श्री अरबिंदो की जयंती
संदर्भ: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 15 अगस्त 2026 को श्री अरबिंदो की जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि अर्पित की और भारत के स्वतंत्रता संग्राम, दर्शन तथा मानव प्रगति में उनके योगदान को याद किया।
श्री अरबिंदो के बारे में

- श्री अरबिंदो घोष (1872–1950) एक दार्शनिक, राष्ट्रवादी, कवि और आध्यात्मिक चिंतक थे, जिन्होंने भारत के स्वतंत्रता आंदोलन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- उनका जन्म 15 अगस्त 1872 को कलकत्ता में हुआ था। उन्होंने इंग्लैंड में लंदन के सेंट पॉल स्कूल और कैम्ब्रिज के किंग्स कॉलेज में शिक्षा प्राप्त की।
- 1893 में भारत लौटने के बाद उन्होंने बड़ौदा रियासत में सेवा की और बड़ौदा कॉलेज में प्राध्यापक के रूप में कार्य किया।
- 1905 में बंगाल विभाजन के बाद वे 1906 में कलकत्ता चले गए और एक प्रमुख राष्ट्रवादी नेता के रूप में उभरे।
- वंदे मातरम् तथा अन्य लेखों के माध्यम से उन्होंने ब्रिटिश शासन से पूर्ण स्वतंत्रता की वकालत की।
- 1908 में अलीपुर बम मामले में उन्हें गिरफ्तार कर जेल भेजा गया, लेकिन पर्याप्त साक्ष्य के अभाव में उन्हें रिहा कर दिया गया।
श्री अरबिंदो की विरासत
- श्री अरबिंदो धीरे-धीरे सक्रिय राजनीति से आध्यात्मिकता की ओर अग्रसर हुए।
- 1910 में वे पांडिचेरी चले गए और आध्यात्मिक साधना में समर्पित हो गए। उन्होंने समग्र योग के दर्शन का विकास किया, जिसका उद्देश्य केवल व्यक्तिगत मुक्ति प्राप्त करना नहीं, बल्कि मानव चेतना और प्रकृति का रूपांतरण करना था।
- 1926 में उन्होंने अपनी आध्यात्मिक सहयोगी मिर्रा अल्फासा, जिन्हें “द मदर” के नाम से जाना जाता है, के साथ श्री अरबिंदो आश्रम की स्थापना की।
- उनकी प्रमुख रचनाओं में द लाइफ डिवाइन, द सिंथेसिस ऑफ योग, सावित्री, एसेज ऑन द गीता और द ह्यूमन साइकल शामिल हैं।
- राष्ट्रवाद, आध्यात्मिकता, मानव विकास और रूपांतरण से संबंधित उनके विचार आज भी विश्वभर में बौद्धिक और आध्यात्मिक चिंतन को प्रभावित करते हैं।
वॉयजर-2 मिशन
संदर्भ: नासा ने वॉयेजर-2 में ऊर्जा-बचत संबंधी बदलाव किया है, जिससे अंतरिक्ष यान की घटती ऊर्जा आपूर्ति के बावजूद इसके वैज्ञानिक मिशन को कम-से-कम एक और वर्ष तक जारी रखा जा सकेगा।
अन्य संबंधित जानकारी
- ऊर्जा-बचत उन्नयन: नासा के इंजीनियरों ने ऐसा बदलाव किया है जिससे वॉयेजर-2 की ऊर्जा खपत कम हो गई है, जबकि इसके प्रमुख वैज्ञानिक कार्य जारी रहेंगे।
- वैज्ञानिक उपकरण सुरक्षित: इस बदलाव से तीन उपकरण — कॉस्मिक रे सबसिस्टम, मैग्नेटोमीटर और प्लाज़्मा वेव सबसिस्टम — आंकड़े एकत्र करना जारी रख सकेंगे।
- क्यों आवश्यक था: वॉयेजर-2 का रेडियोआइसोटोप तापविद्युत जनित्र धीरे-धीरे कम बिजली उत्पन्न कर रहा है, क्योंकि इसमें मौजूद प्लूटोनियम ईंधन का क्षय हो रहा है। इसलिए नासा गैर-जरूरी प्रणालियों को क्रमशः बंद कर रहा है।
