कोन्यक जनजाति के औषधीय नुस्खे में कैंसर-रोधी गुण
संदर्भ: नागालैंड विश्वविद्यालय के शोधकर्ताओं ने ब्रह्मपुर विश्वविद्यालय और सवेथा मेडिकल कॉलेज के सहयोग से, कोन्यक नागा जनजाति द्वारा उपयोग किए जाने वाले एक पारंपरिक औषधीय नुस्खे में कैंसर-रोधी क्षमता की पहचान की है।
कोन्यक जनजाति के बारे में:

- कोन्यक सबसे बड़ी नागा जनजाति है, जो मुख्य रूप से नागालैंड के मोन जिले में निवास करती है। इनकी बस्तियाँ म्यांमार और अरुणाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों तक भी फैली हुई हैं।
- माना जाता है कि “कोन्यक” शब्द ‘व्हाओ’ (Whao – सिर) और ‘न्याक’ (Nyak – काला) से बना है, जिसका अर्थ है “काले बालों वाले पुरुष”।
- इन्हें दो समूहों में विभाजित किया गया है:
- थेंदु: “टैटू वाले चेहरे” (मुख्यतः मध्य मोन क्षेत्र)।
- थेंथो: “सफ़ेद चेहरे” (ऊपरी और निचले क्षेत्र, विशेष रूप से वाकचिंग क्षेत्र)।
- राजनीतिक व्यवस्था (अंघ प्रणाली): कोन्यक अपनी वंशानुगत राजशाही व्यवस्था के लिए अद्वितीय हैं, जिसके प्रमुख को ‘अंघ’ कहा जाता है।
- अंघ दो प्रकार के होते हैं: पोंगयिन अंघ (महान प्रमुख/राजा) और अंघहा (ग्राम प्रमुख)।
- जिन गाँवों में पोंगयिन अंघ नहीं होता, वहाँ मुख्य वंश के तहत एक अंघहा नियुक्त किया जाता है।
- शासन संचालन में कुल के बुजुर्गों की एक ग्राम परिषद (नोकफोंग) सहायता करती है।
- भाषा: भाषाई रूप से, कोन्यक तिब्बती-बर्मी परिवार के नागा-कुकी समूह से संबंधित हैं।
- प्रत्येक गाँव की अपनी बोली है; वाकचिंग बोली का उपयोग आमतौर पर संचार के लिए किया जाता है।
- सामाजिक और सांस्कृतिक संस्थान:
- बान: यह मोरुंग जैसी संस्था है, जो युवाओं के लिए युद्ध कला, शिल्प, शिकार, नृत्य और सामाजिक जीवन का प्रशिक्षण केंद्र थी।
- यो (Ywo): महिलाओं के लिए पारंपरिक शिक्षण स्थान।
- ये दोनों संस्थान अब लगभग अस्तित्व में नहीं हैं।
- त्योहार: कोन्यक जीवन में त्योहारों का विशेष महत्व है और ये कृषि से जुड़े हुए हैं:
- आओलिंग / आओलिंगमोन्यु – अप्रैल: यह नए साल और बुवाई के मौसम का प्रतीक है।
- आओन्यीमो – जुलाई/अगस्त: पहली फसल की कटाई के बाद मनाया जाता है।
- लाओन-ओंगमो: कृषि गतिविधियों के पूरा होने के बाद मनाया जाने वाला ‘थैंक्सगिविंग’ (कृतज्ञता ज्ञापन) उत्सव।
- धर्म और मान्यता: पारंपरिक रूप से ये अनीश्वरवादी/प्रकृतिपूजक रहे हैं, जो प्रकृति की आत्माओं और एक सर्वोच्च देवता (काहवांग) में विश्वास करते थे। वर्तमान में, अधिकांश कोन्यक ईसाई धर्म के अनुयायी हैं।
- सामान्य पारंपरिक पेय: खालप (काली चाय)।
9वाँ हिंद महासागर सम्मेलन (IOC 2026)
संदर्भ: हाल ही में, 10-12 अप्रैल, 2026 तक मॉरीशस में 9वें हिंद महासागर सम्मेलन (IOC 2026) का आयोजन किया गया। यह सम्मेलन इंडिया फाउंडेशन द्वारा मॉरीशस सरकार और भारत के विदेश मंत्रालय के सहयोग से आयोजित किया गया था।
