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सामान्य अध्ययन-3: भारतीय अर्थव्यवस्था और योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास और रोजगार से संबंधित विषय।
संदर्भ: नीति आयोग ने “आयुर्वेद को वैश्विक बनाने हेतु रणनीतिक रोडमैप” (Strategic Roadmap for Making Ayurveda Global) शीर्षक से एक रिपोर्ट जारी की है। यह रिपोर्ट आयुर्वेद की वैश्विक उपस्थिति का विस्तृत आकलन प्रस्तुत करती है और इसके अंतरराष्ट्रीय विस्तार को सुदृढ़ करने के लिए एक चरणबद्ध कार्ययोजना का खाका तैयार करती है।
अन्य संबंधित जानकारी

• इस रिपोर्ट का विमोचन नीति आयोग के उपाध्यक्ष डॉ. अशोक कुमार लाहिड़ी द्वारा किया गया।
• यह अध्ययन नीति आयोग के स्वास्थ्य प्रभाग द्वारा प्राइसवाटरहाउसकूपर्स (PwC) के सहयोग से किया गया है।
• यह रिपोर्ट ‘विकसित भारत@2047’ के विजन के अनुरूप वर्ष 2047 तक के लिए एक चरणबद्ध रणनीति प्रस्तावित करती है।
रिपोर्ट के मुख्य बिंदु
• उद्देश्य:
- आयुर्वेद की वैश्विक उपस्थिति का आकलन करना, बाधाओं और प्रोत्साहकों की पहचान करना, विनियामक ढांचों का मूल्यांकन करना, वैश्विक मांग का मानचित्रण करना और इसके वैश्वीकरण के लिए एक कार्ययोजना विकसित करना।
• कार्यप्रणाली:
- इसका आकलन तीन स्तंभों पर आधारित है:
उपलब्धता: कार्यबल, विनिर्माण, निर्यात, अनुसंधान और शिक्षा।
स्वीकार्यता: विनियमन, सहयोग, बीमा और सांस्कृतिक अनुकूलनशीलता।
प्रसार: ब्रांडिंग, दृश्यता, चिकित्सा मूल्य यात्रा और वैश्विक जुड़ाव।
• आयुर्वेद के वैश्वीकरण की वर्तमान स्थिति
- आयुर्वेद को लाइसेंसिंग मॉडल, शैक्षणिक सहयोग और राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीतियों के माध्यम से लगभग 30 देशों में औपचारिक मान्यता प्राप्त है।
- भारत में 3.55 लाख से अधिक प्रशिक्षित आयुर्वेद चिकित्सक हैं, जिनमें से लगभग 95% देश के भीतर ही कार्यरत हैं।
- आयुर्वेद का निर्यात वर्ष 2014 में 1.09 बिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़कर वर्ष 2023 में 2.16 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया है, जो लगभग 150 देशों तक पहुँच रहा है।
- आयुर्वेद अनुसंधान लगभग 70 देशों में फैला हुआ है, जिसे अंतरराष्ट्रीय सहयोग और जामनगर स्थित डब्ल्यूएचओ (WHO) ग्लोबल सेंटर फॉर ट्रेडिशनल मेडिसिन (GTMC) का समर्थन प्राप्त है।

प्रमुख चुनौतियाँ
• महत्वपूर्ण प्रगति के बावजूद, आयुर्वेद का वैश्विक विस्तार अभी भी असमान है।
• उपलब्धता: अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिकित्सकों के लिए वैश्विक स्तर पर स्वीकृत लाइसेंस, अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्य माइक्रो-क्रेडेंशियल कार्यक्रम, शैक्षणिक मानकों में सामंजस्य और बहु-देशीय नैदानिक अनुसंधान के अभाव के कारण, आयुर्वेद का अभ्यास मुख्य रूप से वेलनेस और पूरक चिकित्सा तक ही सीमित है।
- निर्यात में वृद्धि के बावजूद, तैयार आयुर्वेदिक दवा उत्पादों को विशेष रूप से संयुक्त राज्य अमेरिका और यूरोपीय संघ में विनियामक बाधाओं का सामना करना पड़ता है।
• स्वीकार्यता: भारत को आयुष् (Ayush) जीएमपी (GMP) को डब्ल्यूएचओ-जीएमपी (WHO-GMP) के स्तर तक उन्नत करने, गुणवत्ता आश्वासन को मजबूत करने, बीमा कवरेज का विस्तार करने और आयुर्वेद को राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रणालियों में एकीकृत करके अंतरराष्ट्रीय नियमों के साथ बेहतर तालमेल बनाने की आवश्यकता है।
• प्रसार: खंडित ब्रांडिंग, सीमित उपभोक्ता जागरूकता, असंगत संचार, गुणवत्ता संबंधी चिंताएं, और अविकसित चिकित्सा मूल्य यात्रा एवं अंतरराष्ट्रीय दृश्यता, आयुर्वेद की वैश्विक छवि में बाधा उत्पन्न करते हैं।
रणनीतिक रोडमैप (2025–2047)
• अल्पकालिक चरण (2025–2029): इसका ध्यान एक आधारभूत पारिस्थितिकी तंत्र बनाने पर है, जिसके तहत एक केंद्रीकृत निर्यात डेटाबेस, वैश्विक पेशेवर रजिस्ट्री, अंतरराष्ट्रीय ब्रांडिंग अभियान, विदेशों में प्रमुख आयुर्वेद केंद्र, निर्माताओं के लिए डब्ल्यूएचओ-जीएमपी (WHO-GMP) प्रमाणन और मानकीकृत नैदानिक प्रोटोकॉल स्थापित किए जाएंगे।
• मध्यम-कालिक चरण (2035 तक): इसका उद्देश्य ट्रेडिशनल हर्बल मेडिसिनल प्रोडक्ट्स डायरेक्टिव (THMPD) पंजीकरण, बीमा पायलट कार्यक्रमों, पेशेवर गतिशीलता पहल और मजबूत विनियामक सामंजस्य के माध्यम से बाजार एकीकरण को गहरा करना है।
• दीर्घकालिक विज़न (2047 तक): यह कम से कम 20 राष्ट्रीय स्वास्थ्य प्रणालियों में आयुर्वेद को औपचारिक मान्यता दिलाने का प्रयास करता है, जिसे सतत साक्ष्य-उत्पादन तंत्र, मजबूत गुणवत्ता आश्वासन और सार्वभौमिक स्वास्थ्य कवरेज (UHC) में एकीकरण का समर्थन प्राप्त होगा।
महत्वपूर्ण अनुशंसाएँ


