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सामान्य अध्ययन-3: बुनियादी ढाँचा: ऊर्जा, बंदरगाह, सड़क, विमानपत्तन, रेलवे इत्यादि.; अर्थव्यवस्था पर उदारीकरण के प्रभाव।
संदर्भ: पश्चिमी समर्पित माल ढुलाई गलियारे (WDFC) के अंतिम 326 किलोमीटर खंडों के हालिया संचालन के साथ, भारत ने अपने 2,843 किलोमीटर लंबे समर्पित माल ढुलाई गलियारा (डीएफसी) नेटवर्क को पूरा कर लिया है, जिससे देश के माल ढुलाई और लॉजिस्टिक्स बुनियादी ढाँचे को मजबूती मिली है।
समर्पित माल ढुलाई गलियारों को समझना
- समर्पित माल ढुलाई गलियारे (DFCs) मुख्य रूप से माल ढुलाई के लिए बनाए गए रेलवे मार्ग हैं, जो पारंपरिक रेलवे लाइनों पर माल यातायात को यात्री सेवाओं से अलग करते हैं।
- भारत में वर्तमान में दो परिचालन गलियारे हैं:
- पूर्वी समर्पित माल ढुलाई गलियारा (EDFC): 1,337 किमी, लुधियाना/साहनेवाल से सोननगर तक, जो मुख्य रूप से कोयला और खनिज यातायात का परिवहन करता है।
- पश्चिमी समर्पित माल ढुलाई गलियारा (WDFC): 1,506 किमी, दादरी से जेएनपीटी तक, जो मुख्य रूप से पश्चिमी बंदरगाहों को उत्तरी उपभोग और उत्पादन केंद्रों से जोड़ता है।
- डीएफसी को अधिक एक्सल भार (axle loads), लंबी/भारी ट्रेनों और विद्युतीकृत परिचालन के लिए डिजाइन किया गया है, जिससे तेज गति और अधिक मात्रा में माल ढुलाई संभव होती है।
- डब्ल्यूडीएफसी डबल-स्टैक कंटेनर परिचालन को भी सुगम बनाता है, जिससे प्रत्येक ट्रेन की माल ढुलाई क्षमता में वृद्धि होती है।
- माल यातायात को यात्री यातायात से अलग करने से पारंपरिक रेलवे मार्गों पर क्षमता भी मुक्त होती है, जिससे अतिरिक्त यात्री और माल सेवाएँ संचालित की जा सकती हैं।

भारत का डीएफसी नेटवर्क: प्रमुख उपलब्धियाँ और प्रभाव
- 2,843 किमी नेटवर्क परिचालन में: पूर्ण किए गए ईडीएफसी–डब्ल्यूडीएफसी नेटवर्क पर वर्तमान में औसतन लगभग 443 मालगाड़ियाँ प्रतिदिन संचालित हो रही हैं।
- अधिक गति: डीएफसी पर मालगाड़ियों की औसत गति 50 किमी/घंटे से अधिक है—गैर-डीएफसी मार्गों की औसत गति से लगभग दोगुनी, जिससे परिवहन समय में उल्लेखनीय कमी आती है।
- अधिक माल ढुलाई क्षमता: रेलवे ने 2025–26 में अब तक का सर्वाधिक 1,670 मिलियन टन माल लदान दर्ज किया, जबकि डीएफसी लंबी, भारी और डबल-स्टैक ट्रेनों के संचालन को समर्थन प्रदान करते हैं।
- यात्री मार्गों पर भीड़ में कमी: माल यातायात को समर्पित पटरियों पर स्थानांतरित करने से पारंपरिक मार्गों पर रास्ते उपलब्ध होते हैं, जिससे अतिरिक्त यात्री/कोचिंग सेवाएँ संचालित की जा सकती हैं और मौजूदा रेलवे नेटवर्क का बेहतर उपयोग संभव होता है।
- बंदरगाह–अंतर्देशीय क्षेत्र संपर्क: डब्ल्यूडीएफसी जेएनपीटी, मुंबई, पीपावाव, मुंद्रा और कांडला को उत्तरी आईसीडी से जोड़ता है, जबकि ईडीएफसी पूर्वी भारत से कोयले और खनिजों की आवाजाही को मजबूत करता है।
- लॉजिस्टिक्स लागत का बोझ कम होना: तेज परिवहन, अधिक माल-प्रवाह क्षमता और अधिक पूर्वानुमेय आवाजाही से माल ढुलाई लागत कम हो सकती है तथा भारतीय विनिर्माण और निर्यात की प्रतिस्पर्धात्मकता में सुधार हो सकता है।
