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सामान्य अध्ययन-3: विज्ञान और प्रौद्योगिकी- विकास और अनुप्रयोग तथा रोजमर्रा के जीवन पर उनके प्रभाव; देशज रूप से प्रौद्योगिकी का विकास और नई प्रौद्योगिकी का विकास।

संदर्भ: चीन ने अपने लॉन्ग मार्च-10B रॉकेट के प्रथम चरण को सफलतापूर्वक पुनर्प्राप्त कर सुरक्षित उतार लिया है। इसके साथ ही उसने कक्षीय श्रेणी के प्रथम पुनः प्रयोज्य प्रक्षेपण यान का सफल प्रदर्शन किया, जो उसके अंतरिक्ष कार्यक्रम की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि है।

अन्य संबंधित जानकारी

  • लॉन्ग मार्च-10B ने नियंत्रित अवतरण करते हुए समुद्र-आधारित पुनर्प्राप्ति मंच पर सफलतापूर्वक ऊर्ध्वाधर अवतरण किया और चीन का पहला पुनर्प्राप्त कक्षीय श्रेणी का पुनः प्रयोज्य रॉकेट बूस्टर बन गया।
  • पारंपरिक लैंडिंग-लेग प्रणाली के विपरीत, इस बूस्टर को समुद्र में स्थित मंच पर लगाए गए जाल-आधारित पुनर्प्राप्ति तंत्र के माध्यम से पकड़ा गया। चीन का दावा है कि पुनः प्रयोज्य रॉकेट की पुनर्प्राप्ति के क्षेत्र में यह विश्व का पहला ऐसा तरीका है।
  • यह रॉकेट पुनः प्रयोज्य मोड में निम्न पृथ्वी कक्षा (LEO) में लगभग 16 टन पेलोड ले जाने में सक्षम है तथा चीन के कियानफान उपग्रह समूह, वाणिज्यिक प्रक्षेपण बाज़ार और भविष्य के चंद्र अन्वेषण अभियानों का समर्थन करेगा।

पुनः प्रयोज्य रॉकेट प्रौद्योगिकी : अवधारणा एवं प्रकार

  • पुनः प्रयोज्य रॉकेट क्या हैं?
    • पुनः प्रयोज्य रॉकेट ऐसे प्रक्षेपण यान हैं, जिनके चरणों अथवा प्रमुख घटकों को प्रक्षेपण के बाद पुनर्प्राप्त कर उनका पुनर्नवीनीकरण किया जाता है और भविष्य के अभियानों में पुनः उपयोग किया जाता है।
    • पारंपरिक एकल-उपयोग रॉकेटों के विपरीत, इन्हें पुनः प्रवेश (Re-entry) तथा सुरक्षित अवतरण को सहन करने के लिए डिज़ाइन किया जाता है, जिससे प्रत्येक प्रक्षेपण के लिए नया रॉकेट बनाने की आवश्यकता कम हो जाती है।
  • पुनः प्रयोज्यता क्यों महत्त्वपूर्ण है?
    • प्रथम चरण का बूस्टर प्रक्षेपण लागत का बड़ा हिस्सा होता है क्योंकि इसमें महंगे इंजन, एवियोनिक्स, ईंधन प्रणाली तथा संरचनात्मक घटक शामिल होते हैं।
    • इन घटकों की पुनर्प्राप्ति एवं पुनः उपयोग से अंतरिक्ष तक पहुँच की लागत में उल्लेखनीय कमी आती है तथा प्रक्षेपण की आवृत्ति बढ़ाई जा सकती है।
    • इसकी तुलना प्रायः वाणिज्यिक विमानन से की जाती है, जहाँ विमानों का बार-बार उपयोग किया जाता है, न कि एक बार उपयोग के बाद त्याग दिया जाता है।
  • पुनर्प्राप्ति (रिकवरी) प्रणालियों के प्रकार
    • ऊर्ध्वाधर प्रक्षेपण–ऊर्ध्वाधर अवतरण (VTVL)
    • रॉकेट का प्रक्षेपण ऊर्ध्वाधर रूप से होता है तथा नियंत्रित इंजन प्रज्वलन और सटीक मार्गदर्शन प्रणाली की सहायता से वह पुनः ऊर्ध्वाधर रूप से उतरता है।
    • इसके लिए उन्नत नौवहन, थ्रस्ट-वेक्टर नियंत्रण तथा स्वायत्त अवतरण प्रौद्योगिकियों की आवश्यकता होती है।
    • उदाहरण: स्पेसएक्स फाल्कन-9, स्पेसएक्स स्टारशिप बूस्टर, ब्लू ओरिजिन न्यू शेपर्ड, चीन का लॉन्ग मार्च-10B।
  • क्षैतिज लैंडिंग प्रणाली
    • प्रक्षेपण यान वायुमंडल में पुनः प्रवेश करने के बाद विमान की भाँति रनवे पर उतरता है।
    • इसके लिए वायुगतिकीय नियंत्रण सतहों तथा सुदृढ़ तापीय सुरक्षा प्रणाली की आवश्यकता होती है।
    • उदाहरण: इसरो का पुष्पक पुनः प्रयोज्य प्रक्षेपण यान (RLV), नासा स्पेस शटल।
  • पुनः प्रयोज्य रॉकेट कैसे कार्य करते हैं?
    • प्रक्षेपण के बाद पुनः प्रयोज्य चरण पेलोड ले जा रहे ऊपरी चरण से अलग हो जाता है।
    • मार्गदर्शन, नौवहन एवं नियंत्रण प्रणाली बूस्टर को नियंत्रित अवतरण पथ पर संचालित करती है।
    • निर्धारित मंच अथवा रनवे पर उतरने से पहले इंजन प्रज्वलन द्वारा उसकी गति कम की जाती है।
    • पुनर्प्राप्त यान का निरीक्षण, पुनर्नवीनीकरण तथा भविष्य के प्रक्षेपणों के लिए पुनः तैयार किया जाता है।

