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सामान्य अध्ययन-2: भारत और उसके पड़ोसी देश—संबंध; भारत से संबंधित और/अथवा भारत के हितों को प्रभावित करने वाले द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक समूह एवं करार।

संदर्भ: भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने 2028–29 के लिए संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की अस्थायी सदस्यता हेतु भारत के अभियान की शुरुआत करते हुए शांति (SHANTI) नामक एक नए सिद्धांत को प्रस्तुत किया। SHANTI का पूर्ण रूप है — मानदंडों, विश्वास और सत्यनिष्ठा के माध्यम से समग्र प्रगति सुनिश्चित करना।

भारत के शांति सिद्धांत को समझना

  • शांति को भारत की समुद्री कूटनीति के तार्किक विकास के रूप में समझा जा सकता है, जो सागर और महासागर की अवधारणाओं पर आधारित है।
  • जहाँ सागर ने दृष्टिकोण प्रदान किया और महासागर ने इसके भौगोलिक एवं रणनीतिक दायरे का विस्तार किया, वहीं शांति इस दृष्टिकोण को दीर्घकालिक सहयोग में बदलने के लिए मानदंड और कार्यप्रणाली प्रदान करता है।
  • सागर (2015) — क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास: इसने समावेशी समुद्री सुरक्षा और समान विकास की दृष्टि स्थापित की। इसमें क्षेत्रीय सहयोग, क्षमता निर्माण तथा भारत की पसंदीदा सुरक्षा साझेदार और प्रथम प्रत्युत्तरकर्ता के रूप में भूमिका पर जोर दिया गया।
  • महासागर (2025) — क्षेत्रों में सुरक्षा और विकास के लिए पारस्परिक एवं समग्र प्रगति: इसने इस दृष्टिकोण का विस्तार व्यापक हिंद-प्रशांत और वैश्विक दक्षिण तक किया तथा विभिन्न क्षेत्रों में सुरक्षा और विकास की परस्पर संबद्धता को स्वीकार किया।
  • शांति (2026) — मानदंडों, विश्वास और सत्यनिष्ठा के माध्यम से समग्र प्रगति सुनिश्चित करना: यह सहयोग की कार्यप्रणाली प्रस्तुत करता है, जिसमें मानदंड, विश्वास, सत्यनिष्ठा, मांग-आधारित सहयोग और गैर-निर्देशात्मक संस्थान निर्माण पर जोर दिया गया है, न कि प्रभाव-आधारित जुड़ाव पर।
  • सुरक्षा दृष्टिकोण में बदलाव: शांति का उद्देश्य प्रतिस्पर्धा से सहयोग की ओर बढ़ना, अवसरवादी संकट प्रतिक्रिया से दीर्घकालिक लचीलेपन की ओर बढ़ना, केवल समुद्री क्षेत्रों की सुरक्षा करने से आगे बढ़कर साझा समुद्री संसाधनों और क्षेत्रों के प्रभावी प्रबंधन की ओर बढ़ना।

बंगाल की खाड़ी: शांति के लिए प्रयोगस्थल

  • रणनीतिक केंद्रीयता: बंगाल की खाड़ी भारत की पूर्व की ओर देखो नीति को आसियान से जोड़ती है, मलक्का जलडमरूमध्य तक पहुंच प्रदान करती है और पूर्वी हिंद महासागर को प्रमुख वैश्विक व्यापार एवं ऊर्जा मार्गों से जोड़ती है।
  • साझा चुनौतियां: इसके तटीय देशों को गैर-पारंपरिक सुरक्षा चुनौतियों का सामना करना पड़ता है, जिनमें चक्रवात, तटीय कटाव, मत्स्य संसाधन प्रबंधन और समुद्र के नीचे संचार अवसंरचना की सुरक्षा शामिल हैं। इससे सैन्य प्रतिस्पर्धा के बजाय साझा हितों पर आधारित सहयोग की व्यापक संभावनाएं बनती हैं।
  • संस्थागत मंच: बिम्सटेक दक्षिण एशिया और दक्षिण-पूर्व एशिया को जोड़ने वाला मौजूदा क्षेत्रीय ढांचा है। शांति का उद्देश्य एक समानांतर नई संस्था बनाने के बजाय मौजूदा तंत्रों के बीच समन्वय स्थापित करना हो सकता है।
  • सिद्धांत से व्यवहार की ओर: बंगाल की खाड़ी को शांति को व्यवहार में लागू करने वाला पहला क्षेत्र माना जा सकता है। यहां समुद्री सुरक्षा, आपदा प्रतिक्रिया, नीली अर्थव्यवस्था और पर्यावरणीय लचीलेपन के क्षेत्र में सहयोग के माध्यम से इसकी शुरुआत की जा सकती है, जिसके बाद इसे व्यापक हिंद-प्रशांत क्षेत्र में लागू किया जा सके।

