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सामान्य अध्ययन 1: भारतीय समाज की मुख्य विशेषताएँ, भारत की विविधता- लिंग, निर्धनता, धर्मनिरपेक्षता, सांप्रदायिकता इत्यादि।
सामान्य अध्ययन 2: निर्धनता और भूख़ से संबंधित विषय।
संदर्भ: ‘राष्ट्रीय विज्ञान शिक्षा एवं अनुसंधान संस्थान’ (NISER) द्वारा 21 राज्यों के 593 जिलों में किए गए एक अध्ययन से पता चलता है कि भारत में निर्धनता, जलवायु परिवर्तनशीलता से प्रभावित हो रही है। आज यह एक विशुद्ध आर्थिक मुद्दे से एक जटिल संरचनात्मक चुनौती बन गई है, जिसके लिए स्थानीय स्तर पर समाधानों की आवश्यकता है।
अध्ययन के मुख्य निष्कर्ष

- निर्धनता की बदलती प्रकृति
- भारत में निर्धनता में कमी देखी गई है, जहाँ पूंजी गणना अनुपात 24.85% से गिरकर 14.96% हो गया है और निर्धनता की तीव्रता 47.14% से घटकर 44.39% रह गई है।
- हालांकि, जलवायु से जुड़े व्यवधान एक बड़ी बाधा के रूप में उभर रहे हैं, जो इन लाभों को उलटने (यानी निर्धनता बढ़ाने) का खतरा पैदा कर रहे हैं।
- विश्व स्तर पर, लगभग 700 मिलियन लोग अभी भी अत्यधिक निर्धनता में जीवन यापन कर रहे हैं, और जलवायु परिवर्तन उनकी सुभेद्यता को और बढ़ा रहा है।
- जलवायु तनाव और निर्धनता के बीच संबंध
- यह अध्ययन दर्शाता है कि जलवायु संबंधी कारक निर्धनता के परिणामों को महत्वपूर्ण रूप से प्रभावित करते हैं। तापमान की परिवर्तनशीलता सबसे महत्वपूर्ण कारक के रूप में उभरी है, जहाँ इसकी एक इकाई की वृद्धि निर्धनता की संभावना को 31.1% तक बढ़ा देती है।
- इसी प्रकार, बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में एक इकाई की वृद्धि निर्धनता की संभावना को 1.4% बढ़ा देती है, जबकि वर्षण में होने वाले परिवर्तन इसे 1.9% तक बढ़ा देते हैं।
- ये परिवर्तन कृषि उत्पादकता को बाधित करते हैं, परिसंपत्तियों को नुकसान पहुँचाते हैं और आय में अस्थिरता पैदा करते हैं, विशेष रूप से ग्रामीण क्षेत्रों में।

- सूखा-निर्भरता जाल
- यह अध्ययन उन जिलों में संचयी संवेदनशीलता को दर्शाता है जो सूखा-प्रवण होने के साथ-साथ कृषि पर निर्भर भी हैं। ऐसे जिलों में उच्च निर्धनता स्तर का सामना करने की संभावना 83% अधिक होती है।
- इसके अतिरिक्त, सूखे की स्थिति और प्राथमिक क्षेत्र पर निर्भरता के बीच की अंतःक्रिया निर्धनता की संभावना को 12.9% बढ़ा देती है। यह फसल की विफलता, घटती आय, बढ़ते कर्ज और आजीविका विविधीकरण के सीमित अवसरों का एक दुष्चक्र पैदा करता है।