पुनः प्रयोज्य रॉकेट प्रौद्योगिकी का महत्त्व

  • अंतरिक्ष तक पहुँच की लागत में कमी: महंगे बूस्टर चरणों का पुनः उपयोग प्रक्षेपण लागत को उल्लेखनीय रूप से कम करता है, जिससे अंतरिक्ष अभियान अधिक किफायती बनते हैं।
  • प्रक्षेपण आवृत्ति में वृद्धि: कम तैयारी समय एवं पुनः उपयोग के कारण पारंपरिक एकल-उपयोग रॉकेटों की तुलना में अधिक बार प्रक्षेपण संभव हो पाता है।
  • विशाल उपग्रह समूहों का समर्थन: पुनः प्रयोज्य प्रक्षेपण प्रणालियाँ संचार एवं इंटरनेट सेवाओं के लिए बड़े उपग्रह नेटवर्क की लागत-प्रभावी तैनाती को संभव बनाती हैं।
  • भविष्य के गहन अंतरिक्ष अभियानों को सक्षम बनाना: कम प्रक्षेपण लागत से चंद्रमा, अन्य ग्रहों तथा मानव अंतरिक्ष अभियानों की दीर्घकालिक व्यवहार्यता बढ़ती है।
  • वाणिज्यिक अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था का विस्तार: किफायती एवं अधिक बार होने वाले प्रक्षेपण निजी क्षेत्र की भागीदारी को प्रोत्साहित करते हैं तथा वैश्विक अंतरिक्ष बाज़ार में प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाते हैं।