- मिशन का विस्तार: इस बदलाव से कम-से-कम एक अतिरिक्त वर्ष तक वैज्ञानिक कार्य जारी रहने की उम्मीद है, जिससे अंतरिक्ष यान को अंतरतारकीय पर्यावरण का अध्ययन करने में सहायता मिलेगी।
वॉयजर-2 के बारे में
- प्रक्षेपण: वॉयेजर-2 को 20 अगस्त 1977 को प्रक्षेपित किया गया था और इसने बृहस्पति, शनि, अरुण और वरुण के पास से उड़ान भरी।
- विशिष्ट उपलब्धि: यह अरुण और वरुण का दौरा करने वाला एकमात्र अंतरिक्ष यान है।
- अंतरतारकीय मिशन: वॉयजर-2 ने नवंबर 2018 में हेलियोपॉज़ को पार किया और अंतरतारकीय अंतरिक्ष में प्रवेश किया।
- ऊर्जा स्रोत: यह रेडियोआइसोटोप तापविद्युत जनित्र का उपयोग करता है, जो रेडियोधर्मी क्षय से उत्पन्न ऊष्मा से बिजली पैदा करता है।
वॉयजर-2 का महत्व
- बाह्य सौरमंडल: इसने मानवता को अरुण और वरुण के एकमात्र निकट-दृश्य अवलोकन उपलब्ध कराए, जिससे इन हिम दानव ग्रहों के बारे में हमारी समझ में महत्वपूर्ण बदलाव आया।
- अंतरतारकीय विज्ञान: इसके उपकरण हेलिओस्फीयर से परे चुंबकीय क्षेत्रों, आवेशित कणों और प्लाज़्मा तरंगों का प्रत्यक्ष मापन करते हैं।
- वैज्ञानिक विरासत: हेलियोपॉज़ से परे लगातार किए जा रहे अवलोकन सूर्य के प्रभाव वाले क्षेत्र और अंतरतारकीय माध्यम के बीच की सीमा का अध्ययन करने का दुर्लभ अवसर प्रदान करते हैं।
भारत ने MQ –9 B सी गार्डियन को पट्टे पर लिया
संदर्भ: रक्षा मंत्रालय ने भारतीय नौसेना के लिए दो MQ -9 B सी गार्डियन उच्च ऊंचाई, दीर्घकालिक उड़ान वाले दूरस्थ रूप से संचालित विमान तंत्र को 30 महीने के लिए पट्टे पर लेने हेतु जनरल एटॉमिक्स एयरोनॉटिकल सिस्टम्स इंक. के साथ ₹1,943 करोड़ का अनुबंध किया है।
MQ –9 B सी गार्डियन के बारे में

- MQ -9 B सी गार्डियन समुद्री अभियानों पर केंद्रित उच्च ऊंचाई, दीर्घकालिक उड़ान वाला दूरस्थ रूप से संचालित विमान तंत्र है, जिसे लगातार खुफिया जानकारी, निगरानी और टोही तथा समुद्री क्षेत्र जागरूकता के लिए विकसित किया गया है।
- यह 40 घंटे से अधिक समय तक हवा में रह सकता है, जिससे विशाल समुद्री क्षेत्रों में लंबे समय तक निगरानी करना संभव होता है।
- इसमें लिंक्स बहु-मोड रडार, विद्युत-प्रकाशीय/अवरक्त सेंसर और उन्नत उपकरण जैसी प्रणालियां लगी हैं।
- इसका सी गार्डियन मिशन किट सतह-रोधी युद्ध, पनडुब्बी-रोधी युद्ध और हवाई बारूदी सुरंग-रोधी अभियानों में सहायता कर सकता है।
- इसकी खुली वास्तुकला विभिन्न प्रणालियों, जैसे सोनोबॉय प्रबंधन एवं नियंत्रण प्रणाली और सोनोबॉय प्रक्षेपक प्रणाली, के एकीकरण की सुविधा देती है, जिससे पनडुब्बियों का पता लगाने में सहायता मिलती है।
- इसमें स्वचालित उड़ान भरने और उतरने की क्षमता, उपग्रह आधारित क्षितिज-पार संचालन तथा पहचान एवं बचाव प्रणाली मौजूद है, जिससे इसे नागरिक हवाई क्षेत्र में भी संचालित करना संभव होता है।
महत्व
- बेहतर समुद्री क्षेत्र जागरूकता: यह लगातार खुफिया जानकारी, निगरानी और टोही उपलब्ध कराकर भारतीय नौसेना की विशाल समुद्री क्षेत्रों की निगरानी क्षमता को मजबूत करेगा।
