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सामान्य अध्ययन–3: भारतीय अर्थव्यवस्था तथा नियोजन, संसाधनों को जुटाने, आर्थिक संवृद्धि, विकास और रोजगार से संबंधित विषय।

संदर्भ: भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) की मौद्रिक नीति समिति (MPC) ने बढ़ते मुद्रास्फीति जोखिमों और वैश्विक आर्थिक अनिश्चितता के बीच नीतिगत रेपो दर में 25 आधार अंकों की वृद्धि करके इसे 5.50% कर दिया तथा अपनी मौद्रिक नीति के रुख को ‘तटस्थ’ से बदलकर ‘सुनियोजित मौद्रिक सख्ती’ कर दिया।

बैठक की प्रमुख विशेषताएँ

• रेपो दर: रेपो दर में 5.25% से 25 आधार अंकों की वृद्धि करके 5.50% कर दिया गया।

• फरवरी 2023 के बाद पहली बार दर में वृद्धि: यह वृद्धि मौद्रिक सहजता के उस चक्र के उलटाव को दर्शाती है, जिसके दौरान MPC ने रेपो दर को 6.50% से घटाकर 5.25% कर दिया था, अर्थात् इसमें कुल 125 आधार अंकों की कटौती की गई थी।

• MPC का निर्णय: रेपो दर बढ़ाने का निर्णय सर्वसम्मति से लिया गया, जबकि ‘क्रमिक सख्ती’ के रुख को बहुमत का समर्थन प्राप्त हुआ।

• अन्य नीतिगत दरें: स्थायी जमा सुविधा (SDF) की दर 5.25% है, जबकि सीमांत स्थायी सुविधा (MSF) की दर और बैंक दर 5.75% हैं।

• मुद्रास्फीति का परिदृश्य: वित्त वर्ष 2026–27 के लिए उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित मुद्रास्फीति का अनुमान पहले के 5.0% से बढ़ाकर 5.2% कर दिया गया।

• आर्थिक विकास का परिदृश्य: घरेलू आर्थिक गतिविधियों में लचीलेपन को देखते हुए वित्त वर्ष 2026–27 के लिए वास्तविक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) की वृद्धि दर का अनुमान बढ़ाकर 7.1% कर दिया गया।

• मौद्रिक नीति का भावी रुख: रुख में बदलाव से संकेत मिलता है कि निकट भविष्य में रेपो दर में कटौती की संभावना नहीं है। भविष्य में दर बढ़ाने या मौजूदा दर को यथावत रखने का निर्णय लिया जा सकता है।

निर्णय को प्रभावित करने वाले कारक

• भू-राजनीतिक तनाव और कच्चे तेल की कीमतें: पश्चिम एशिया में नए सिरे से बढ़े तनाव और कच्चे तेल की कीमतों के लगभग 100 अमेरिकी डॉलर प्रति बैरल तक पहुँचने से भारत में मुद्रास्फीति का जोखिम बढ़ गया है। भारत अपनी कच्चे तेल की आवश्यकता का लगभग 90% आयात करता है।

• मुद्रास्फीति के बढ़ते जोखिम: अगस्त में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) आधारित मुद्रास्फीति 4.82% रही। खाद्य पदार्थों की कीमतों का दबाव, अपर्याप्त मानसूनी परिस्थितियाँ और मौसम संबंधी व्यवधान मुद्रास्फीति को और बढ़ा सकते हैं। इसी कारण RBI ने वित्त वर्ष 2026–27 के लिए मुद्रास्फीति का अनुमान बढ़ाकर 5.2% कर दिया।

• वैश्विक वित्तीय परिस्थितियों में सख्ती: वैश्विक ब्याज दरों का ऊँचा स्तर, अमेरिकी ट्रेजरी बॉन्ड पर उच्च प्रतिफल और रुपये के मूल्य में गिरावट का दबाव वित्तीय परिस्थितियों को अधिक सख्त कर रहे हैं तथा आयातित मुद्रास्फीति के जोखिम को बढ़ा रहे हैं।

• घरेलू अर्थव्यवस्था में लचीलापन: मजबूत घरेलू माँग, विनिर्माण एवं सेवा क्षेत्र की स्थिति और वित्त वर्ष 2026–27 की पहली तिमाही में 7.8% की GDP वृद्धि दर्शाती है कि भारतीय अर्थव्यवस्था सख्त मौद्रिक परिस्थितियों का सामना करने में सक्षम है।

• चलनिधि की स्थिति: RBI ने विशेष विदेशी मुद्रा स्वैप सुविधा के अंतर्गत FCNR(B) जमाओं के माध्यम से 132.98 अरब अमेरिकी डॉलर जुटाए जाने के बाद बैंकिंग प्रणाली में बढ़ी हुई चलनिधि पर भी विचार किया। इसके कारण चलनिधि को संतुलित तरीके से अवशोषित करना आवश्यक हो गया।

मौद्रिक नीति समिति (MPC) के बारे में

• इसकी स्थापना सितंबर 2016 में भारतीय रिज़र्व बैंक अधिनियम, 1934 (RBI अधिनियम) की धारा 45ZB (1) के अंतर्गत की गई थी।

• उर्जित पटेल समिति ने मौद्रिक नीति समिति के गठन की सिफारिश की थी।

• MPC की प्रमुख भूमिका मुद्रास्फीति लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए आवश्यक नीतिगत दर निर्धारित करना है।

• RBI अधिनियम की धारा 42B (2) के अनुसार, MPC में निम्नलिखित सदस्य होते हैं:

  • RBI का गवर्नर, जो पदेन अध्यक्ष होता है।
  • RBI का उप-गवर्नर, जो मौद्रिक नीति के लिए उत्तरदायी होता है और पदेन सदस्य होता है।
  • RBI का एक अधिकारी, जिसे केंद्रीय निदेशक मंडल द्वारा नामित किया जाता है और जो पदेन सदस्य होता है।
  • केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त तीन व्यक्ति, जो सदस्य होते हैं।

• केंद्र सरकार द्वारा नियुक्त सदस्य चार वर्ष के कार्यकाल के लिए पद धारण करते हैं या अगले आदेश तक पद पर रहते हैं—इनमें से जो भी पहले हो।

• RBI अधिनियम की धारा 45ZA के अनुसार, मुद्रास्फीति का लक्ष्य 4% निर्धारित किया गया है, जिसकी ऊपरी सहनशीलता सीमा 6% और निचली सहिष्णु सीमा 2% है।

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