भारत के पुनः प्रयोज्य प्रक्षेपण यान संबंधी प्रयास

  • इसरो का RLV कार्यक्रम
    • इसरो पुनः प्रयोज्य प्रक्षेपण यान-प्रौद्योगिकी प्रदर्शन (RLV-TD) कार्यक्रम के माध्यम से एक पुनः प्रयोज्य प्रक्षेपण प्रणाली विकसित कर रहा है।
    • इस कार्यक्रम का उद्देश्य प्रक्षेपण लागत को कम करना तथा वैश्विक प्रक्षेपण बाज़ार में भारत की प्रतिस्पर्धात्मकता बढ़ाना है।
  • प्रमुख उपलब्धियाँ
    • HEX (हाइपरसोनिक उड़ान प्रयोग), 2016: वायुमंडलीय पुनः प्रवेश (Atmospheric Re-entry) प्रौद्योगिकियों का सफल प्रदर्शन किया।
    • LEX (लैंडिंग प्रयोग), 2023 एवं 2024: स्वायत्त रनवे अवतरण क्षमताओं का सफलतापूर्वक सत्यापन किया।
    • पुष्पक RLV: भविष्य की पुनः प्रयोज्य प्रक्षेपण प्रणालियों के लिए आवश्यक स्वायत्त अवतरण एवं पुनर्प्राप्ति प्रौद्योगिकियों का सफल प्रदर्शन किया।
  • भारत के लिए महत्त्व
    • भारतीय अंतरिक्ष अभियानों की प्रक्षेपण लागत में उल्लेखनीय कमी ला सकता है।
    • वैश्विक वाणिज्यिक प्रक्षेपण बाज़ार में भारत की स्थिति को और सुदृढ़ करता है।
    • भारत की विस्तारित होती अंतरिक्ष अर्थव्यवस्था तथा भविष्य के मानव अंतरिक्ष अभियानों के दीर्घकालिक लक्ष्यों को प्राप्त करने में सहायता करता है।

पुनः प्रयोज्य प्रौद्योगिकी में महारत हासिल करने की चुनौतियाँ

  • सटीक पुनर्प्राप्ति: विभिन्न वायुमंडलीय एवं परिचालन परिस्थितियों में विश्वसनीय अवतरण सुनिश्चित करना तकनीकी दृष्टि से अत्यंत चुनौतीपूर्ण है।
  • तापीय सुरक्षा: पुनः प्रवेश (Re-entry) के दौरान अत्यधिक ताप उत्पन्न होता है, जिसके लिए उन्नत ताप-रोधी कवच (Heat Shield) सामग्री तथा टिकाऊ संरचनाओं की आवश्यकता होती है।
  • पुनर्नवीनीकरण संबंधी आवश्यकताएँ: बार-बार निरीक्षण, मरम्मत एवं रखरखाव की आवश्यकता पुनः प्रयोज्यता से मिलने वाले आर्थिक लाभों को कम कर सकती है।
  • आर्थिक व्यवहार्यता: पुनः प्रयोज्य प्रणालियाँ तभी लागत-प्रभावी होती हैं, जब उनके पुनर्नवीनीकरण की लागत एवं पुनः प्रक्षेपण की तैयारी में लगने वाला समय, नए रॉकेट के निर्माण की लागत और समय की तुलना में काफी कम हो।
  • सुरक्षा एवं विश्वसनीयता: प्रक्षेपण यानों को अनेक उड़ान चक्रों के दौरान भी उच्च प्रदर्शन एवं विश्वसनीयता बनाए रखनी होती है।

भविष्य की संभावनाएँ

  • पुनः प्रयोज्य रॉकेट भविष्य में वाणिज्यिक प्रक्षेपण सेवाओं तथा उपग्रह-समूह की तैनाती की आधारशिला बनने की संभावना रखते हैं।
  • प्रणोदन, स्वचालन तथा पदार्थ विज्ञान में प्रगति से पुनः प्रयोज्य प्रक्षेपण प्रणालियों की दक्षता में और अधिक सुधार होगा।
  • जैसे-जैसे अधिक देश एवं निजी कंपनियाँ पुनः प्रयोज्यता में दक्षता प्राप्त करेंगी, प्रतिस्पर्धा बढ़ेगी, जिससे प्रक्षेपण लागत में कमी आएगी तथा अंतरिक्ष तक वैश्विक पहुँच का विस्तार होगा।
  • पुनः प्रयोज्य प्रक्षेपण यान भविष्य के चंद्र अभियानों, गहन अंतरिक्ष अन्वेषण तथा बाह्य अंतरिक्ष के दीर्घकालिक वाणिज्यीकरण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएँगे।
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