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सामान्य अध्ययन-3: विज्ञान और प्रौद्योगिकी- विकास और अनुप्रयोग तथा रोजमर्रा के जीवन पर उनके प्रभाव; देशज रूप से प्रौद्योगिकी का विकास और नई प्रौद्योगिकी का विकास।

संदर्भ: केंद्रीय मंत्रिमंडल ने ₹1,27,500 करोड़ के कुल परिव्यय के साथ सेमीकॉन 2.0 को स्वीकृति प्रदान की है, जिसका उद्देश्य भारत के अर्धचालक (सेमीकंडक्टर) अभिकल्पन एवं विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ करना तथा इस क्षेत्र को दीर्घकालिक नीतिगत समर्थन प्रदान करना है।

अन्य संबंधित जानकारी

  • सेमीकॉन 2.0 भारत सेमीकंडक्टर मिशन (ISM) का अगला चरण है, जो चिप निर्माण (फैब्रिकेशन) से आगे बढ़कर सम्पूर्ण सेमीकंडक्टर मूल्य श्रृंखला को समर्थन प्रदान करता है। इसमें अभिकल्पन, सामग्री, उपकरण, अनुसंधान एवं विकास (R&D) तथा प्रतिभा विकास शामिल हैं।
  • इस कार्यक्रम का उद्देश्य कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), इलेक्ट्रॉनिक्स, दूरसंचार, ऑटोमोबाइल प्रणालियों, रक्षा प्रौद्योगिकियों तथा उन्नत संगणन से बढ़ती वैश्विक मांग के बीच भारत को वैश्विक सेमीकंडक्टर आपूर्ति श्रृंखलाओं में एक विश्वसनीय साझेदार के रूप में स्थापित करना है।
  • यह स्वीकृति सेमीकॉन 1.0 की उपलब्धियों पर आधारित है, जिसके अंतर्गत अनेक सेमीकंडक्टर विनिर्माण, पैकेजिंग तथा अभिकल्पन परियोजनाओं को स्वीकृति दी जा चुकी है तथा इनमें से कई परियोजनाओं में उत्पादन भी प्रारंभ हो चुका है।

सेमीकॉन 2.0 की प्रमुख विशेषताएँ

  • सेमीकॉन 2.0 का उद्देश्य निम्नलिखित छह स्तंभों के आधार पर संपूर्ण सेमीकंडक्टर पारिस्थितिकी तंत्र का समग्र विकास करना है।

स्तंभ 1 : अभिकल्पन (Design)

  • चिप अभिकल्पन, सेमीकंडक्टर बौद्धिक संपदा (IP) के विकास तथा फैबलेस स्टार्टअप्स को समर्थन देकर भारत के सेमीकंडक्टर अभिकल्पन पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ करना।
  • भारत में पहले से ही सेमीकंडक्टर चिप विकसित कर रहे 105 से अधिक स्टार्टअप्स की प्रगति को आगे बढ़ाना।

स्तंभ 2 : मशीनें एवं सामग्री (Machines and Materials)

  • सेमीकंडक्टर उपकरणों, विशेष सामग्री, रसायनों, गैसों तथा वेफर (Wafers) के घरेलू विनिर्माण एवं अनुसंधान एवं विकास को प्रोत्साहित करना।
  • आयात पर निर्भरता कम करना तथा सेमीकंडक्टर की अपस्ट्रीम आपूर्ति श्रृंखला को अधिक सुदृढ़ एवं लचीला बनाना।

स्तंभ 3 : अधिक फैब (Fabs) की स्थापना

  • सेमीकंडक्टर मूल्य श्रृंखला में अतिरिक्त विनिर्माण इकाइयों (फैब्स) की स्थापना को प्रोत्साहित करना।
  • इसके अंतर्गत सिलिकॉन CMOS फैब, कंपाउंड सेमीकंडक्टर फैब, डिस्प्ले फैब तथा डिस्क्रीट सेमीकंडक्टर फैब शामिल हैं।
  • इस कार्यक्रम के अंतर्गत स्वीकृत प्रथम सेमीकंडक्टर फैब के 2028 तक चालू होने की अपेक्षा है।

स्तंभ 4 : ATMP/OSAT पारिस्थितिकी तंत्र को सुदृढ़ करना

  • असेंबली, परीक्षण, मार्किंग एवं पैकेजिंग (ATMP) तथा आउटसोर्स्ड सेमीकंडक्टर असेंबली एंड टेस्ट (OSAT) परिचालनों में भारत की क्षमताओं का विस्तार करना।
  • भारत को सेमीकंडक्टर पैकेजिंग एवं परीक्षण सेवाओं के एक प्रमुख वैश्विक केंद्र के रूप में स्थापित करना।

स्तंभ 5 : अनुसंधान एवं विकास (R&D)

  • वर्तमान 28 nm–110 nm नोड क्षमता से आगे की अगली पीढ़ी की सेमीकंडक्टर प्रौद्योगिकियों के विकास को समर्थन देना।
  • उद्योग, शिक्षण संस्थानों, स्टार्टअप्स तथा वैश्विक अनुसंधान संस्थानों के बीच सहयोग को प्रोत्साहित करना।

स्तंभ 6 : प्रतिभा विकास (Talent Development)