भारत के लॉजिस्टिक्स और अर्थव्यवस्था के लिए महत्त्व
- रेल माल ढुलाई की ओर बदलाव: वर्तमान में रेल भारत के लगभग 27% माल ढुलाई का परिवहन करती है, जबकि राष्ट्रीय रेल योजना का लक्ष्य 2030 तक इसे बढ़ाकर 45% करना है। इस लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए अधिक क्षमता वाले गलियारे महत्त्वपूर्ण हैं।
- यात्री आवागमन: मिश्रित उपयोग वाले मार्गों से माल ढुलाई की बाधाओं को हटाकर डीएफसी यात्री ट्रेनों के लिए अतिरिक्त क्षमता उपलब्ध कराते हैं, जिससे संभावित रूप से उनकी आवृत्ति और विश्वसनीयता में सुधार हो सकता है।
- औद्योगिक प्रतिस्पर्धात्मकता: कंटेनर, कोयला, खनिज, उर्वरक, खाद्यान्न, इस्पात और सीमेंट की तेज आवाजाही से उद्योगों के लिए भंडारण और परिवहन संबंधी बोझ कम हो सकता है।
- बंदरगाह-आधारित विकास: बंदरगाहों और अंतर्देशीय क्षेत्रों के बीच तेज आवाजाही से भारत की निर्यात लॉजिस्टिक्स मजबूत होती है, क्योंकि बंदरगाहों तथा अंतर्देशीय उत्पादन/उपभोग केंद्रों के बीच कंटेनरों के परिवहन में लगने वाला समय कम होता है।
- रेलवे वित्त: माल ढुलाई से भारतीय रेलवे की कुल आय का 65% से अधिक प्राप्त होता है और इससे यात्री सेवाओं को क्रॉस-सब्सिडी दी जाती है। इसलिए कुशल माल ढुलाई क्षमता का विस्तार यात्री परिचालन की वित्तीय स्थिरता के लिए भी महत्त्वपूर्ण है।
आगे की राह
- डीएफसी नेटवर्क का विस्तार: सरकार ने दनकुनी–सूरत पूर्व–पश्चिम डीएफसी का प्रस्ताव दिया है, जिसकी विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) तैयार की जा रही है। इससे भारत के पूर्वी, मध्य और पश्चिमी औद्योगिक क्षेत्रों के बीच समर्पित माल ढुलाई संपर्क का विस्तार हो सकता है।
- अंतिम छोर तक संपर्क में सुधार: डीएफसी को बंदरगाहों, आईसीडी, औद्योगिक क्लस्टरों, लॉजिस्टिक्स पार्कों और उत्पादन केंद्रों के साथ एकीकृत किया जाना चाहिए, ताकि मुख्य मार्ग पर प्राप्त लाभ संपूर्ण लॉजिस्टिक्स व्यवस्था की दक्षता में परिवर्तित हो सके।
- रेल माल ढुलाई की हिस्सेदारी बढ़ाना: 2030 तक 45% रेल माल ढुलाई के लक्ष्य को प्राप्त करने के लिए प्रतिस्पर्धी माल ढुलाई दरें, विश्वसनीय परिवहन समय, कुशल टर्मिनल और कंटेनरीकृत, कृषि तथा अन्य गैर-थोक माल की अधिक आवाजाही आवश्यक होगी।
- बहु-माध्यमीय परिवहन को मजबूत करना: पीएम गति शक्ति के तहत डीएफसी को सड़कों, बंदरगाहों, अंतर्देशीय जलमार्गों, मल्टी-मॉडल लॉजिस्टिक्स पार्कों (एमएमएलपी) और डिजिटल माल ढुलाई प्रणालियों के साथ एकीकृत करने से केवल रेल परिवहन समय ही नहीं, बल्कि समग्र लॉजिस्टिक्स लागत भी कम की जा सकती है।
- मौजूदा क्षमता का अधिकतम उपयोग: बेहतर सिग्नलिंग, टर्मिनल पर कम समय में परिचालन पूरा करना तथा लंबी/भारी ट्रेनों का संचालन, माल की मांग बढ़ने के साथ पूर्ण किए जा चुके नेटवर्क से अधिक माल-प्रवाह क्षमता प्राप्त करने में मदद कर सकते हैं।
