संबंधित पाठ्यक्रम
सामान्य अध्ययन-3: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रदूषण का आकलन।
संदर्भ: 5 जून को मनाए जाने वाले विश्व पर्यावरण दिवस 2026 की मेजबानी अज़रबैजान द्वारा की जा रही है। इस वर्ष यह दिवस जलवायु परिवर्तन पर केंद्रित है और “प्रकृति से प्रेरित। जलवायु के लिए। हमारे भविष्य के लिए”। (“Inspired by Nature. For Climate. For Our Future.”) विषय के माध्यम से तत्काल वैश्विक कार्रवाई का आह्वान करता है।

अन्य संबंधित जानकारी
- विश्व पर्यावरण दिवस 2026 बढ़ते जलवायु संकट को रेखांकित करता है, जो रिकॉर्ड तापमान, चरम मौसमी घटनाओं, पिघलते हिमनदों, समुद्र के बढ़ते जलस्तर और पारिस्थितिकी तंत्र के क्षरण में परिलक्षित होता है।
- संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) ने #NowForClimate अभियान शुरू किया है, जो सरकारों, व्यवसायों, शहरों और नागरिकों से जलवायु कार्रवाई में तेजी लाने का आग्रह करता है।
- यह अभियान ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन को तेजी से कम करने, नवीकरणीय ऊर्जा को बढ़ाने, वनों एवं महासागरों का संरक्षण करने और जलवायु लचीलापन को बढ़ाने की आवश्यकता पर बल देता है।
विश्व पर्यावरण दिवस के बारे में
- इसकी शुरुआत संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा वर्ष 1972 में ‘मानव पर्यावरण पर संयुक्त राष्ट्र सम्मेलन’ (स्टॉकहोम सम्मेलन) के बाद की गई थी और इसे पहली बार वर्ष 1973 में “केवल एक पृथ्वी” (Only One Earth) के नारे के तहत मनाया गया था।
- यह प्रतिवर्ष 5 जून को मनाया जाता है और इसका नेतृत्व संयुक्त राष्ट्र पर्यावरण कार्यक्रम (UNEP) द्वारा किया जाता है।
- यह दुनिया का सबसे बड़ा पर्यावरणीय सार्वजनिक आउटरीच मंच बन गया है, जिसमें 150 से अधिक देशों के लाखों लोग संलग्न हैं।
- यह आयोजन जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण, जैव विविधता की हानि, वनों की कटाई (वनोन्मूलन), भूमि क्षरण और सतत उपभोग जैसे मुद्दों पर जागरूकता बढ़ाने तथा कार्रवाई को गति देने के लिए एक वैश्विक मंच के रूप में कार्य करता है।
- प्रत्येक वर्ष, एक मेजबान देश वैश्विक समारोहों का नेतृत्व करता है और दुनिया भर में पर्यावरणीय कार्रवाई को प्रेरित करने के लिए एक विशिष्ट विषय को बढ़ावा देता है।
- वर्ष 2026 में अज़रबैजान, बाकू में वैश्विक समारोह की मेजबानी कर रहा है, जिसके तहत दुनिया भर में विभिन्न कार्यक्रम और अभियान आयोजित किए जा रहे हैं।
भारत की जलवायु कार्रवाई और राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान (2031–35)
- केंद्रीय मंत्रिमंडल ने पेरिस समझौते के तहत वर्ष 2031-35 के लिए भारत के संवर्धित एनडीसी (NDC – राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान) को मंजूरी दे दी है, जो ‘विकसित भारत’ के दृष्टिकोण और वर्ष 2070 तक ‘नेट ज़ीरो’ (शुद्ध शून्य उत्सर्जन) प्राप्त करने के लक्ष्य के अनुरूप है।
- भारत ने अपने पिछले एनडीसी (NDC) लक्ष्यों को समय से पहले ही हासिल कर लिया था, जिसमें जीडीपी की उत्सर्जन तीव्रता में 33-35% की कमी और गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित स्थापित विद्युत क्षमता में 40% हिस्सेदारी शामिल थी।
- देश ने अब वर्ष 2035 तक उत्सर्जन तीव्रता में 47% की कमी, गैर-जीवाश्म ईंधन आधारित स्थापित विद्युत क्षमता में 60% हिस्सेदारी, और वन व वृक्ष आवरण के माध्यम से 3.5 से 4.0 बिलियन टन CO₂-समकक्ष कार्बन सिंक बनाने के लक्ष्य निर्धारित किए हैं।
- भारत की जलवायु कार्रवाई ‘लाइफ’ (LiFE – पर्यावरण के लिए जीवन शैली), राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन, पीएम सूर्य घर, पीएम-कुसुम (PM-KUSUM), अंतर्राष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA), आपदा प्रतिरोधी अवसंरचना के लिए गठबंधन (CDRI) और वैश्विक जैव ईंधन गठबंधन जैसी पहलों से प्रेरित है।
- यह रणनीति आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण के बीच संतुलन बनाते हुए स्वच्छ ऊर्जा, जलवायु लचीलेपन, पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली, सतत विकास और जलवायु न्याय पर बल देती है।
महत्व
- वैश्विक जलवायु कार्रवाई को बढ़ावा देना: यह ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जनों को कम करके, नवीकरणीय ऊर्जा को अपनाने में तेजी लाकर और दुनिया भर में जलवायु प्रतिबद्धताओं को बढ़ावा देकर वैश्विक तापमान वृद्धि (ग्लोबल वार्मिंग) को 1.5°C के करीब सीमित करने की तत्काल आवश्यकता को रेखांकित करता है।
- अंतर्राष्ट्रीय पर्यावरणीय सहयोग का समर्थन करना: यह सरकारों, अंतर्राष्ट्रीय संगठनों, व्यवसायों और नागरिक समाज के लिए पर्यावरणीय समाधानों पर सहयोग करने तथा पेरिस समझौते एवं राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदानों (NDCs) के तहत प्रतिबद्धताओं को आगे बढ़ाने के लिए एक वैश्विक मंच के रूप में कार्य करता है।
- सतत विकास को प्रोत्साहित करना: यह पर्यावरण संरक्षण, खाद्य सुरक्षा, जल सुरक्षा, सार्वजनिक स्वास्थ्य और आर्थिक लचीलेपन के बीच संबंध पर बल देते हुए सतत उपभोग, संसाधन दक्षता, स्वच्छ ऊर्जा और प्रकृति-आधारित समाधानों को बढ़ावा देता है।
- संरक्षण प्रयासों को सुदृढ़ करना: यह वनों, महासागरों, जैव विविधता और अन्य पारिस्थितिकी प्रणालियों के संरक्षण और पुनरुद्धार की ओर ध्यान आकर्षित करता है जो महत्वपूर्ण कार्बन सिंक के रूप में कार्य करते हैं और पारिस्थितिक संतुलन बनाए रखते हैं।
- उभरती पर्यावरणीय चुनौतियों को रेखांकित करना: यह जलवायु टिपिंग पॉइंट्स, गर्म होते महासागरों, आर्कटिक की बर्फ के पिघलने, वनों की कटाई, जैव विविधता में गिरावट, प्लास्टिक प्रदूषण और चरम मौसमी घटनाओं की बढ़ती संख्या एवं तीव्रता के बारे में जागरूकता बढ़ाता है।
