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सामान्य अध्ययन-3: संरक्षण, पर्यावरण प्रभाव और क्षरण; बुनियादी ढाँचा: ऊर्जा, बंदरगाह।

संदर्भ: भारत कांडला बंदरगाह पर अपना पहला हरित मेथनॉल उत्पादन संयंत्र स्थापित कर रहा है। इसके अंतर्गत आक्रामक खरपतवार प्रोसोपिस जुलिफ्लोरा को स्वच्छ समुद्री ईंधन में परिवर्तित किया जाएगा। यह पहल देश के ऊर्जा संक्रमण और समुद्री डी-कार्बोनाइजेशन की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।

हरित मेथनॉल संयंत्र के बारे  

• यह संयंत्र दीनदयाल पत्तन प्राधिकरण में स्थित है और इसका निर्माण थर्मैक्स लिमिटेड द्वारा किया जा रहा है। इसमें पत्तन प्राधिकरण के स्वामित्व वाली अंकुर साइंटिफिक एनर्जी टेक्नोलॉजीज की गैसीकरण तकनीक का उपयोग किया जा रहा है।

• एक प्रदर्शन परियोजना (Demonstration Project) के रूप में, यह संयंत्र प्रतिदिन पाँच टन मेथनॉल का उत्पादन करेगा।

• उत्पादन प्रक्रिया:

  • चरण 1 — गैसीकरण (अंकुर साइंटिफिक): प्रोसोपिस जुलिफ्लोरा को ऑक्सीजन की अनुपस्थिति में गर्म किया जाता है और इसे सिनगैस जो हाइड्रोजन, कार्बन मोनोऑक्साइड और CO₂ का मिश्रण है, में विखंडित किया जाता है। एक बार प्रक्रिया शुरू होने के बाद, यह अभिक्रिया अपनी स्वयं की ऊष्मा को बनाए रखती है, जिसमें 30 मिनट के स्टार्टअप के लिए केवल 10-15 लीटर तेल की आवश्यकता होती है।
  • चरण 2 — मेथनॉल संश्लेषण (थर्मेक्स ऊर्जा): तत्पश्चात सिनगैस को मेथनॉल में परिवर्तित किया जाता है, जो समुद्री ईंधन के रूप में उपयोग के लिए तैयार होता है।

                     यह संयंत्र बगास (गन्ने की खोई) और कपास के डंठल जैसे अन्य कृषि अवशेषों पर संचालित होने के लिए भी प्रमाणित है।

• शिपिंग (नौवहन) क्षेत्र में मेथनॉल का उपयोग भारी “बंकर तेल” के एक स्वच्छ विकल्प के रूप में किया जाता है। जहाँ पारंपरिक मेथनॉल गैस या कोयले जैसे जीवाश्म ईंधनों से प्राप्त किया जाता है, वहीं हरित मेथनॉल में बायोमास का उपयोग होता है।

  • ई-मेथनॉल, जो कि अगला चरण है, का उत्पादन पूर्णतः नवीकरणीय विद्युत द्वारा संचालित हरित हाइड्रोजन और कैप्चर की गई CO₂ का उपयोग करके किया जाता है।

संयंत्र का महत्व

• पर्यावरणीय लाभ: ‘मेथनॉल इंस्टीट्यूट’ के अनुसार, हरित मेथनॉल जहाजों के CO₂ उत्सर्जन को 95% तक कम कर सकता है, NOx को 80% तक घटा सकता है और सल्फर ऑक्साइड तथा पार्टिकुलेट मैटर (PM) को पूरी तरह समाप्त कर सकता है। यह इसे पारंपरिक समुद्री बंकर ईंधन का एक अत्यंत प्रभावी विकल्प बनाता है।

• राष्ट्रीय ऊर्जा सुरक्षा: ‘अंकुर साइंटिफिक’ का अनुमान है कि बगास (गन्ने की खोई) और कपास के डंठल जैसे कृषि अवशेष, अपनी अधिकतम क्षमता पर, भारत के तेल आयात के एक-तिहाई हिस्से को प्रतिस्थापित कर सकते हैं।

  • यह भारत के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि देश अपनी कुल आवश्यकता के 85-90% कच्चे तेल के आयात पर निर्भर है।

• नीति संरेखण: यह संयंत्र कई राष्ट्रीय फ्रेमवर्क के अनुरूप है:

  • भारत का ‘हरित सागर’ – हरित पत्तन दिशानिर्देश: यह पहल पत्तनों के परिचालन में पर्यावरण के अनुकूल पारिस्थितिकी तंत्र को बढ़ावा देने के लिए शुरू की गई है।
  • राष्ट्रीय हरित हाइड्रोजन मिशन: यह मिशन भारत को हरित हाइड्रोजन और इसके व्युत्पन्नों (जैसे हरित मेथनॉल) के उत्पादन और निर्यात का वैश्विक केंद्र बनाने के लिए प्रतिबद्ध है।
  • 2070 तक नेट-ज़ीरों उत्सर्जन का लक्ष्य: भारत ने वर्ष 2070 तक कार्बन उत्सर्जन को ‘नेट-जीरो’ तक ले जाने की वैश्विक प्रतिबद्धता व्यक्त की है।
  • IMO की 2023 ग्रीनहाउस गैस रणनीति: अंतरराष्ट्रीय समुद्री संगठन (IMO) ने वर्ष 2050 तक शिपिंग क्षेत्र से होने वाले उत्सर्जन को शुद्ध-शून्य करने का लक्ष्य रखा है।
  • आर्थिक और जलवायु प्राथमिकता: भारत का लगभग 90% व्यापार (मात्रा के अनुसार) बंदरगाहों के माध्यम से होता है। अतः शिपिंग का डी-कार्बोनाइजेशन एक गौण मुद्दा नहीं, बल्कि देश की केंद्रीय आर्थिक और जलवायु प्राथमिकता है।

• पारिस्थितिकी बहाली: यह संयंत्र प्रोसोपिस जुलिफ्लोरा को हटाने के लिए पहला ठोस आर्थिक आधार प्रदान करता है, जिसने दशकों से कच्छ के बन्नी घास के मैदानों को नष्ट कर दिया है। इस प्रकार, यह एक पारिस्थितिक बाधा को राष्ट्रीय ऊर्जा परिसंपत्ति में परिवर्तित कर रहा है।

चुनौतियाँ

• लागत अंतराल: हरित मेथनॉल (लगभग $700–800/टन) और ई-मेथनॉल (लगभग $2,000/टन) पारंपरिक मेथनॉल (यूक्रेन युद्ध से पूर्व ₹30/किग्रा और युद्ध के बाद ₹70–80/किग्रा) की तुलना में काफी महंगे बने हुए हैं। इसके कारण इनका अपनाया जाना मूल्य-संचालित होने के बजाय मुख्य रूप से यूरोपीय संघ (EU) के नियमों के तहत दंड से बचने की विवशता पर आधारित है।

• पैमाने की सीमा: वर्तमान 5 टन प्रतिदिन (TPD) का प्रदर्शन संयंत्र वाणिज्यिक व्यवहार्यता के लिए आवश्यक 100–500 TPD के पैमाने से बहुत नीचे है, हालांकि APL का 150 TPD संयंत्र इस अंतराल को पाटने की दिशा में एक शुरुआत है।

• ऊर्जा स्रोत संबंधी समस्या: यह संयंत्र वर्तमान में परिचालन के लिए पारंपरिक ग्रिड बिजली पर निर्भर है। वैश्विक कार्बन-तीव्रता मानकों को पूरा करने के लिए पूर्णतः नवीकरणीय ऊर्जा की ओर संक्रमण आवश्यक होगा।

• जल-ऊर्जा-खाद्य अंतर्संबंध: भारत की खंडित नीति व्यवस्था, जिसमें सब्सिडी वाली बिजली के कारण अत्यधिक भूजल निष्कर्षण (कुछ क्षेत्रों में वार्षिक 1 मीटर से अधिक की गिरावट) और ₹1.5 लाख करोड़ की वार्षिक सब्सिडी शामिल है, एक संधारणीय ऊर्जा संक्रमण की दिशा में संरचनात्मक बाधाएं उत्पन्न करती है।

आगे की राह

• नवीकरणीय ऊर्जा को अपनाना: अंतरराष्ट्रीय कार्बन-तीव्रता मानकों को पूरा करने के लिए ग्रिड बिजली को सौर और पवन जैसे नवीकरणीय स्रोतों से प्रतिस्थापित किया जाना चाहिए।

• कच्चे माल का विविधीकरण: उत्पादन बढ़ाने और तेल आयात पर निर्भरता कम करने के लिए बगास (गन्ने की खोई) और कपास के डंठल जैसे कृषि अवशेषों को ‘राष्ट्रीय ऊर्जा परिसंपत्ति’ के रूप में माना जाना चाहिए।

• नीतिगत समर्थन को सुदृढ़ करना: मौजूदा उपायों, जैसे कि हरित-ईंधन वाले जहाजों के लिए 30% फ्लैट सब्सिडी (अगस्त 2023), हरित पत्तन दिशानिर्देश और हाइड्रोजन मिशन को और अधिक गहन बनाने तथा निरंतरता के साथ लागू करने की आवश्यकता है।

• एकीकृत नीति सुधार: दीर्घकालिक लचीलापन सुनिश्चित करने के लिए जल, ऊर्जा और कृषि नीतियों को मूल्य निर्धारण सुधारों और स्मार्ट मीटरिंग के साथ एक एकीकृत अंतर्संबंध-आधारित ढांचे के माध्यम से शासित किया जाना चाहिए।

Sources:
The Hindu
The Hindu
RJPPD

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