यात संवर्धन को समर्थन प्रदान करती है।
- कौशल विकास एवं उद्यमिता: फ्रेंड्स ऑफ कोकोनट ट्री e (FoCT), कोकोमित्र, केरा कौशल केंद्र तथा नीरा टैपिंग एंड प्रोसेसिंग टेकनिशियन ट्रेनिंग जैसे कार्यक्रम कुशल रोजगार, ग्रामीण उद्यमिता और नारियल-आधारित उद्यमों को बढ़ावा देते हैं।
- नारियल पर प्रौद्योगिकी मिशन (TMOC): यह कीट एवं रोग प्रबंधन, प्रसंस्करण, उत्पाद विविधीकरण, अनुसंधान एवं विकास तथा मूल्य संवर्धन से संबंधित प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देता है।
- केरा सुरक्षा बीमा योजना: यह नारियल चढ़ाई करने वाले श्रमिकों, नीरा तकनीशियनों, संकरण कार्यकर्ताओं तथा अन्य नारियल श्रमिकों को दुर्घटना बीमा कवरेज प्रदान करती है।
नारियल क्षेत्र का महत्व
- आजीविका एवं आय का विविधीकरण: यह क्षेत्र लगभग 3 करोड़ लोगों, जिनमें लगभग 1 करोड़ किसान शामिल हैं, की आजीविका का समर्थन करता है। वहीं, एकीकृत एवं बहु-स्तरीय कृषि प्रणालियाँ किसानों के लिए अतिरिक्त आय के अवसर प्रदान करती हैं।
- मूल्य संवर्धन एवं निर्यात: नारियल को तेल, दूध, पानी, एक्टिवेटिड कार्बन तथा अन्य मूल्यवर्धित उत्पादों में प्रसंस्कृत करने से ग्रामीण उद्यमों को मजबूती मिलती है और वैश्विक कृषि मूल्य श्रृंखलाओं में भारत की स्थिति सुदृढ़ होती है।
- रोजगार एवं ग्रामीण विकास: प्रसंस्करण, हस्तशिल्प, नीरा दोहन, नारियल के पेड़ पर चढ़ने तथा प्राथमिक प्रसंस्करण जैसी नारियल-आधारित गतिविधियाँ खेती के अलावा रोजगार एवं उद्यमिता के अवसर सृजित करती हैं।
- सांस्कृतिक एवं आर्थिक महत्व: “कल्पवृक्ष” या “ट्री ऑफ लाइफ” के रूप में पूजनीय नारियल लगभग तीन सहस्राब्दियों से भारत की खाद्य, औषधि, रेशा, लकड़ी, ईंधन तथा सांस्कृतिक परंपराओं का अभिन्न हिस्सा रहा है।
