संबंधित पाठ्यक्रम
सामान्य अध्ययन-2: सरकारी नीतियाँ और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए हस्तक्षेप, उनके अभिकल्पन और कार्यान्वयन से संबंधित विषय।
सामान्य अध्ययन -3: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण।
संदर्भ: हाल ही में विश्व बैंक ने “स्टेट एंड ट्रेंड्स ऑफ कार्बन प्राइसिंग 2026” रिपोर्ट जारी की है, जो बढ़ती जलवायु प्रतिबद्धताओं और ऊर्जा-संक्रमण के प्रयासों के बीच कार्बन मूल्य निर्धारण तंत्र तथा कार्बन क्रेडिट बाजारों के तेजी से होते वैश्विक विस्तार को रेखांकित करती है।
अन्य संबंधित जानकारी

- यह रिपोर्ट कार्बन करों, उत्सर्जन व्यापार प्रणालियों (ETSs) और कार्बन क्रेडिट बाजारों में होने वाले वैश्विक विकास पर नज़र रखती है।
- यह विकसित और विकासशील दोनों अर्थव्यवस्थाओं में कार्बन मूल्य निर्धारण तंत्र के निरंतर विस्तार को रेखांकित करती है, जिसके तहत भारत, जापान और वियतनाम जैसे देशों में नई उत्सर्जन व्यापार प्रणालियां (ETSs) लागू की जा रही हैं।
- इसमें यूरोपीय संघ के ‘कार्बन सीमा समायोजन तंत्र’ (CBAM) जैसे तंत्रों के माध्यम से वैश्विक व्यापार के साथ जलवायु नीति के बढ़ते एकीकरण का भी उल्लेख किया गया है।
- रिपोर्ट में उच्च-विश्वसनीयता वाले कार्बन क्रेडिट बाजारों, CORSIA जैसे अंतरराष्ट्रीय विमानन-सम्बंधित कार्बन तंत्रों तथा पेरिस समझौता क्रेडिटिंग तंत्र (PACM) के क्रियान्वयन के बढ़ते महत्व को भी रेखांकित किया गया है।
रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष
- वैश्विक कार्बन प्राइसिंग का विस्तार
- वर्तमान में प्रत्यक्ष कार्बन मूल्य निर्धारण तंत्रों के तहत विश्वभर में लागू 87 नीतियों के माध्यम से वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन का लगभग 29% भाग शामिल है।
- उत्सर्जन व्यापार प्रणाली (ETSs) के अंतर्गत कवरेज 2016 के बाद तीन गुना बढ़कर 8% से बढ़कर वैश्विक उत्सर्जन के 24% से अधिक तक पहुँच गया है, जबकि कार्बन करों के अंतर्गत हिस्सा लगभग 4-5% पर अपेक्षाकृत स्थिर बना हुआ है।
- यदि वर्तमान में विकसित की जा रही उत्सर्जन व्यापार प्रणालियों और कार्बन कर पूरी तरह लागू हो जाते हैं, तो 2030 तक वैश्विक उत्सर्जन का लगभग एक-तिहाई भाग कार्बन मूल्य निर्धारण के दायरे में आ सकता है।
- बढ़ते कार्बन मूल्य
- वैश्विक औसत कार्बन मूल्य 2016 में US$ 10/tCO₂e से लगभग दोगुना बढ़कर 2026 में लगभग US$ 21/tCO₂e हो गया है।
- औसत कार्बन कर दरें अपेक्षाकृत स्थिर बनी हुई हैं, लेकिन 2026 के लिए निर्धारित वृद्धि सिंगापुर सहित कई क्षेत्रों में लागू हो चुकी है, जहाँ कार्बन कर दर में 80% की वृद्धि की गई है।
- कार्बन प्रिसिंग राजस्व में वृद्धि
- ETSs और कार्बन करों से प्राप्त वार्षिक राजस्व 2025 में US$ 107 बिलियन से अधिक हो गया, जबकि 2016 में यह US$ 30 बिलियन से भी कम था। साथ ही, 2021 से यह प्रतिवर्ष US$ 100 बिलियन से ऊपर बना हुआ है।
