अंडमान द्वीप में नई नीले धब्बों वाली डैम्सेलफ्लाई प्रजाति की खोज
भारतीय प्राणी सर्वेक्षण और मद्रास विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने अंडमान द्वीप समूह में डैम्सेलफ्लाई की एक नई प्रजाति, ‘मोर्टोनाग्रियन संथा‘ (Mortonagrion santha) की खोज की है।
अन्य संबंधित जानकारी

- यह प्रजाति अंडमान और निकोबार द्वीप समूह की रंगात तहसील के दसरथपुर में खोजी गई।
- इसे पहली बार 2017 में देखा गया था और बाद में 2019 में नमूने एकत्र करके इसकी पुष्टि की गई।
- इस प्रजाति का नाम भारतीय कीटविज्ञानी पी. संथाकुमार के नाम पर रखा गया है।
‘मोर्टोनाग्रियन संथा‘ के बारे में
- यह ‘मोर्टोनाग्रियन’ वंश से संबंधित है, जिसमें छोटी और गुप्त रूप से रहने वाली डैम्सेलफ्लाई शामिल हैं जो मीठे पानी के आर्द्रभूमि और वनस्पति वाले आवासों में रहती हैं।
- यह अपने सबसे करीबी ज्ञात रिश्तेदार, ‘मोर्टोनाग्रियन आर्थुरी’ से निम्न आधारों पर भिन्न है:
- आंखों के पीछे हल्के नीले रंग के अर्धचंद्राकार धब्बे।
- पेट के नौवें खंड पर एक विशिष्ट नीला निशान।
- अद्वितीय प्रोथोरेक्स और नर उपांग संरचनाएं।
‘ईचथलकेंडा इनकोग्निटा‘: पश्चिमी घाट में मछली की नई प्रजाति की खोज
संदर्भ: वैज्ञानिकों ने पेरियार टाइगर रिज़र्व से मीठे पानी की एक नई मछली प्रजाति, ‘ईचथलकेंडा इनकोग्निटा‘ (Eechathalakenda incognita) की खोज की है, जिसने दशकों पुरानी वर्गीकरण संबंधी पहेली को सुलझा लिया है।
अन्य संबंधित जानकारी:

- यह प्रजाति पश्चिमी घाट में केरल स्थित पेरियार टाइगर रिज़र्व की जलधाराओं में खोजी गई।
- लगभग 70 वर्षों तक इसे गलती से ‘ईचथलकेंडा ओफिसिफाला‘ समझा जाता रहा था।
- विस्तृत रूपात्मक और डीएनए विश्लेषणों ने पुष्टि की है कि पेरियार की यह आबादी एक अलग प्रजाति है।
- इस खोज के साथ ही, ई. इनकोग्निटा पेरियार टाइगर रिज़र्व से ज्ञात नौवीं ‘पॉइंट-एंडेमिक’ (विशेष भौगोलिक क्षेत्र तक सीमित) मछली प्रजाति बन गई है।
‘ईचथलकेंडा इनकोग्निटा‘ के बारे में:
- ई. ओफिसिफाला में विषमकोण आकार के शल्क होते हैं।
- ई. इनकोग्निटा निम्नलिखित विशेषताओं से भिन्न है:
- शरीर के ऊपरी हिस्से पर गोलाकार शल्क।
- एक प्रमुख गहरा पार्श्व धारी।
- पंख- किरण (fin-ray) की संख्या और आनुवंशिक संरचना में अंतर।
- दोनों प्रजातियां संकीर्ण रूप से स्थानिक हैं, जहाँ ई. ओफिसिफाला ऊपरी पंबा नदी तक और ई. इनकोग्निटा पेरियार टाइगर रिज़र्व की जलधाराओं तक ही सीमित है।
‘बैस्कानिचथिस चेपाकाकिएन्सिस‘: स्नेक ईल की नई प्रजाति की खोज
संदर्भ: वैज्ञानिकों ने बंगाल की खाड़ी से स्नेक ईल (सांप जैसी मछली) की एक नई प्रजाति, ‘बैस्कानिचथिस चेपाकाकिएन्सिस’ की खोज की है। इसके साथ ही, ‘बैस्कानिचथिस’ वंश में ज्ञात प्रजातियों की कुल संख्या बढ़कर 20 हो गई है।
अन्य संबंधित जानकारी