- हिंद महासागर क्षेत्र: यह समुद्री गतिविधियों पर निगरानी रखने और उभरती सुरक्षा चुनौतियों से निपटने की भारत की क्षमता को बढ़ाएगा।
- क्षमता की निरंतरता: पहले से पट्टे पर लिए गए विमानों की पट्टा अवधि समाप्त होने के करीब होने के कारण यह लंबी दूरी की निगरानी क्षमता को निर्बाध बनाए रखने में सहायता करेगा।
- स्थायी शामिल किए जाने तक सेतु: यह तब तक क्षमता की निरंतरता प्रदान करेगा, जब तक भारत द्वारा 2024 में अनुबंधित 31 एमक्यू-9बी स्काई गार्डियन और सी गार्डियन प्रणालियों की आपूर्ति शुरू नहीं हो जाती।
- हिंद-प्रशांत सुरक्षा: यह भारत-अमेरिका रक्षा सहयोग को मजबूत करेगा तथा स्वतंत्र, खुले और सुरक्षित हिंद-प्रशांत के साझा उद्देश्य में योगदान देगा।
भारतीय भेषज संहिता आयोग को डब्ल्यूएचओ दक्षिण-पूर्व एशिया नियामक नेटवर्क ने मान्यता दी
संदर्भ: भारतीय भेषज संहिता आयोग को डब्ल्यूएचओ दक्षिण-पूर्व एशिया नियामक नेटवर्क द्वारा भेषज सतर्कता में क्षेत्रीय उत्कृष्टता केंद्र और औषधियों की गुणवत्ता में तकनीकी केंद्र के रूप में मान्यता दी गई है।
अन्य संबंधित जानकारी
- दोहरी मान्यता: यह मान्यता औषधि सुरक्षा निगरानी और औषधियों के गुणवत्ता मानकों में भारतीय भेषज संहिता आयोग की विशेषज्ञता को स्वीकार करती है।
- क्षेत्रीय भूमिका: उत्कृष्टता केंद्र के रूप में भारतीय भेषज संहिता आयोग डब्ल्यूएचओ दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्र में क्षमता निर्माण, ज्ञान साझा करने और नियामकीय व्यवस्था को मजबूत करने में योगदान देगा।
- भारतीय भेषज संहिता आयोग का योगदान: नेटवर्क के समक्ष इसके प्रमुख कार्यों में भारतीय भेषज संहिता, भारतीय भेषज संहिता संदर्भ पदार्थ, अशुद्धता संदर्भ मानक, भारत का भेषज सतर्कता कार्यक्रम और भारत का चिकित्सा उपकरण सतर्कता कार्यक्रम शामिल थे।
- भारत के लिए महत्व: यह मान्यता क्षेत्रीय औषधि नियामकीय सहयोग में भारत की भूमिका को मजबूत करती है और औषधि गुणवत्ता तथा भेषज सतर्कता के क्षेत्र में भारत की विशेषज्ञता को रेखांकित करती है।
भारतीय भेषज संहिता आयोग के बारे में
- संस्थागत स्थिति: भारतीय भेषज संहिता आयोग भारत सरकार के स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के अधीन एक स्वायत्त संस्था है।
- भारतीय भेषज संहिता: यह आयोग भारतीय भेषज संहिता का विकास और प्रकाशन करता है, जो भारत में औषधियों की पहचान, शुद्धता और सामर्थ्य के लिए आधिकारिक मानकों की पुस्तक है। इसका 10वां संस्करण, आईपी 2026, वर्ष 2026 में जारी किया गया।
- भेषज सतर्कता: भारतीय भेषज संहिता आयोग राष्ट्रीय समन्वय केंद्र–भारत का भेषज सतर्कता कार्यक्रम की मेजबानी करता है, जो प्रतिकूल औषधि प्रतिक्रियाओं और औषधि सुरक्षा की निगरानी के लिए भारत की व्यवस्था का समन्वय करता है।
- संदर्भ मानक: आयोग औषधियों के परीक्षण और गुणवत्ता नियंत्रण में सहायता के लिए भारतीय भेषज संहिता संदर्भ पदार्थ और अशुद्धता संदर्भ मानक विकसित करता है।
