संबंधित पाठ्यक्रम

सामान्य अध्ययन-2: भारत से संबंधित और/अथवा भारत के हितों को प्रभावित करने वाले द्विपक्षीय, क्षेत्रीय एवं वैश्विक समूह और करार।

सामान्य अध्ययन -3: संरक्षण, पर्यावरणीय प्रदूषण एवं निम्नीकरण।

संदर्भ: केंद्र सरकार ने उच्च सागर में मछली पकड़ने के अवसरों का विस्तार करने और क्षेत्रीय मत्स्य प्रबंधन में भारत की भूमिका को मजबूत करने के लिए दक्षिणी हिंद महासागर मत्स्य समझौते (SIOFA) में भारत के प्रवेश को मंजूरी दे दी है।

अन्य संबंधित जानकारी

  • भारत वर्ष 2022 से SIOFA का सहयोगी गैर-अनुबंधकारी पक्ष (Cooperating Non-Contracting Party—CNCP) रहा है, जिसके अंतर्गत इसकी निर्णय लेने वाली संस्थाओं में भारत की भागीदारी सीमित थी।
  • यह मंजूरी दिसंबर 2025 में सरकार द्वारा जारी उच्च सागर में मत्स्यन के लिए दिशानिर्देशों के बाद दी गई है। ये दिशानिर्देश भारत की मत्स्यन गतिविधियों को अंतरराष्ट्रीय जलक्षेत्रों तक विस्तारित करने के लिए नीतिगत ढाँचा प्रदान करते हैं।

दक्षिणी हिंद महासागर मत्स्य समझौते (SIOFA) के बारे में

  • प्रकृति एवं उद्देश्य: SIOFA एक क्षेत्रीय मत्स्य समझौता है, जिस पर 7 जुलाई, 2006 को रोम में हस्ताक्षर किए गए थे और जो जून 2012 से प्रभावी है। इसका उद्देश्य दक्षिणी हिंद महासागर के खुले समुद्री क्षेत्रों में मत्स्य संसाधनों का दीर्घकालिक संरक्षण और सतत उपयोग सुनिश्चित करना है।
  • दायरा: इसके अधिकार क्षेत्र में मछलियाँ, मोलस्क, क्रस्टेशियन तथा कुछ निश्चित स्थिरजीवी प्रजातियाँ शामिल हैं।
    • इसमें समुद्र के कानून पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (UNCLOS) के अनुबंध-I में सूचीबद्ध अत्यधिक प्रवासी प्रजातियाँ तथा UNCLOS के अनुच्छेद 77(4) में निर्दिष्ट तटीय राज्यों के मत्स्यन क्षेत्राधिकार के अंतर्गत आने वाली स्थिरजीवी प्रजातियाँ शामिल नहीं हैं।
  • क्षेत्रीय संरचना: हिंद महासागर में मत्स्य प्रबंधन की दो प्रमुख क्षेत्रीय व्यवस्थाएँ हैं—SIOFA और हिंद महासागर टूना आयोग (IOTC)। भारत वर्ष 1996 से IOTC का संविदाकारी पक्ष रहा है।
    • IOTC अत्यधिक प्रवासी टूना और टूना जैसी प्रजातियों का विनियमन करता है।

भारत को उच्च सागर में मत्स्यन क्षमता विकसित करने की आवश्यकता

  • मौजूदा क्षमता का अंतराल: भारतीय मत्स्यन पोत मुख्यतः अनन्य आर्थिक क्षेत्र (EEZ) के भीतर 60–80 समुद्री मील तक के क्षेत्र में संचालित होते हैं। यह उपयुक्त खुले समुद्री क्षेत्रों में मत्स्यन गतिविधियों का विस्तार करने की आवश्यकता को दर्शाता है।
  • वैश्विक संदर्भ: उच्च सागर में वैश्विक महासागर का लगभग 65% हिस्सा शामिल है और वर्तमान में पाँच देश/क्षेत्र इस पर प्रमुख रूप से हावी हैं—चीन (21%), ताइवान (13%), जापान (11%), दक्षिण कोरिया (11%) और स्पेन (8%)।
  • क्षमता संबंधी आवश्यकताएँ: भारत को उच्च सागर में मत्स्यन का विस्तार करने के लिए आधुनिक पोतों, कुशल कार्मिकों, प्रौद्योगिकी और निगरानी प्रणालियों की आवश्यकता है। मत्स्यन के अवसरों में विविधता लाने और आर्थिक लाभ बढ़ाने के लिए अन्य देशों के अनन्य आर्थिक क्षेत्रों (EEZs) में पहुँच संबंधी समझौतों की संभावनाएँ भी तलाशी जा सकती हैं।

भारत के शामिल होने का महत्त्व

  • मत्स्यन के विस्तारित अवसर: समझौते में शामिल होने की प्रक्रिया पूरी होने के बाद, भारतीय ध्वज वाले पोत और उद्यम SIOFA के क्षेत्र में स्क्विड, टूथफिश, अल्फॉन्सिनो तथा अन्य पात्र गैर-अत्यधिक प्रवासी मत्स्य भंडारों का अधिकृत मत्स्यन कर सकेंगे। यह लागू संरक्षण उपायों और मत्स्यन प्राधिकरणों के अधीन होगा।
  • आर्थिक एवं रणनीतिक हित: इस समझौते में शामिल होने से भारत को अपनी मत्स्यन गतिविधियों का विस्तार करने के लिए एक क्षेत्रीय फ्रेमवर्क मिलेगा। इससे भारतीय मछुआरों और उद्यमों के लिए अवसर सृजित होंगे तथा उच्च सागर में मत्स्यन के क्षेत्र में भारत की मान्यता प्राप्त उपस्थिति सुदृढ़ होगी।
  • वैज्ञानिक सहयोग: भारत वैज्ञानिक अनुसंधान, संसाधन आकलन और मत्स्य भंडार प्रबंधन प्रक्रियाओं में अधिक पूर्ण रूप से भाग ले सकेगा। इससे सतत मत्स्य दोहन और समुद्री संसाधनों की दीर्घकालिक व्यवहार्यता को समर्थन मिलेगा।
  • क्षेत्रीय सहयोग एवं तटीय सुरक्षा: SIOFA की उच्च सागर बोर्डिंग और निरीक्षण योजना (High Seas Boarding and Inspection—HSBI Scheme) में भागीदारी से उच्च सागर में निगरानी और निरीक्षण के क्षेत्र में सहयोग मजबूत होगा। भारत की भागीदारी अवैध, अनियमित और अनियंत्रित (IUU) मत्स्यन को रोकने के प्रयासों तथा जिम्मेदार मत्स्यन प्रथाओं को बढ़ावा देने में भी सहायक हो सकती है।
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