- इस प्रजाति का नमूना भारत के पूर्वी तट पर स्थित ‘काकीनाडा फिशिंग हार्बर’ में पकड़ी गई मछलियों के बीच से एकत्र किया गया था।
- यह खोज ICAR-नेशनल ब्यूरो ऑफ फिश जेनेटिक रिसोर्सेज, केरल यूनिवर्सिटी ऑफ फिशरीज एंड ओशन स्टडीज और भारतीय प्राणी सर्वेक्षण के शोधकर्ताओं द्वारा की गई है।
- इस प्रजाति का नाम तेलुगु शब्द “चेपा” (मछली) और “काकी” (काकीनाडा से व्युत्पन्न) को जोड़कर रखा गया है, जो इसकी खोज के स्थान को दर्शाता है।
इस प्रजाति के बारे में:
- यह स्नेक ईल परिवार (Ophichthidae) से संबंधित है।
- यह एक अत्यंत लंबी और पतली ईल है, जिसका शरीर दो रंगों का होता है।
- इसकी मुख्य विशेषताओं में छोटा थूथन, दांतों की अनूठी व्यवस्था, कम प्री-एनल कशेरुकाएं और छोटे फ्लैप जैसे पेक्टोरल पंख शामिल हैं।
- यह अपने सबसे करीबी ज्ञात रिश्तेदार, ‘बैस्कानिचथिस डेरानियागालाई’ से पंखों की स्थिति, पूंछ की लंबाई और थूथन की शारीरिक संरचना के मामले में भिन्न है।
भारतीय प्राणी सर्वेक्षण ने होवरफ्लाई की दो नई प्रजातियों की खोज की
संदर्भ: भारतीय प्राणी सर्वेक्षण (ZSI) के वैज्ञानिकों ने पश्चिम बंगाल के गंगा के मैदानी इलाकों में होवरफ्लाई की दो नई प्रजातियों ‘एरिस्टालिनस सैफिरिनस‘ और ‘एरिस्टालिनस ब्रुनेटी‘ की खोज की है।
नई प्रजातियों के बारे में:

- ‘एरिस्टालिनस सैफिरिनस‘: इसका नाम इसके आकर्षक नीलम-नीले धात्विक रंग के कारण रखा गया है।
- ‘एरिस्टालिनस ब्रुनेटी‘: यह नाम एनरिको एडेलेल्मो ब्रुनेटी के सम्मान में रखा गया है, जो भारतीय मक्खियों के अध्ययन में उनके अग्रणी योगदान को मान्यता देता है।
महत्व:
- ‘यूरोपियन जर्नल ऑफ टैक्सोनॉमी’ में प्रकाशित ये खोजें, 1923 में ब्रुनेटी के ऐतिहासिक कार्य के बाद से भारत में ‘एरिस्टालिनस’ विविधता में पहली बड़ी वृद्धि को दर्शाती हैं।
- होवरफ्लाई (परिवार: Syrphidae) महत्वपूर्ण परागणक हैं और पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य में योगदान देती हैं।
होवरफ्लाई की पारिस्थितिक भूमिका:
- वयस्क होवरफ्लाई जंगली और खेती वाले पौधों, दोनों के परागण में मदद करती हैं।
- इनके लार्वा, जिन्हें “रैट-टेल्ड मैगॉट्स” (rat-tailed maggots) कहा जाता है, जलीय वातावरण में रहते हैं जहाँ वे जैविक पदार्थों को विघटित करते हैं और पोषक तत्वों का पुनर्चक्रण करते हैं।
एनाफैलिस सह्याद्रिका: पश्चिमी घाट में खोजी गई नई पादप प्रजाति
संदर्भ: दक्षिण पश्चिमी घाट में एस्टेरेसी (सूरजमुखी/डेज़ी परिवार) से संबंधित एक नई पादप प्रजाति, एनाफैलिस सह्याद्रिका की खोज की गई है।
अन्य संबंधित जानकारी

- यह प्रजाति केरल में अनामुडी और मीसापुलिमला सहित उच्च-ऊँचाई वाले पर्वतीय घास के मैदानों और शोला वन के किनारों पर पाई गई है।
- यह खोज पश्चिमी घाट की ज्ञात वानस्पतिक विविधता को समृद्ध करती है, जो विश्व के प्रमुख जैव-विविधता हॉटस्पॉट में से एक है।
एनाफैलिस सह्याद्रिका के बारे में
- यह एक उप-क्षुप (subshrub) है जो समुद्र तल से 2,200 मीटर से अधिक की ऊंचाई पर उगता है।
- इसकी पत्तियां चिकनी और रोमहीन होती हैं, जिनमें तीन स्पष्ट शिराएं होती हैं।
- यह पौधा लगभग एक मीटर की ऊंचाई तक बढ़ता है और इसमें 90 से 120 तक सफेद, अर्धगोलाकार पुष्प-शीर्ष उत्पन्न होते हैं।