दक्षिण-पूर्व एशिया नियामक नेटवर्क के बारे में
- स्थापना: दक्षिण-पूर्व एशिया नियामक नेटवर्क की स्थापना 2016 में डब्ल्यूएचओ के दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्रीय कार्यालय द्वारा की गई थी। यह क्षेत्र में नियामकीय प्रणालियों को मजबूत करने के लिए सदस्य देशों के नेतृत्व वाला सहयोगात्मक मंच है।
- मुख्य कार्य: यह नियामकीय सहयोग, सूचना एवं ज्ञान साझा करना, क्षमता निर्माण, नियामकीय अभिसरण तथा राष्ट्रीय नियामक प्राधिकरणों के बीच परस्पर निर्भरता को बढ़ावा देता है।
- सचिवालय: डब्ल्यूएचओ दक्षिण-पूर्व एशिया क्षेत्रीय कार्यालय दक्षिण-पूर्व एशिया नियामक नेटवर्क के सचिवालय के रूप में कार्य करता है। इसका मुख्यालय नई दिल्ली, भारत में है।
सीमावर्ती क्षेत्रों के पास नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं के लिए नए सुरक्षा नियम
संदर्भ: गृह मंत्रालय ने सीमावर्ती क्षेत्रों में सौर, पवन और मिश्रित नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं के लिए राष्ट्रीय सुरक्षा मंजूरी से संबंधित दिशा-निर्देश जारी किए हैं। इनका उद्देश्य नवीकरणीय ऊर्जा के विकास और राष्ट्रीय सुरक्षा संबंधी आवश्यकताओं के बीच संतुलन स्थापित करना है।
दिशा-निर्देशों की प्रमुख बातें
- 1 किलोमीटर प्रतिबंधित क्षेत्र: अंतर्राष्ट्रीय सीमा, नियंत्रण रेखा या वास्तविक नियंत्रण रेखा के 1 किलोमीटर के भीतर कोई नई सौर, पवन या मिश्रित नवीकरणीय ऊर्जा परियोजना स्थापित करने की अनुमति नहीं होगी।
- सुरक्षा मंजूरी क्षेत्र: अंतर्राष्ट्रीय सीमा, नियंत्रण रेखा या वास्तविक नियंत्रण रेखा से 1–50 किलोमीटर के भीतर प्रस्तावित परियोजनाओं के लिए गृह मंत्रालय की सुरक्षा मंजूरी आवश्यक होगी।
- अंतर्राष्ट्रीय सीमा से 1–20 किलोमीटर के भीतर की परियोजनाओं के लिए रक्षा मंत्रालय से अनापत्ति प्रमाण-पत्र भी आवश्यक होगा।
- ऊंचाई संबंधी प्रतिबंध: परियोजना के रखरखाव और संचालन के लिए निर्मित नागरिक ढांचे की अधिकतम ऊंचाई:
- 1–8 किलोमीटर: 3 मीटर
- 8–20 किलोमीटर: 5 मीटर
- 20–50 किलोमीटर: 15 मीटर
- सुरक्षा उपाय: परियोजनाओं में ड्रोन-रोधी प्रणालियों सहित व्यापक सुरक्षा उपाय उपलब्ध कराने होंगे। निर्माण और संचालन की निगरानी के लिए एक समर्पित पुलिस चौकी भी स्थापित करनी होगी। ऐसे सुरक्षा उपकरणों की लागत परियोजना संचालक द्वारा वहन की जाएगी।
- विदेशी कर्मी: भारत के साथ स्थलीय सीमा साझा करने वाले देशों के इंजीनियरों, कर्मचारियों, श्रमिकों और अन्य कर्मियों को परियोजना के कार्यान्वयन के लिए केंद्र सरकार की अनुमति लेनी होगी।
- आवेदन एवं मंजूरियां: आवेदन नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय के माध्यम से प्रस्तुत किए जाएंगे, जो गृह मंत्रालय और रक्षा मंत्रालय के साथ सुरक्षा मंजूरी की प्रक्रिया में समन्वय करेगा।
सीमावर्ती क्षेत्रों के पास नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाएं संवेदनशील क्यों हैं?
