संबंधित पाठ्यक्रम

सामान्य अध्ययन-1: विश्वभर में प्रमुख प्राकृतिक संसाधनों का वितरण।

सामान्य अध्ययन -3: औद्योगिक नीति में परिवर्तन एवं औद्योगिक विकास पर उनके प्रभाव।

संदर्भ: खान मंत्रालय ने ग्रेट निकोबार द्वीप के पास 1,632 वर्ग किमी क्षेत्रफल वाले दो अपतटीय ब्लॉकों को बहुधात्विक पिंडों और क्रस्ट के लिए संयुक्त लाइसेंस प्रदान करने हेतु अधिसूचित किया है। यह अपतटीय महत्वपूर्ण-खनिज संसाधनों पर भारत के बढ़ते ध्यान को दर्शाता है।

अन्य संबंधित जानकारी

  • अधिसूचित किए गए दो ब्लॉक हैं— वेस्ट सेवेल रिज-01 (1,000 वर्ग किमी) और सेवेल राइज-01 (632 वर्ग किमी)। दोनों अंडमान सागर में ग्रेट निकोबार द्वीप के पास स्थित हैं।
  • इन्हें संयुक्त लाइसेंस के लिए अधिसूचित किया गया है। इसके तहत सफल बोलीदाता किसी भी बाद के खनन कार्य से पहले खनिज की संभावनाओं को स्थापित करने के लिए आगे की खोज करता है। यह कार्य वैधानिक अनुमोदनों और निर्धारित शर्तों के अधीन होता है।
  • यह कदम 2024 में ग्रेट निकोबार के पास बहुधात्विक पिंड और क्रस्ट वाले सात ब्लॉकों की असफल नीलामी के बाद उठाया गया है। इस प्रकार, नवीनतम अधिसूचना अपतटीय खनिज संसाधनों के विकास के भारत के नवीकृत प्रयास के संदर्भ में महत्वपूर्ण है।

समुद्र तल के खनिज संसाधनों को समझना

  • समुद्र तल के खनिज (Seabed minerals) विभिन्न भूवैज्ञानिक परिवेशों में पाए जाते हैं और इनमें निकल, कोबाल्ट, तांबा और मैंगनीज जैसी धातुएँ होती हैं, जो नवीकरणीय ऊर्जा प्रौद्योगिकियों, इलेक्ट्रिक वाहनों, विद्युत ग्रिड और सौर प्रणालियों के लिए महत्वपूर्ण हैं।
  • भारत अंतरराष्ट्रीय जल क्षेत्रों में ISA अनुबंधों के साथ-साथ अपने घरेलू अपतटीय-खनिज ढाँचे के माध्यम से विभिन्न समुद्र तल खनिज संसाधनों की खोज कर रहा है। वर्तमान में भारत के पास बहुधात्विक पिंडों (PMN) के लिए एक ISA अनुबंध और बहुधात्विक सल्फाइडों (PMS) के लिए दो अनुबंध हैं।
  • बहुधात्विक पिंड समुद्र तल पर खनिज-समृद्ध पिंडों के रूप में पाए जाते हैं; बहुधात्विक सल्फाइड महासागरीय कटक के साथ स्थित जलतापीय प्रणालियों से जुड़े होते हैं; जबकि बहुधात्विक क्रस्ट खुले चट्टानी सतहों, विशेष रूप से समुद्री पर्वतों (Seamounts) पर खनिज-समृद्ध परतों के रूप में बनते हैं।
  • सितंबर 2025 में भारत ने PMS की खोज के लिए कार्ल्सबर्ग रिज के 10,000 वर्ग किमी क्षेत्र को कवर करने वाले 15-वर्षीय ISA अनुबंध पर हस्ताक्षर किए। इसके साथ भारत ISA के साथ दो PMS अन्वेषण अनुबंध रखने वाला पहला देश बन गया।

भारत का अपतटीय खनिज शासन ढाँचा

  • OAMDR अधिनियम, 2002: यह भारत के प्रादेशिक जल, महाद्वीपीय शेल्फ, अनन्य आर्थिक क्षेत्र (EEZ) तथा अन्य समुद्री क्षेत्रों में खनिज संसाधनों के विकास और विनियमन के लिए वैधानिक ढाँचा प्रदान करता है।
  • संयुक्त लाइसेंस: इसे 2023 के संशोधन के माध्यम से शुरू किया गया। यह दो चरणों वाला परिचालन अधिकार है, जिसमें अन्वेषण के बाद उत्पादन शामिल है। परिचालन अधिकार प्रतिस्पर्धी नीलामी के माध्यम से आवंटित किए जाते हैं।
  • घरेलू–अंतरराष्ट्रीय अंतर: अंतरराष्ट्रीय समुद्र तल क्षेत्रों में भारत की गतिविधियाँ ISA अन्वेषण अनुबंधों के माध्यम से संचालित होती हैं, जबकि ग्रेट निकोबार के ब्लॉकों की पेशकश भारत के घरेलू OAMDR ढाँचे के तहत की जाती है।
  • पर्यावरणीय घटक: भारत के ISA अन्वेषण अनुबंधों में संसाधन आकलन और पर्यावरणीय अध्ययन आवश्यक हैं, जिनमें भूवैज्ञानिक, भूभौतिकीय, समुद्रविज्ञान संबंधी और जैविक आँकड़ों का संग्रह तथा जैव विविधता की आधारभूत स्थिति का आकलन शामिल है।

