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सामान्य अध्ययन-3: विज्ञान और प्रौद्योगिकी- विकास और अनुप्रयोग तथा रोजमर्रा के जीवन पर उनके प्रभाव; देशज रूप से प्रौद्योगिकी का विकास और नई प्रौद्योगिकी का विकास।

संदर्भ: स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग (DHR) ने सार्वजनिक परामर्श के लिए राष्ट्रीय स्वास्थ्य अनुसंधान नीति (NHRP), 2026 का मसौदा जारी किया है, जिसमें भारत के स्वास्थ्य अनुसंधान पारिस्थितिकी तंत्र में व्यापक और प्रभावोन्मुख सुधार प्रस्तावित किए गए हैं।

अन्य संबंधित जानकारी

  • प्रारूप नीति का उद्देश्य राष्ट्रीय स्वास्थ्य अनुसंधान नीति, 2011 का स्थान लेकर भारत की बदलती स्वास्थ्य आवश्यकताओं के अनुरूप एक आधुनिक, प्रभावोन्मुख एवं परिणाम-आधारित ढाँचा स्थापित करना है।
  • इसका लक्ष्य सक्षम, समावेशी, आत्मनिर्भर एवं उत्तरदायी स्वास्थ्य अनुसंधान पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करना है, साथ ही अनुसंधान, नीति-निर्माण, स्वास्थ्य सेवा प्रदायगी तथा नवाचार के बीच समन्वय को सुदृढ़ करना है।
  • इस नीति का उद्देश्य भारत में पहली बार जैव-चिकित्सीय, नैदानिक, सार्वजनिक स्वास्थ्य, स्वास्थ्य प्रणाली, महामारी विज्ञान, व्यवहारगत तथा डिजिटल स्वास्थ्य अनुसंधान को समाहित करने वाला एक व्यापक ढाँचा स्थापित करना है।

नीति की आवश्यकता

  • बदलती स्वास्थ्य चुनौतियाँ: भारत में स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियाँ अब तेजी से गैर-संचारी रोगों (NCDs), प्रतिजैविक प्रतिरोध (AMR), मानसिक स्वास्थ्य विकारों, वृद्धावस्था से संबंधित बीमारियों तथा उभरते संक्रामक रोगों से प्रभावित हो रही हैं, जिसके लिए अनुसंधान के पुनर्संरचित ढाँचे की आवश्यकता है।
  • खंडित अनुसंधान पारिस्थितिकी तंत्र: स्वास्थ्य अनुसंधान विभिन्न संस्थानों एवं क्षेत्रों में बिखरा हुआ है, जिससे प्रयासों की पुनरावृत्ति, कमजोर समन्वय तथा अनुसंधान निष्कर्षों का नीति एवं व्यवहार में सीमित उपयोग जैसी समस्याएँ उत्पन्न होती हैं।
  • स्वास्थ्य अनुसंधान में कम सार्वजनिक निवेश: स्वास्थ्य अनुसंधान पर सरकारी व्यय सकल घरेलू उत्पाद (GDP) का केवल लगभग 0.024% है, जिससे भारत की अनुसंधान क्षमता एवं नवाचार की संभावनाएँ सीमित होती हैं।
  • अनुसंधान क्षमता में असमानता: अनुसंधान अवसंरचना, वित्तपोषण के अवसर तथा कुशल मानव संसाधन अभी भी कुछ चुनिंदा प्रमुख संस्थानों तक सीमित हैं, जिससे क्षेत्रीय एवं संस्थागत असमानताएँ उत्पन्न होती हैं।