- निगरानी और दृश्यता: बड़े नवीकरणीय ऊर्जा संयंत्र, विशेष रूप से पवन टर्बाइन और उनसे संबंधित ढांचा, रणनीतिक रूप से संवेदनशील सीमावर्ती क्षेत्रों में निगरानी व्यवस्था और दृश्यता को प्रभावित कर सकते हैं।
- सीमा संचालन पर प्रभाव: निर्माण कार्य, पहुंच मार्ग और संबंधित ढांचा सीमा के पास सुरक्षा बलों की आवाजाही, गश्त और परिचालन आवश्यकताओं में बाधा डाल सकते हैं।
- महत्वपूर्ण अवसंरचना की सुरक्षा: संवेदनशील सीमाओं के निकट स्थित विद्युत उत्पादन और पारेषण परिसंपत्तियां रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण अवसंरचना बन सकती हैं, इसलिए उन्हें सुरक्षा खतरों से अतिरिक्त संरक्षण की आवश्यकता होती है।
दिशा-निर्देशों का महत्व
- सुरक्षा–ऊर्जा संतुलन: इन दिशा-निर्देशों का उद्देश्य नवीकरणीय ऊर्जा के विस्तार और राष्ट्रीय सुरक्षा आवश्यकताओं के बीच संतुलन स्थापित करना है।
- नियामकीय स्पष्टता: एक समान सुरक्षा मानदंड सीमावर्ती क्षेत्रों में परियोजना विकासकर्ताओं के लिए अधिक स्पष्टता और पूर्वानुमेयता सुनिश्चित करेंगे।
- एकीकृत योजना: इन दिशा-निर्देशों के माध्यम से नवीकरणीय ऊर्जा और अवसंरचना की योजना में सुरक्षा संबंधी पहलुओं को भी शामिल किया गया है।
भारतीय भौतिक विज्ञानी दीपक धर ने 2026 का डिराक मेडल जीता
संदर्भ: भारतीय सैद्धांतिक भौतिक विज्ञानी दीपक धर को सैद्धांतिक भौतिकी, विशेष रूप से सांख्यिकीय यांत्रिकी, में उनके महत्वपूर्ण योगदान के लिए अब्दुस सलाम अंतर्राष्ट्रीय सैद्धांतिक भौतिकी केंद्र द्वारा 2026 के डिराक मेडल से सम्मानित किया गया है।
अन्य संबंधित जानकारी
- संयुक्त प्राप्तकर्ता: धर ने बर्नार्ड डेरिडा, मार्क मेज़ार्ड और हाइम सोमपोलिंस्की के साथ 2026 का डिराक मेडल साझा किया।
- प्रशस्ति: चारों वैज्ञानिकों को संतुलन सांख्यिकीय यांत्रिकी में अग्रणी योगदान तथा इसकी अवधारणाओं और विधियों को असंतुलन सांख्यिकीय यांत्रिकी, अनुकूलन, सैद्धांतिक तंत्रिका विज्ञान और कृत्रिम बुद्धिमत्ता तक विस्तारित करने के लिए सम्मानित किया गया।
- दीपक धर का योगदान: एबेलियन सैंडपाइल मॉडल पर उनके प्रभावशाली कार्य ने स्व-संगठित क्रांतिकता को समझने में महत्वपूर्ण योगदान दिया। इसमें सरल स्थानीय अंतःक्रियाओं से जटिल सामूहिक व्यवहार उत्पन्न हो सकता है।
- दुर्लभ उपलब्धि: धर डिराक मेडल और बोल्ट्ज़मान मेडल दोनों प्राप्त करने वाले 10वें वैज्ञानिक बन गए हैं। वे 2022 में बोल्ट्ज़मान मेडल प्राप्त करने वाले पहले भारतीय भी थे।
दीपक धर के बारे में
- अनुसंधान: उनका कार्य सांख्यिकीय यांत्रिकी, स्टोकेस्टिक प्रक्रियाओं, अव्यवस्थित प्रणालियों और स्व-संगठित क्रांतिकता से संबंधित है। उनके अनुसंधान में स्व-संगठित क्रांतिकता के सटीक रूप से हल किए जा सकने वाले मॉडल भी शामिल हैं।
- शैक्षणिक कैरियर: धर ने 1978 में टाटा मूलभूत अनुसंधान संस्थान, मुंबई में कार्य प्रारंभ किया। वे अंतर्राष्ट्रीय सैद्धांतिक विज्ञान केंद्र, बेंगलुरु से भी जुड़े रहे हैं।
- प्रमुख सम्मान: उन्हें शांति स्वरूप भटनागर पुरस्कार (भौतिकी), 1991, TWAS पुरस्कार (भौतिकी), 2002, बोल्ट्ज़मान मेडल, 2022 और पद्म भूषण, 2023 से सम्मानित किया जा चुका है।
डिराक मेडल के बारे में
- प्रदान करने वाली संस्था: डिराक मेडल प्रतिवर्ष अब्दुस सलाम अंतर्राष्ट्रीय सैद्धांतिक भौतिकी केंद्र द्वारा प्रदान किया जाता है, जिसका मुख्यालय ट्रिएस्टे, इटली में है।