- सामाजिक और क्षेत्रीय आयाम
- सामाजिक कारक संवेदनशीलता को और अधिक बढ़ा देते हैं। उच्च अनुसूचित जनजाति (ST) जनसंख्या वाले जिलों में निर्धनता की अधिक संभावना देखी गई है, जहाँ एक इकाई की वृद्धि निर्धनता की संभावना को 1.9% तक बढ़ा देती है।
- ये समुदाय अक्सर पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में निवास करते हैं और बुनियादी ढांचे तथा संस्थागत सहायता तक इनकी पहुँच सीमित होती है।
- क्षेत्रीय स्तर पर एक स्पष्ट विभाजन मौजूद है। छत्तीसगढ़, ओडिशा, झारखंड, बिहार और पश्चिम बंगाल जैसे पूर्वी राज्यों में कृषि पर अत्यधिक निर्भरता और कमजोर आर्थिक विविधीकरण के कारण निर्धनता का स्तर उच्च है।
- इसके विपरीत, केरल, कर्नाटक, तमिलनाडु, गुजरात और महाराष्ट्र जैसे दक्षिणी और पश्चिमी राज्यों में मजबूत बुनियादी ढांचे और विविधीकृत अर्थव्यवस्थाओं के कारण निर्धनता का स्तर कम है।
- आर्थिक विविधिकरण की भूमिका
- अर्थव्यवस्था की संरचना लचीलेपन में एक महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। तृतीयक क्षेत्र की उच्च हिस्सेदारी वाले जिलों में निर्धनता का स्तर कम पाया जाता है। तृतीयक क्षेत्र में एक इकाई की वृद्धि निर्धनता की संभावना को 1.9% तक कम कर देती है।
- सेवा-उन्मुख क्षेत्र स्थिर आय प्रदान करते हैं और ये जलवायु संबंधी उतार-चढ़ाव से प्रत्यक्ष रूप से कम प्रभावित होते हैं, जिससे अनुकूलन क्षमता में वृद्धि होती है।
नीतिगत चुनौतियाँ
- जलवायु कार्रवाई और निर्धनता निवारण पर राष्ट्रीय पहलों के बावजूद, उप-राष्ट्रीय स्तर पर महत्वपूर्ण अंतराल विद्यमान हैं।
- नीतियां अक्सर स्थानीय भेद्यताओं, संस्थागत क्षमता के अंतर और संरचनात्मक असमानताओं को ध्यान में रखने में विफल रहती हैं, जिससे उनकी प्रभावशीलता सीमित हो जाती है।
आगे की राह
- चूंकि भारत अपने सतत विकास लक्ष्यों (SDGs)—विशेष रूप से निर्धनता, भुखमरी और जलवायु कार्रवाई से संबंधित लक्ष्यों—को प्राप्त करने के लिए प्रयासरत है, यह अध्ययन एकीकृत और क्षेत्र-विशिष्ट रणनीतियों की आवश्यकता पर बल देता है।
- सूखा-प्रतिरोधी फसलों और कुशल सिंचाई प्रणालियों के माध्यम से जलवायु-अनुकूल कृषि को बढ़ावा देना अनिवार्य है। गैर-कृषि रोजगार के अवसरों का विस्तार जलवायु-संवेदनशील क्षेत्रों पर निर्भरता को कम कर सकता है।
- बाढ़ और चरम मौसम की घटनाओं के प्रभाव को कम करने के लिए आपदा प्रबंधन प्रणालियों को सुदृढ़ करना अत्यंत महत्वपूर्ण है।
- साथ ही, सुभेद्य क्षेत्रों में बुनियादी ढांचे, बाजार तक पहुंच और संस्थागत क्षमता में सुधार से लचीलेपन में वृद्धि होगी।
- जिला-स्तरीय नियोजन की ओर बदलाव आवश्यक है, जो जलवायु अनुकूलन को निर्धनता उन्मूलन के साथ एकीकृत करे।
- आर्थिक विविधीकरण, सामाजिक समावेशन और संस्थागत सुदृढ़ीकरण को जोड़ने वाला एक बहु-आयामी दृष्टिकोण, जलवायु-प्रेरित निर्धनता के समाधान के लिए महत्वपूर्ण होगा।
निष्कर्ष
जलवायु परिवर्तन आर्थिक संरचनाओं और सामाजिक असमानताओं के साथ परस्पर क्रिया करके भारत में निर्धनता के भूगोल और प्रकृति को पुन: परिभाषित कर रहा है। बढ़ते वैश्विक तापन में स्थायी निर्धनता उन्मूलन और सुदृढ़ता सुनिश्चित करने के लिए एक लक्षित, एकीकृत और क्षेत्र-विशिष्ट दृष्टिकोण अनिवार्य है।