सम्मेलन के मुख्य बिंदु:
- रणनीतिक पारिस्थितिकी तंत्र के रूप में हिंद महासागर: विदेश मंत्री जयशंकर ने इस बात पर बल दिया कि यह महासागर संसाधनों, कनेक्टिविटी और सांस्कृतिक आदान-प्रदान का आधार है। उन्होंने चेतावनी दी कि इस पारिस्थितिकी तंत्र में व्यवधान के दूरगामी वैश्विक परिणाम हो सकते हैं।

- “चोक पॉइंट्स” पर बढ़ती चिंता: पारंपरिक समुद्री चोक पॉइंट्स के अतिरिक्त, वित्त, प्रौद्योगिकी, संसाधन और ज्ञान प्रणालियों में नई बाधाएं उत्पन्न हो रही हैं, जिसके लिए स्वतंत्र और लचीले वैश्विक प्रवाह की आवश्यकता है।
- सामूहिक लचीलेपन का आह्वान (ग्लोबल साउथ पर बल): इस क्षेत्र को “ग्लोबल साउथ ओशन” के रूप में वर्णित करते हुए, उन्होंने साझा चुनौतियों से निपटने के लिए मजबूत सहयोग का आह्वान किया, जैसे: खाद्य, ईंधन और उर्वरक की कमी, आपदा प्रतिक्रिया, वैश्विक संघर्षों के दुष्प्रभाव।
- समुद्री स्थिरता और वैश्विक संघर्ष: पश्चिम एशिया में तनाव का संदर्भ देते हुए, उन्होंने नागरिक जीवन की रक्षा करने, निर्बाध समुद्री नौवहन सुनिश्चित करने और ऊर्जा की कीमतों, व्यापार प्रवाह एवं खाद्य सुरक्षा पर पड़ने वाले प्रभावों को संबोधित करने की आवश्यकता पर बल दिया।
- भारत का दृष्टिकोण: भारत के दृष्टिकोण को ‘पड़ोस प्रथम’ नीति और सामूहिक लचीलेपन एवं सहयोग पर आधारित समुद्री दृष्टिकोण से जोड़ा गया।
हिंद महासागर सम्मेलन(IOC)के बारे में
- इसे 2016 में इंडिया फाउंडेशन द्वारा क्षेत्रीय थिंक टैंक और संस्थानों के सहयोग से शुरू किया गया था।
- यह क्षेत्र में सभी के लिए सुरक्षा और विकास (SAGAR) के दृष्टिकोण के तहत क्षेत्रीय सहयोग, समुद्री सुरक्षा और विकास पर हिंद महासागर के देशों के बीच संवाद के लिए एक प्रमुख मंच के रूप में विकसित हुआ है।
- विषय (9वाँ संस्करण): “हिंद महासागर शासन के लिए सामूहिक नेतृत्व”। इसने हिंद महासागर क्षेत्र के नेताओं, नीति निर्माताओं और विशेषज्ञों को क्षेत्रीय सहयोग, समुद्री शासन और साझा चुनौतियों पर विचार-विमर्श करने के लिए एक मंच प्रदान किया।
- 8वाँ IOC 2025 फरवरी 2025 में मस्कट, ओमान में आयोजित किया गया था।
- विषय: “समुद्री साझेदारी के नए क्षितिज की यात्रा” (Voyages to New Horizons of Maritime Partnership)।
- 2016 में अपनी स्थापना के बाद से, हिंद महासागर सम्मेलन (IOC) की मेजबानी विभिन्न प्रमुख देशों द्वारा की गई है—सिंगापुर (2016), श्रीलंका (2017), वियतनाम (2018), मालदीव (2019), संयुक्त अरब अमीरात (2021), बांग्लादेश (2023), ऑस्ट्रेलिया (2024), ओमान (2025), और मॉरीशस (2026)।
महत्व
- यह हिंद महासागर को एशिया, अफ्रीका और यूरोप को जोड़ने वाले एक भू-राजनीतिक और आर्थिक केंद्र के रूप में सुदृढ़ करता है।