नीति के मसौदे के प्रमुख प्रस्ताव / विशेषताएँ

  • राष्ट्रीय स्वास्थ्य अनुसंधान एजेंडा (NHRA)
    • रोग-भार, सार्वजनिक स्वास्थ्य आवश्यकताओं तथा उभरती चुनौतियों के आधार पर प्राथमिकता वाले अनुसंधान क्षेत्रों की पहचान के लिए एक गतिशील राष्ट्रीय ढाँचा स्थापित करना।
    • प्राथमिकता वाले क्षेत्रों में तपेदिक (TB), प्रतिजैविक प्रतिरोध (AMR), वाहक-जनित रोग, कैंसर, गैर-संचारी रोग (NCDs), मानसिक स्वास्थ्य, एनीमिया, बाल कुपोषण, महिला स्वास्थ्य, मातृ एवं नवजात मृत्यु-दर, प्राथमिक स्वास्थ्य सेवा तथा आपातकालीन स्वास्थ्य सेवा शामिल हैं।
  • स्वास्थ्य अनुसंधान में निवेश में वृद्धि
    • स्वास्थ्य अनुसंधान पर सार्वजनिक व्यय को चरणबद्ध रूप से वर्तमान GDP के 0.024% से बढ़ाकर 2037 तक 0.072% तथा 2047 तक 0.15% करने का प्रस्ताव।
  • प्रभावोन्मुख अनुसंधान की ओर परिवर्तन
    • अनुसंधान के मूल्यांकन को केवल प्रकाशनों एवं उद्धरणों तक सीमित न रखकर सार्वजनिक स्वास्थ्य परिणामों, नीतिगत प्रासंगिकता, सामाजिक प्रभाव तथा व्यावहारिक उपयोगिता के आधार पर करना।
  • त्रि-स्तरीय शासन संरचना: नीति में निम्नलिखित तीन-स्तरीय शासन व्यवस्था का प्रस्ताव किया गया है—
    • राष्ट्रीय स्वास्थ्य अनुसंधान संचालन समिति: रणनीतिक मार्गदर्शन एवं निगरानी के लिए।
    • स्वास्थ्य अनुसंधान विभाग (DHR): नोडल कार्यान्वयन एजेंसी के रूप में।
    • भारतीय आयुर्विज्ञान अनुसंधान परिषद (ICMR): वैज्ञानिक एवं तकनीकी नेतृत्व प्रदान करने के लिए।
  • राष्ट्रीय अनुसंधान सत्यनिष्ठा कार्यालय (NRIO) एवं अनुसंधान शासन सुधार
    • राष्ट्रीय अनुसंधान सत्यनिष्ठा कार्यालय (NRIO) की स्थापना का प्रस्ताव, जिससे वैज्ञानिक सत्यनिष्ठा, नैतिक पर्यवेक्षण तथा उत्तरदायी अनुसंधान पद्धतियों को सुदृढ़ किया जा सके।
    • बहु-केंद्रित अध्ययनों के अनुमोदन को सरल बनाने तथा अनुसंधान शासन व्यवस्था में सुधार का भी प्रस्ताव।
  • राज्यों एवं निजी क्षेत्र की अधिक भागीदारी
    • राज्य-स्तरीय अनुसंधान एजेंडा तैयार करने को प्रोत्साहित करना।
    • स्वास्थ्य अनुसंधान में निजी अस्पतालों, उद्योगों, स्टार्टअप्स, परोपकारी संस्थाओं तथा सामुदायिक संगठनों की भागीदारी बढ़ाने पर बल।

नीति का महत्त्व

  • सार्वजनिक स्वास्थ्य प्राथमिकताओं के अनुरूप अनुसंधान: अनुसंधान के वित्तपोषण एवं प्रयासों को भारत की सबसे महत्वपूर्ण स्वास्थ्य चुनौतियों एवं रोग-भार की दिशा में केंद्रित करना।
  • स्वास्थ्य सुरक्षा को सुदृढ़ करना: महामारी, प्रतिजैविक प्रतिरोध (AMR), उभरते रोगों तथा अन्य सार्वजनिक स्वास्थ्य आपात स्थितियों के प्रति लक्षित एवं समन्वित अनुसंधान के माध्यम से बेहतर तैयारी सुनिश्चित करना।
  • साक्ष्य-आधारित नीति-निर्माण को बढ़ावा देना: स्वास्थ्य नीतियों, कार्यक्रमों तथा स्वास्थ्य सेवा वितरण प्रणाली में वैज्ञानिक साक्ष्यों के प्रभावी उपयोग को सुदृढ़ करना।
  • स्वास्थ्य अनुसंधान का लोकतंत्रीकरण: अनुसंधान के अवसरों को कुछ चुनिंदा उत्कृष्ट संस्थानों तक सीमित न रखकर राज्यों, चिकित्सा महाविद्यालयों, युवा शोधकर्ताओं तथा वंचित क्षेत्रों तक विस्तारित करना।
  • अनुसंधान के व्यावहारिक उपयोग में सुधार: अनुसंधान से प्राप्त ज्ञान और उसके स्वास्थ्य सेवा, सार्वजनिक नीति तथा स्वास्थ्य परिणामों में वास्तविक उपयोग के बीच की दूरी को कम करना।

Sources : 
The Hindu 
NDTV
 
The Print

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