- स्थापना: इसकी स्थापना 1985 में प्रसिद्ध सैद्धांतिक भौतिक विज्ञानी पॉल डिराक के सम्मान में की गई थी।
- उद्देश्य: यह पुरस्कार सैद्धांतिक भौतिकी में महत्वपूर्ण योगदान देने वाले वैज्ञानिकों को सम्मानित करता है।
DRI ने फर्जी सार्क मुक्त व्यापार क्षेत्र का उपयोग करने वाले प्रमुख सुपारी आयात नेटवर्क का पर्दाफाश किया
संदर्भ: राजस्व आसूचना निदेशालय ने दक्षिण-पूर्व एशिया से सुपारी का आयात कर उसे फर्जी तरीके से बांग्लादेशी मूल का दर्शाने और दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार क्षेत्र के तहत मिलने वाली रियायती शुल्क सुविधा का गलत लाभ उठाने वाले एक बड़े नेटवर्क का पर्दाफाश किया है।
दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार क्षेत्र के बारे में

- दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार क्षेत्र दक्षिण एशियाई क्षेत्रीय सहयोग संगठन की मुक्त व्यापार व्यवस्था है।
- यह समझौता 2006 में लागू हुआ और इसने 1993 की सार्क अधिमान्य व्यापार व्यवस्था का स्थान लिया।
- दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार क्षेत्र के हस्ताक्षरकर्ता देश हैं — अफगानिस्तान, बांग्लादेश, भूटान, भारत, मालदीव, नेपाल, पाकिस्तान और श्रीलंका।
- दक्षिण एशियाई मुक्त व्यापार क्षेत्र की प्रस्तावना में अल्पतम विकसित देशों के लिए विशेष एवं विभेदक व्यवहार की आवश्यकता को मान्यता दी गई है।
- अल्पतम विकसित देशों को कुछ सदस्य देशों में छोटी संवेदनशील सूचियों और कम कठोर मूल-स्थान नियमों का लाभ मिलता है।
- व्यापार उदारीकरण कार्यक्रमों के तहत अल्पतम विकसित देशों को प्रारंभिक चरण में कम शुल्क कटौती और अधिक लंबी कार्यान्वयन अवधि की अनुमति दी गई थी।
सुपारी के बारे में
- सुपारी Areca catechu नामक सुपारी के ताड़ वृक्ष का फल है, जिसकी मुख्य रूप से दक्षिण-पूर्व एशिया और प्रशांत द्वीपों में खेती की जाती है।
- इसे विभिन्न रूपों में चबाया जाता है, जिनमें सादी सुपारी, मीठी सुपारी, पान मसाला और गुटखा शामिल हैं।
- अंतर्राष्ट्रीय कैंसर अनुसंधान एजेंसी ने 2004 में सुपारी को समूह-1 कार्सिनोजेन के रूप में वर्गीकृत किया था। इसके सेवन का संबंध मुख के अधोश्लेष्मिक तंतुमयता और मुख के कैंसर से है।
भारत-थाईलैंड संयुक्त सैन्य अभ्यास मैत्री-XV 2026
संदर्भ: भारतीय सेना की टुकड़ी 18 से 31 अगस्त 2026 तक आयोजित होने वाले भारत-थाईलैंड संयुक्त सैन्य अभ्यास मैत्री-XV के 15वें संस्करण में भाग लेने के लिए थाईलैंड रवाना हुई।
मैत्री-XV के बारे में
- यह सैन्य अभ्यास थाईलैंड के सूरत थानी स्थित विभावदी रंगसित शिविर में आयोजित किया जाएगा।
- यह कंपनी स्तर का सैन्य अभ्यास होगा, जिसमें संयुक्त राष्ट्र चार्टर के अध्याय VII के तहत जंगल और अर्ध-शहरी क्षेत्रों में संयुक्त उग्रवाद-रोधी और आतंकवाद-रोधी अभियानों पर ध्यान केंद्रित किया जाएगा।
- प्रशिक्षण में मैदानी अभ्यास, युद्ध संबंधी चर्चाएं, व्याख्यान, प्रदर्शन और अंतिम सत्यापन अभ्यास शामिल होंगे।
- 2006 में शुरू किया गया मैत्री अभ्यास दोनों देशों की सेनाओं के बीच सैन्य सहयोग, अंतर-संचालनीयता, आपसी समझ और सौहार्द को बढ़ाने के उद्देश्य से आयोजित किया जाता है।
- इसका पिछला संस्करण सितंबर 2025 में उमरोई, मेघालय में आयोजित किया गया था।