  • विशेषीकृत शिक्षा, कौशल विकास, प्रशिक्षण तथा उद्योग–शिक्षा संस्थान साझेदारी के माध्यम से भविष्य के लिए तैयार सेमीकंडक्टर कार्यबल का निर्माण करना।
  • सेमीकंडक्टर पारिस्थितिकी तंत्र में इंजीनियरों, शोधकर्ताओं तथा तकनीशियनों की बढ़ती मांग को पूरा करना।

सेमीकॉन 1.0 के अंतर्गत प्रमुख उपलब्धियाँ

  • विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र का विस्तार: ₹1.5 लाख करोड़ से अधिक के निवेश के साथ 12 सेमीकंडक्टर परियोजनाओं को स्वीकृति दी गई, जिससे भारत के सेमीकंडक्टर विनिर्माण पारिस्थितिकी तंत्र की आधारशिला रखी गई।
  • उत्पादन का प्रारंभ: माइक्रॉन (Micron), केन्स (Kaynes) तथा सीजी सेमी (CG Semi) द्वारा स्थापित इकाइयों में वाणिज्यिक उत्पादन प्रारंभ हो चुका है, जिससे केवल परियोजनाओं की स्वीकृति से वास्तविक विनिर्माण की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है।
  • अभिकल्पन पारिस्थितिकी तंत्र का विकास: 24 चिप-अभिकल्पन परियोजनाओं को समर्थन प्रदान किया गया तथा 105 स्टार्टअप्स/सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यमों (MSMEs) को उन्नत इलेक्ट्रॉनिक अभिकल्पन स्वचालन (EDA) उपकरण उपलब्ध कराए गए, जिससे स्वदेशी सेमीकंडक्टर अभिकल्पन क्षमता सुदृढ़ हुई।
  • वैश्विक विश्वास में वृद्धि: अग्रणी घरेलू एवं अंतरराष्ट्रीय कंपनियों की भागीदारी भारत की सेमीकंडक्टर महत्वाकांक्षाओं तथा नीतिगत ढाँचे में बढ़ते निवेशक विश्वास को दर्शाती है।

भारत के सेमीकंडक्टर पारिस्थितिकी तंत्र के निर्माण में चुनौतियाँ

  • पूंजी-गहन उद्योग: सेमीकंडक्टर विनिर्माण के लिए अत्यधिक निवेश, लंबी परियोजना अवधि तथा निरंतर प्रौद्योगिकी उन्नयन की आवश्यकता होती है।
  • प्रौद्योगिकी पर निर्भरता: उन्नत सेमीकंडक्टर विनिर्माण प्रौद्योगिकियाँ अभी भी कुछ सीमित देशों एवं कंपनियों के नियंत्रण में हैं।
  • पारिस्थितिकी तंत्र में कमियाँ: सेमीकंडक्टर-ग्रेड सामग्री, उपकरणों तथा विनिर्माण संबंधी आवश्यकताओं के लिए भारत अभी भी आयात पर काफी हद तक निर्भर है।
  • कुशल मानव संसाधन की कमी: दीर्घकालिक विकास के लिए बड़ी संख्या में विशेषीकृत सेमीकंडक्टर इंजीनियरों, तकनीशियनों तथा शोधकर्ताओं की आवश्यकता है।
  • वैश्विक प्रतिस्पर्धा: भारत को ताइवान, दक्षिण कोरिया, संयुक्त राज्य अमेरिका, चीन एवं जापान जैसे स्थापित सेमीकंडक्टर केंद्रों से कड़ी प्रतिस्पर्धा का सामना करना पड़ रहा है।

आगे की राह

  • सेमीकंडक्टर अभिकल्पन एवं बौद्धिक संपदा को सुदृढ़ करना: स्वदेशी चिप-अभिकल्पन, सेमीकंडक्टर बौद्धिक संपदा (IP) के विकास तथा फैबलेस स्टार्टअप्स को और अधिक प्रोत्साहन देना।
  • घरेलू मशीन एवं सामग्री पारिस्थितिकी तंत्र का विकास: सेमीकंडक्टर उपकरणों, रसायनों, गैसों, वेफर तथा विशेष सामग्रियों के घरेलू उत्पादन की क्षमता विकसित करना।
  • फैब एवं ATMP/OSAT इकाइयों की स्थापना में तेजी: स्वीकृत विनिर्माण एवं पैकेजिंग परियोजनाओं को समयबद्ध ढंग से चालू करना सुनिश्चित करना।
  • उन्नत अनुसंधान एवं विकास (R&D) में निवेश: उद्योग एवं शिक्षण संस्थानों के बीच मजबूत सहयोग के माध्यम से अगली पीढ़ी की सेमीकंडक्टर प्रौद्योगिकियों का विकास करना।
  • प्रतिभा विकास का विस्तार: भविष्य की आवश्यकताओं को ध्यान में रखते हुए सेमीकंडक्टर-केंद्रित शिक्षा, कौशल विकास एवं अनुसंधान कार्यक्रमों का विस्तार करना।
  • वैश्विक एकीकरण को गहरा करना: वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं में अधिक गहराई से एकीकृत होकर तथा रणनीतिक निवेश आकर्षित करके भारत को एक विश्वसनीय सेमीकंडक्टर साझेदार के रूप में स्थापित करना।
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