संबंधित पाठ्यक्रम

सामान्य अध्ययन-2: महत्वपूर्ण अंतर्राष्ट्रीय संस्थान, एजेंसियाँ और मंच – उनकी संरचना, अधिदेश।

सामान्य अध्ययन -3: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

संदर्भ: नेपाल जलवायु न्याय की मांग कर रहा है और 26 अगस्त 2026 को नेपाल और तिब्बत में आई विनाशकारी बाढ़ के बाद संयुक्त राष्ट्र हानि और क्षति कोष से प्रारंभिक 2 करोड़ डॉलर की मांग कर रहा है।

अन्य संबंधित जानकारी

  • बाढ़ का प्रभाव: 1,300 से अधिक लोगों की मृत्यु हो गई और 5,000 से अधिक लोग अभी भी लापता हैं।
  • कारण: लांगटांग लिरुंग क्षेत्र में एक बड़े हिमनद तथा चट्टान-बर्फ के ढहने से ल्हेंडे खोला, भोटे कोशी और त्रिशूली नदी प्रणालियों के माध्यम से मलबे और पानी का तेज प्रवाह उत्पन्न हुआ।

नेपाल की जलवायु न्याय की मांग के पीछे तर्क

  • ऐतिहासिक उत्तरदायित्व: जलवायु परिवर्तन के प्रमुख कारण वायुमंडल में संचित CO₂ में 25% योगदान के साथ अमेरिका प्रमुख योगदानकर्ता है।
  • जलवायु न्याय के छह स्तंभ: यूरोप का वैश्विक संचित CO₂ में लगभग 20%, जबकि चीन का 15% योगदान है। भारत का योगदान 4% से कम है।
  • तीसरे ध्रुव” की विडंबना: वैश्विक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में केवल 0.1% योगदान देने के बावजूद, नेपाल के हिंदू कुश हिमालय (HKH) में ऊंचाई-निर्भर तापन (Elevation-Dependent Warming—EDW) के कारण वैश्विक औसत की तुलना में लगभग दोगुनी गति से तापमान बढ़ रहा है, जिससे हिमनदों का पिघलाव ऐतिहासिक स्तरों की तुलना में लगभग 10 गुना तेज हो गया है।
  • प्रति व्यक्ति उत्सर्जन: भारत का प्रति व्यक्ति CO₂ उत्सर्जन लगभग 2 टन/वर्ष है, जबकि वैश्विक औसत 4.5 टन/वर्ष है।
  • जलवायु न्याय: नेपाल का तर्क है कि यह दान का विषय नहीं, बल्कि कानूनी और नैतिक उत्तरदायित्व का विषय है।

हानि और क्षति कोष के बारे में

  • सीओपी27, 2022: 2022 में मिस्र में आयोजित संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (सीओपी27) में जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाली प्राकृतिक आपदाओं से होने वाली क्षति की भरपाई में निम्न-आय वाले विकासशील देशों की सहायता के लिए “हानि और क्षति कोष” बनाने पर सहमति बनी।
  • सीओपी28, 2023: 2023 में दुबई, संयुक्त अरब अमीरात में आयोजित संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन सम्मेलन (सीओपी28) में विकासशील देशों के लिए जलवायु वित्त को प्राथमिकता दी गई।
    • सम्मेलन के पहले दिन आयोजित उद्घाटन पूर्ण सत्र के दौरान, जलवायु परिवर्तन के कारण होने वाली हानि और क्षति को संबोधित करने तथा उसकी भरपाई के लिए हानि और क्षति कोष को आधिकारिक रूप से शुरू किया गया।
  • उद्देश्य: हानि और क्षति कोष एक वैश्विक वित्तीय पैकेज है, जिसका उद्देश्य जलवायु परिवर्तन के क्रमिक प्रभावों का सामना कर रहे देशों के बचाव और पुनर्वास को सुनिश्चित करना है।
  • जलवायु न्याय: यह शब्द उन समृद्ध देशों द्वारा प्रदान किए जाने वाले जलवायु मुआवजे को संदर्भित करता है, जिनके उत्सर्जन ने वैश्विक तापन में योगदान दिया है। यह समुद्र-स्तर में वृद्धि, बाढ़, सूखा और चक्रवात जैसी जलवायु संबंधी चुनौतियों का सामना कर रहे गरीब तथा जलवायु-संवेदनशील देशों को सहायता प्रदान करता है। कोष में योगदान स्वैच्छिक है।