भारत और क्षेत्र के लिए महत्व

  • भारत के बहुपक्षीय एजेंडे को मजबूती: शांति भारत की 2028–29 संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद की उम्मीदवारी के लिए मूल्य-आधारित ढांचा प्रदान करता है और सुधारित एवं अधिक प्रतिनिधित्वकारी बहुपक्षीय संस्थाओं की भारत की मांग को मजबूत करता है।
  • वैश्विक दक्षिण के हितों को बढ़ावा: न्यायसंगत वैश्विक शासन, विकास सहयोग, जलवायु न्याय और समावेशी विकास पर इसका जोर वैश्विक दक्षिण की आवाज और विकास साझेदार के रूप में भारत की भूमिका को मजबूत करता है।
  • नियम-आधारित समुद्री व्यवस्था को बढ़ावा: अंतरराष्ट्रीय कानून, शांतिपूर्ण विवाद समाधान, नौवहन की स्वतंत्रता और सहयोग पर जोर देकर शांति भारत की व्यापक समुद्री पहलों का पूरक बनता है और हिंद-प्रशांत में सहयोगात्मक सुरक्षा को सुदृढ़ करता है।
  • कठोर सुरक्षा से आगे व्यापक दृष्टिकोण: शांति समुद्री सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता की व्यापक अवधारणा में आपदा प्रतिरोधक क्षमता, नीली अर्थव्यवस्था, पर्यावरण संरक्षण और उभरती तकनीकी चुनौतियों को भी शामिल करता है।

शांति को व्यवहार में लागू करने की चुनौतियां

  • संस्थागत विखंडन: शांति को बिम्सटेक, हिंद महासागर रिम संघ और हिंद महासागर नौसैनिक संगोष्ठी जैसे मौजूदा तंत्रों के साथ समन्वय करना होगा, ताकि एक और अतिव्यापी संस्थागत स्तर का निर्माण न हो।
  • असमान क्षमताएं: तटीय देशों की वित्तीय, तकनीकी और संस्थागत क्षमताओं में अंतर संयुक्त परियोजनाओं, जैसे आपदा प्रतिक्रिया, समुद्री निगरानी, संपर्क व्यवस्था और नीली अर्थव्यवस्था, के क्रियान्वयन में बाधा डाल सकता है।
  • भूराजनीतिक प्रतिस्पर्धा: बंगाल की खाड़ी के तटीय क्षेत्रों में चीन की बढ़ती बंदरगाह, अवसंरचनात्मक और रणनीतिक उपस्थिति भारत के लिए एक समावेशी क्षेत्रीय ढांचा विकसित करने की प्रक्रिया को जटिल बनाती है।
  • स्वैच्छिक प्रकृति: शांति एक बाध्यकारी संधि के बजाय मानदंड-आधारित ढांचा है, इसलिए इसमें किसी प्रकार की प्रवर्तन व्यवस्था नहीं है। इसकी प्रभावशीलता भागीदार देशों की निरंतर राजनीतिक प्रतिबद्धता और स्वैच्छिक अनुपालन पर निर्भर करेगी।

आगे की राह

  • मौजूदा संस्थाओं पर आधारित कार्य: समानांतर ढांचे बनाने के बजाय बिम्सटेक और अन्य स्थापित क्षेत्रीय तंत्रों को कार्यान्वयन के मंच के रूप में उपयोग किया जाना चाहिए।
  • व्यावहारिक सहयोग को प्राथमिकता: शांति को समुद्री क्षेत्र जागरूकता, सूचना साझा करने, मानवीय सहायता एवं आपदा राहत, पूर्व चेतावनी प्रणालियों, समुद्री सुरक्षा और महत्वपूर्ण समुद्री अवसंरचना की सुरक्षा से जुड़ी मापनीय पहलों में परिवर्तित किया जाना चाहिए।
  • सतत समुद्री शासन को बढ़ावा: नीली अर्थव्यवस्था, मत्स्य संसाधन प्रबंधन, पर्यावरणीय लचीलापन और जलवायु अनुकूलन को समुद्री सुरक्षा सहयोग के साथ एकीकृत किया जाना चाहिए, जो नियम-आधारित समुद्री व्यवस्था के अनुरूप हो।
  • बंगाल की खाड़ी में सफलता का प्रदर्शन: बंगाल की खाड़ी को मानदंड-आधारित सहयोग के सफल क्षेत्रीय मॉडल के रूप में विकसित किया जाना चाहिए, जिससे शांति को व्यापक हिंद-प्रशांत क्षेत्र तक विस्तारित करने के लिए विश्वसनीय आधार तैयार हो सके।
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