- यह वैश्विक मानदंडों के अनुरूप नियम-आधारित समुद्री व्यवस्था और सहयोग को बढ़ावा देता है।
- बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव और आर्थिक विखंडन के बीच यह क्षेत्रीय लचीलेपन को बढ़ाता है।
- यह जलवायु परिवर्तन, आपूर्ति श्रृंखला में व्यवधान और समुद्री असुरक्षा जैसी गैर-पारंपरिक सुरक्षा चुनौतियों के समाधान के लिए एक मंच प्रदान करता है।
- यह साझा समुद्री संसाधनों के प्रबंधन और सतत विकास सुनिश्चित करने में सामूहिक नेतृत्व के महत्व पर बल देता है।
भारत-उज्बेकिस्तान संयुक्त सैन्य अभ्यास, अभ्यासडस्टलिकका 7वाँ संस्करण
संदर्भ: 60 कर्मियों का एक भारतीय सेना का दस्ता ‘अभ्यास डस्टलिक’ (Exercise DUSTLIK) के 7वें संस्करण के लिए प्रस्थान कर चुका है। यह भारत-उज्बेकिस्तान संयुक्त सैन्य अभ्यास 12 से 25 अप्रैल, 2026 तक उज्बेकिस्तान के नमंगन स्थित ‘गुरुम सराय फील्ड ट्रेनिंग एरिया’ में आयोजित किया जा रहा है।
अन्य संबंधित जानकारी:

- भारतीय दस्ते में भारतीय सेना (मुख्य रूप से महार रेजिमेंट) के 45 कर्मी और भारतीय वायु सेना के 15 कर्मी सम्मिलित हैं। इसी प्रकार, उज्बेकिस्तान ने भी अपनी सेना और वायु सेना से समान संख्या में बल तैनात किए हैं।
- इस संयुक्त प्रशिक्षण का समापन 48 घंटे के एक ‘सत्यापन अभ्यास’ के साथ होगा, जो अवैध सशस्त्र समूहों को निष्प्रभावी करने के लिए विशेष अभियानों पर केंद्रित होगा।
DUSTLIKके बारे में
- अभ्यास डस्टलिक: यह एक वार्षिक द्विपक्षीय सैन्य अभ्यास है, जो बारी-बारी से भारत और उज्बेकिस्तान में आयोजित किया जाता है।
- पिछला संस्करण (2025) पुणे के औंध में आयोजित किया गया था।
- उद्देश्य: सैन्य सहयोग को सुदृढ़ करना और अर्ध-पर्वतीय क्षेत्रों में संयुक्त अभियान संचालित करने की दोनों सेनाओं की क्षमता को बढ़ाना।
- प्रमुख कार्यक्षेत्र: यह अभ्यास अभियानों के संयुक्त नियोजन और निष्पादन पर बल देता है। साथ ही, यह सामरिक अभ्यास, विशेष शस्त्र कौशल और शारीरिक दक्षता के उच्च मानकों को बढ़ाने पर ध्यान केंद्रित करता है।
- यह अंतर-संचालनीयता और परिचालन तालमेल में सुधार करते हुए एक एकीकृत कमान-और-नियंत्रण ढांचा स्थापित करने पर भी केंद्रित है।
- परिचालन गतिविधियाँ: इन गतिविधियों में स्थल नौवहन अभ्यास, शत्रु के ठिकानों पर प्रहार मिशन और शत्रु के कब्जे वाले क्षेत्रों पर नियंत्रण प्राप्त करना शामिल है।
- इसमें अवैध सशस्त्र समूहों के विरुद्ध विशेष अभियानों का प्रशिक्षण भी सम्मिलित है।
- रणनीतिक महत्व:
- रणनीति, तकनीक और प्रक्रियाओं (TTPs) में सर्वोत्तम प्रथाओं को साझा करने को बढ़ावा देता है।
- सशस्त्र बलों के बीच अंतर-संचालनीयता और समन्वय को बढ़ाता है।
- सैनिकों के बीच सौहार्द और पारस्परिक विश्वास का निर्माण करता है।