हानि और क्षति कोष की स्थिति

  • वित्तपोषण की स्थिति: संयुक्त राष्ट्र के हानि और क्षति कोष के लिए लगभग 82.2 करोड़ डॉलर की राशि देने का वादा किया गया है, लेकिन लगभग 35 करोड़ डॉलर राशि वितरण के लिए आवंटित की गई है। संयुक्त अरब अमीरात ने 10 करोड़ डॉलर प्रदान किए हैं, जबकि अन्य योगदान का बड़ा हिस्सा यूरोप से आया है।
  • अमेरिका की वापसी: अमेरिका, जिसने लगभग 1.7 करोड़ डॉलर देने का वादा किया था, अब इस वित्तपोषण तंत्र से बाहर हो गया है। राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने जलवायु परिवर्तन को ‘धोखा’ बताया है।

औद्योगीकरण और जलवायु परिवर्तन

  • औद्योगिक युग और उत्सर्जन:औद्योगिक युग की शुरुआत 1850 में हुई, जिसने ग्रीनहाउस गैसों के उत्पादन और अवशोषण की पृथ्वी की प्राकृतिक प्रणाली को बाधित किया।
    • अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ सभी उत्सर्जनों के 50% के लिए जिम्मेदार हैं; इसमें रूस, कनाडा, जापान और ऑस्ट्रेलिया को शामिल करने पर यह हिस्सेदारी बढ़कर 65% (दो-तिहाई) हो जाती है।
  • ग्रीनहाउस गैसें और वैश्विक तापन:ग्रीनहाउस गैसों में मीथेन, नाइट्रस ऑक्साइड, जलवाष्प और CO₂ शामिल हैं, जिनमें CO₂ वैश्विक तापन के लिए सबसे अधिक जिम्मेदार है।
    • कार्बन कण अत्यंत बड़ी मात्रा में उत्सर्जित होते हैं और एक सहस्राब्दी या उससे अधिक समय तक पृथ्वी के वायुमंडल में बने रह सकते हैं तथा इसे गर्म कर सकते हैं।

जलवायु मुआवजे की प्रमुख बाधाएँ

  • कानूनी बाधा: पेरिस समझौते का अनुच्छेद 8 हानि और क्षति को मान्यता देता है, लेकिन इसे दायित्व या मुआवजे के आधार के रूप में शामिल नहीं करता, जिससे विशिष्ट उत्सर्जकों के विरुद्ध कानूनी दावे सीमित हो जाते हैं।
  • वित्तपोषण की कमी: हानि और क्षति के लिए प्रतिक्रिया कोष (एफआरएलडी), जिसे सीओपी28 में परिचालित किया गया, के पास अरबों डॉलर की आपदा लागत की तुलना में लगभग 70 करोड़ अमेरिकी डॉलर ही हैं। 50–200 लाख अमेरिकी डॉलर के पायलट अनुदान और धीमी धनराशि वितरण व्यवस्था आपातकालीन पुनर्बहाली के लिए अपर्याप्त हैं।
  • उत्तरदायित्व निर्धारण की चुनौती: चट्टान-हिम ढहने जैसी किसी विशिष्ट आपदा को मानवजनित तापन से जोड़ना कठिन है, क्योंकि इसमें भूकंपीय गतिविधि, स्थानीय भू-आकृति विज्ञान और मौसम के स्वरूपों के बीच परस्पर क्रियाएँ शामिल होती हैं।
  • राहत बनाम दायित्व: प्रमुख शक्तियाँ मानवीय सहायता के रूप में हेलीकॉप्टर, बचाव दल और चिकित्सा सहायता उपलब्ध कराती हैं, लेकिन ऐसे बाध्यकारी प्रबंधों का विरोध करती हैं जो क्षतिपूर्ति संबंधी दायित्व उत्पन्न कर सकते हैं।