भारत के लिए महत्व

  • महत्वपूर्ण खनिज सुरक्षा: अपतटीय संसाधन नवीकरणीय ऊर्जा और उन्नत प्रौद्योगिकियों के लिए महत्वपूर्ण खनिजों की आपूर्ति के स्रोतों में विविधता ला सकते हैं।
  • गहरे समुद्र में क्षमता: अन्वेषण से समुद्र तल मानचित्रण, समुद्र विज्ञान, विशेषीकृत उपकरणों और गहरे समुद्र की प्रौद्योगिकियों में विशेषज्ञता मजबूत होती है।
  • ब्लू इकोनॉमी: यह समुद्री संसाधनों के संबंध में भारत की वैज्ञानिक और तकनीकी भागीदारी का विस्तार करता है तथा डीप ओशन मिशन के उद्देश्यों को पूरा करने में सहायक है।
  • संसाधन विविधीकरण: अपतटीय अन्वेषण स्थलीय अन्वेषण और महत्वपूर्ण खनिजों की सुरक्षित आपूर्ति के लिए भारत के अंतरराष्ट्रीय प्रयासों का पूरक है।

पर्यावरणीय एवं सामाजिक-आर्थिक चिंताएँ

  • सीमित पारिस्थितिक ज्ञान: गहरे समुद्र की पारिस्थितिक प्रणालियाँ अभी भी अच्छी तरह समझी नहीं गई हैं, जिससे बड़े पैमाने पर होने वाले व्यवधान के परिणामों का अनुमान लगाना कठिन है।
  • समुद्र तल में व्यवधान: भविष्य में वाणिज्यिक खनन से समुद्र तल के जीवों के आवासों (Benthic habitats) में भौतिक व्यवधान उत्पन्न हो सकता है और संबंधित समुद्री पारिस्थितिक तंत्र प्रभावित हो सकते हैं।
  • ग्रेट निकोबार की संवेदनशीलता: गतिविधियों में इस क्षेत्र से जुड़ी पारिस्थितिक और सामुदायिक चिंताओं को ध्यान में रखना आवश्यक है, जिनमें प्रवाल भित्तियाँ, लेदरबैक कछुओं के घोंसले बनाने के स्थल, निकोबार मेगापोड के घोंसले बनाने वाले क्षेत्र तथा ग्रेट निकोबारी समुदाय की पैतृक भूमि शामिल हैं।
  • खनिज सुरक्षा बनाम संरक्षण: महत्वपूर्ण खनिजों की आवश्यकता को पुनर्चक्रण, संसाधन दक्षता, विकल्पों के उपयोग और चक्रीय अर्थव्यवस्था जैसे उपायों के साथ संतुलित किया जाना चाहिए, न कि खनिज सुरक्षा के एकमात्र उपाय के रूप में खनन को देखा जाना चाहिए।

आगे की राह

  • विज्ञान-आधारित अन्वेषण: वाणिज्यिक खनन से संबंधित निर्णयों से पहले भूवैज्ञानिक, समुद्रविज्ञान संबंधी और जैव विविधता संबंधी आकलनों को मजबूत किया जाना चाहिए।
  • सावधानीपूर्ण विनियमन: कठोर पर्यावरणीय आकलन, निरंतर निगरानी और अनुकूली सुरक्षा उपायों को लागू किया जाना चाहिए, ताकि वैज्ञानिक समझ में सुधार के साथ सुरक्षा उपायों को भी अनुकूलित किया जा सके।
  • खनन के दबाव को कम करना: नए खनन किए गए खनिजों पर निर्भरता कम करने के लिए पुनर्चक्रण, संसाधन दक्षता और पदार्थों के विकल्प को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।
  • अन्वेषण और दोहन को अलग रखना: वैज्ञानिक अन्वेषण और तकनीकी विकास जारी रह सकते हैं, जबकि वाणिज्यिक खनन को संसाधन की सिद्ध क्षमता, तकनीकी व्यवहार्यता और पर्याप्त पारिस्थितिक सुरक्षा उपायों के प्रदर्शन पर निर्भर रखा जाना चाहिए।
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