- भारत और उज्बेकिस्तान के बीच रक्षा सहयोग और द्विपक्षीय संबंधों को मजबूत करता है।
प्रोजेक्ट चीता के तहत भारत में पहले शावकों का जन्म
संदर्भ: भारत का महत्वाकांक्षी चीता पुनर्वास कार्यक्रम, जिसे प्रोजेक्ट चीता के नाम से जाना जाता है, ने तब एक ऐतिहासिक उपलब्धि दर्ज की जब कुनो नेशनल पार्क के जंगल में एक भारत में जन्मी मादा चीता ने चार शावकों को जन्म दिया। यह 2022 में परियोजना शुरू होने के बाद से इस तरह का पहला मामला है।
प्रोजेक्ट चीता के बारे में
- यह 17 सितंबर 2022 को कुनो नेशनल पार्क में शुरू की गई एक ऐतिहासिक वन्यजीव संरक्षण पहल है।

- यह एक बड़े मांसाहारी जीव का विश्व का पहला अंतर-महाद्वीपीय स्थानांतरण है, जिसका उद्देश्य 1952 में भारत में विलुप्त होने के बाद चीतों का पुनर्वास करना है।
- यह परियोजना पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय के तहत राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) द्वारा कार्यान्वित की जा रही है।
परियोजना के मुख्य चरण
- सितंबर 2022: नामीबिया से 8 चीतों का आगमन (विश्व का अब तक का प्रथम स्थानांतरण)।
- फरवरी 2023: दक्षिण अफ्रीका से 12 चीतों का आगमन, जिसमें ‘गामिनी’ भी सम्मिलित थी।
- फरवरी 2026: तृतीय चरण, जिसमें बोत्सवाना से 9 चीतों का स्थानांतरण शामिल है।
उद्देश्य:
- प्रजनन सक्षम आबादी की स्थापना: उनके ऐतिहासिक विस्तार क्षेत्र के सुरक्षित आवासों में चीतों की प्रजनन आबादी स्थापित करना और उन्हें ‘मेटा-पॉपुलेशन’ के रूप में प्रबंधित करना।
- पारिस्थितिकी तंत्र का पुनरुद्धार: चीता को एक ‘करिश्माई फ्लैगशिप’ और ‘अंब्रेला प्रजाति’ के रूप में उपयोग करना, ताकि खुले वन और सवाना पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली के लिए संसाधन जुटाए जा सकें, जिससे जैव विविधता और पारिस्थितिकी तंत्र सेवाओं को लाभ मिले।
- कार्बन प्रच्छादन (Carbon Sequestration): चीता संरक्षण क्षेत्रों में पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली के माध्यम से भारत की कार्बन प्रच्छादन क्षमता को बढ़ाना, जो वैश्विक जलवायु परिवर्तन शमन लक्ष्यों में योगदान दे सके।
- स्थानीय आजीविका: पारिस्थितिकी विकास और पारिस्थितिकी पर्यटन को बढ़ावा देना, जिससे स्थानीय समुदायों की आजीविका में सुधार हो सके।
- मानव-वन्यजीव संघर्ष प्रबंधन: मुआवजे, जागरूकता और समय पर प्रबंधन कार्यों के माध्यम से मानव-वन्यजीव संघर्ष को नियंत्रित करना ताकि सामुदायिक समर्थन सुनिश्चित किया जा सके।
- दीर्घकालिक दृष्टिकोण:
- एक जुड़े हुए कुनो-गांधी सागर परिदृश्य का विकास करना जो 60-70 चीतों को सहारा देने में सक्षम हो।
- चीता आवासों का भारत के अन्य उपयुक्त क्षेत्रों में विस्तार करना।
- वैश्विक वन्यजीव पुनरुद्धार और संरक्षण प्रथाओं के लिए एक आदर्श मॉडल तैयार करना।