भारत के लिए क्षेत्रीय चिंताएँ

  • CBDR-RC दुविधा: भारत द्वारा सामान्य लेकिन विभेदित उत्तरदायित्व और संबंधित क्षमताओं (CBDR-RC) की वकालत करने से नेपाल जैसे संवेदनशील पड़ोसी देशों का समर्थन करने के लिए नैतिक दबाव बनता है, भले ही इससे कानूनी दायित्व स्थापित नहीं होता।
  • विद्युत व्यापार संबंधी बाधाएँ: सीमा-पार विद्युत व्यापार (सीबीईटी) संबंधी दिशा-निर्देश, जो चीनी ठेकेदारों या पूंजी से जुड़े विद्युत आयात को प्रतिबंधित करते हैं, नेपाल के जलविद्युत राजस्व और पुनर्बहाली को प्रभावित कर सकते हैं।
  • पूर्व-चेतावनी संबंधी कमियाँ: सीमित वास्तविक-समय जल-मौसम विज्ञान संबंधी आँकड़ों के आदान-प्रदान से हिमनद झील विस्फोटक बाढ़ (जीएलओएफ) और हिमालयी खतरों के प्रबंधन में संवेदनशीलताएँ बढ़ती हैं।
  • भारत के लिए निहितार्थ: नेपाल का ऐतिहासिक उत्सर्जन और प्रति व्यक्ति उत्तरदायित्व पर जोर भारत पर कूटनीतिक दबाव बनाता है, क्योंकि नई दिल्ली लंबे समय से इन सिद्धांतों का उपयोग विकसित देशों से अधिक उत्तरदायित्व की मांग करने के लिए करती रही है।
  • साझा हिमालयी जोखिम: क्रायोस्फीयर का क्षरण भारत-गंगा के मैदान में नीचे की ओर स्थित नदियों और समुदायों के लिए खतरा पैदा करता है, जिससे हिमालयी लचीलापन एक साझा क्षेत्रीय चिंता बन जाता है।

आगे की राह

  • हिमालयी पूर्व-चेतावनी नेटवर्क: भारत, चीन, नेपाल और भूटान को उपग्रह रडार और जलवैज्ञानिक टेलीमेट्री का उपयोग करते हुए एक खुली पहुँच वाली सीमा-पार प्रणाली स्थापित करनी चाहिए, जो सेंडाई फ्रेमवर्क के लक्ष्य G को समर्थन प्रदान करे।
  • क्षेत्रीय जोखिम कोष: कैरेबियन कैटास्ट्रॉफ रिस्क इंश्योरेंस फैसिलिटी पर आधारित एक दक्षिण एशियाई आपदा बीमा तंत्र बनाया जाए, जिसमें त्वरित वित्तपोषण के लिए पैरामीट्रिक ट्रिगर का उपयोग किया जाए।
  • पुनर्बहाली को भू-राजनीति से अलग करना: बीबीआईएन (बांग्लादेश, भूटान, भारत, नेपाल) पहल को आपदा-प्रभावित जलविद्युत परियोजनाओं से राजस्व बहाल करने के लिए विद्युत खरीद समझौतों में मानवीय अपवाद शामिल करने पर विचार करना चाहिए।
  • त्वरित जलवायु वित्त: यूएनएफसीसीसी को हानि और क्षति की रूपरेखा के अंतर्गत त्वरित धनराशि वितरण वाली आपातकालीन व्यवस्था बनानी चाहिए, ताकि तत्काल राहत को दीर्घकालिक अनुकूलन वित्त से जोड़ा जा सके।
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