- अधिकांश कार्बन मूल्य निर्धारण से प्राप्त राजस्व अभी भी विकसित अर्थव्यवस्थाओं में केंद्रित है, हालांकि विकासशील देश भी तेजी से कार्बन मूल्य निर्धारण तंत्रों को अपना रहे हैं।
- कार्बन क्रेडिट बाजारों में रुझान
- वैश्विक कार्बन क्रेडिट जारीकरण में 2024 से 2025 के बीच 8% की वृद्धि हुई, हालांकि यह अभी भी 2022 के स्तर से 20% कम है।
- अंतरराष्ट्रीय विमानन हेतु कार्बन ऑफसेटिंग एवं न्यूनीकरण योजना (CORSIA) के अंतर्गत पात्र क्रेडिट्स का व्यापार अधिकांश अन्य कार्बन क्रेडिट्स की तुलना में प्रीमियम कीमतों पर हुआ।
- खरीदार अब अधिक विश्वसनीय तृतीय-पक्ष सत्यापन और पर्यावरणीय विश्वसनीयता वाले उच्च-गुणवत्ता कार्बन क्रेडिट्स को प्राथमिकता दे रहे हैं।
कार्बन प्राइसिंग का महत्व
- जलवायु शमन को समर्थन: कार्बन मूल्य निर्धारण उत्सर्जन में कमी लाने तथा स्वच्छ प्रौद्योगिकियों और नवीकरणीय ऊर्जा की ओर संक्रमण हेतु आर्थिक प्रोत्साहन प्रदान करता है।
- जलवायु वित्त जुटाना: कार्बन करों और ETSs से प्राप्त राजस्व ऊर्जा संक्रमण, हरित अवसंरचना, जलवायु अनुकूलन तथा निम्न-कार्बन नवाचार को समर्थन दे सकता है।
- हरित नवाचार को प्रोत्साहन: स्थिर कार्बन मूल्य उद्योगों को स्वच्छ उत्पादन प्रणालियों, कार्बन कैप्चर प्रौद्योगिकियों और ऊर्जा-कुशल प्रक्रियाओं में निवेश के लिए प्रेरित करते हैं।
भारत और कार्बन प्राइसिंग
- उत्सर्जन में कमी हेतु भारत का बाज़ार-आधारित दृष्टिकोण प्रारम्भ में 2012 में राष्ट्रीय उन्नत ऊर्जा दक्षता मिशन (NMEEE) के अंतर्गत शुरू की गई परफॉर्म, अचीव एंड ट्रेड (PAT) योजना के माध्यम से विकसित हुआ, जिसमें ऊर्जा-गहन उद्योगों के लिए व्यापार योग्य ऊर्जा बचत प्रमाणपत्र (ESCerts) शुरू किए गए।
- इसके बाद भारत ने नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन को बढ़ावा देने तथा राज्यों में नवीकरणीय खरीद दायित्वों (RPOs) को सुगम बनाने के लिए नवीकरणीय ऊर्जा प्रमाणपत्र (REC) तंत्र को लागू किया।
- PAT और REC के अनुभवों के आधार पर, सरकार ने ऊर्जा संरक्षण (संशोधन) अधिनियम, 2022 के तहत जून 2023 में कार्बन क्रेडिट ट्रेडिंग सिस्टम (CCTS) अधिसूचित किया, जिसका उद्देश्य कार्बन क्रेडिट प्रमाणपत्रों (CCCs) के व्यापार के माध्यम से एक संरचित कार्बन बाजार स्थापित करना है।
- ऊर्जा दक्षता ब्यूरो (BEE) भारतीय कार्बन बाजार ढाँचे के प्रशासक के रूप में कार्य करता है, जबकि केंद्रीय विद्युत विनियामक आयोग (CERC) कार्बन बाजार के व्यापारिक पहलुओं का विनियमन करता है।
- रिपोर्ट के अनुसार, CCTS के शुभारम्भ के साथ भारत विश्व के सबसे बड़े नए कार्बन बाजारों में से एक बनकर उभरा है। वर्तमान में केवल चीन, यूरोपीय संघ और कोरिया गणराज्य की उत्सर्जन व्यापार प्रणालियाँ (ETSs) ही भारत की नई प्रणाली की तुलना में अधिक मात्रा में ग्रीनहाउस गैस (GHG) उत्सर्जन को कवर करती हैं।

