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सामान्य अध्ययन-3: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

संदर्भ: बॉन चैलेंज पर भारत की दूसरी प्रगति रिपोर्ट (2011–2020) के अनुसार, देश ने 21.76 मिलियन हेक्टेयर क्षरित और वनविहीन भूमि को बहाल किया है, जिससे भारत ने अपने 2030 के पुनर्स्थापन लक्ष्य का लगभग 84% हासिल कर लिया है।

अन्य संबंधित जानकारी

  • यह रिपोर्ट पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEFCC) द्वारा IUCN के सहयोग से ‘विश्व मरुस्थलीकरण और सूखा रोकथाम दिवस’ (17 जून) पर जारी की गई।
  • इसमें वृक्षारोपण, प्राकृतिक पुनर्जनन, वन-संवर्धन, कृषि-वानिकी और मैंग्रोव बहाली जैसी विधियों का उपयोग किया गया।
  • तेलंगाना (4.18 मिलियन हेक्टेयर) भूमि बहाली में अग्रणी राज्य रहा। इसके अलावा मध्य प्रदेश, ओडिशा, गुजरात और आंध्र प्रदेश ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
  • बहाली गतिविधियों से लगभग 1.22 बिलियन व्यक्ति-दिवस का रोजगार सृजित हुआ, जो इसके आर्थिक लाभ को दर्शाता है।
  • इन प्रयासों के माध्यम से लगभग 461.14 मिलियन टन कार्बन संचयन हुआ है, जो जलवायु परिवर्तन के प्रभावों को कम करने में सहायक है।
  • यह रिपोर्ट ‘भूमि क्षरण तटस्थता’ (Land Degradation Neutrality – LDN) और पारिस्थितिकी तंत्र की मजबूती को बढ़ावा देती है।

बॉन चैलेंज के बारे में

  • बॉन चैलेंज एक वैश्विक पहल है जिसे 2011 में दुनिया भर में क्षरित और वनविहीन परिदृश्यों को बहाल करने के लिए शुरू किया गया था।
  • इसके प्रमुख लक्ष्य निम्नलिखित हैं:
    • 2020 तक: 150 मिलियन हेक्टेयर भूमि को बहाली के अंतर्गत लाना।
    • 2030 तक: 350 मिलियन हेक्टेयर भूमि को बहाली के अंतर्गत लाना।
  • यह पहल जर्मनी सरकार और ‘प्रकृति संरक्षण के लिए अंतरराष्ट्रीय संघ’ (IUCN) द्वारा समर्थित है। यह पारिस्थितिकी तंत्र की बहाली के माध्यम से जलवायु, जैव विविधता और सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए एक वैश्विक मंच के रूप में कार्य करती है।

भारत की प्रतिबद्धताएँ और हासिल प्रगति

  • 2015 में, भारत ने 2020 तक 13 मिलियन हेक्टेयर (Mha) और 2030 तक अतिरिक्त 8 मिलियन हेक्टेयर क्षरित और वनविहीन भूमि को बहाल करने का संकल्प लिया था।
  • वर्ष 2019 में नई दिल्ली में आयोजित UNCCD COP-14 के दौरान, भारत ने अपने पुनर्स्थापन लक्ष्य को बढ़ाकर 2030 तक 26 मिलियन हेक्टेयर कर दिया।
  • बॉन चैलेंज की पहली प्रगति रिपोर्ट के अनुसार, 2011 और 2017 के बीच भारत ने 9.8 मिलियन हेक्टेयर भूमि को बहाल किया था।
  • देश भर में परिदृश्य बहाली में योगदान देने वाले प्रमुख कार्यक्रम निम्नलिखित हैं:
    • प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना (PMKSY) – वाटरशेड विकास घटक।
    • ग्रीन इंडिया मिशन।
    • राष्ट्रीय वनीकरण कार्यक्रम (NAP)।
    • CAMPA-समर्थित वनीकरण पहल।
    • महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (MGNREGS)।
    • संयुक्त वन प्रबंधन (JFM), वाटरशेड कार्यक्रमों और आजीविका-आधारित बहाली पहलों के माध्यम से स्थानीय समुदायों की भागीदारी ने बहाली परिणामों की स्थिरता और प्रभावशीलता में सुधार किया है।

भूमि बहाली का महत्व

  • मरुस्थलीकरण से निपटना: बहाली से भूमि क्षरण को उलटने में मदद मिलती है और यह UNCCD के तहत ‘भूमि क्षरण तटस्थता’ प्राप्त करने के भारत के प्रयासों में सहायता करता है।
  • जलवायु लचीलापन बढ़ाना: स्वस्थ पारिस्थितिकी तंत्र कार्बन संचयन में सुधार करते हैं, जलवायु अनुकूलन को मजबूत करते हैं और सूखे तथा अत्यधिक मौसम की घटनाओं के प्रति संवेदनशीलता को कम करते हैं।
  • जैव विविधता का संरक्षण: क्षरित वनों, घास के मैदानों और आर्द्रभूमियों की बहाली से आवासों के बीच संपर्क बेहतर होता है और जैव विविधता संरक्षण को बढ़ावा मिलता है।
  • मृदा और जल सुरक्षा में सुधार: बहाल किए गए परिदृश्य मृदा की उर्वरता, भूजल पुनर्भरण और जलसंभर के स्वास्थ्य को बेहतर बनाते हैं, जिससे कृषि उत्पादकता बढ़ती है।
  • ग्रामीण आजीविका का समर्थन: बहाली कार्यक्रम रोजगार के अवसर उत्पन्न करते हैं और ग्रामीण तथा वन-आश्रित समुदायों के लिए आय सुरक्षा में सुधार करते हैं।

चुनौतियाँ और चिंताएँ

  • भूमि क्षरण का व्यापक विस्तार: ‘भारत मरुस्थलीकरण और भूमि क्षरण एटलस’ के अनुसार, भारत का लगभग 97.85 मिलियन हेक्टेयर (देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का 29.77%) भूमि क्षरण और मरुस्थलीकरण से प्रभावित है।
  • बहाली की गुणवत्ता सुनिश्चित करना: पुनर्स्थापन प्रयासों का ध्यान केवल ‘वृक्ष आवरण’ बढ़ाने पर नहीं, बल्कि पारिस्थितिकी तंत्र के स्वास्थ्य, देशी जैव विविधता और पारिस्थितिक कार्यात्मकता पर होना चाहिए।
  • विकासात्मक दबाव: शहरीकरण, बुनियादी ढांचे का विस्तार, खनन और भूमि-उपयोग में बदलाव जैसे कारक बहाल किए गए और पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील परिदृश्यों पर लगातार दबाव डाल रहे हैं।
  • दीर्घकालिक निगरानी की आवश्यकता: बहाली प्रयासों की दीर्घकालिक सफलता सुनिश्चित करने के लिए निरंतर वित्तपोषण, वैज्ञानिक निगरानी और समय-समय पर मूल्यांकन अनिवार्य है।

आगे की राह

  • परिदृश्य-आधारित बहाली प्रकिया को अपनाना: केवल खंडित हस्तक्षेपों के बजाय वनों, घास के मैदानों, आर्द्रभूमियों और कृषि परिदृश्यों के एकीकृत पुनर्स्थापन को बढ़ावा देना।
  • सामुदायिक भागीदारी को मजबूत करना: बहाली संबंधी पहलों की योजना बनाने और उन्हें लागू करने में स्थानीय समुदायों, वन निवासियों और पंचायती राज संस्थानों को सशक्त बनाना।
  • जलवायु कार्रवाई के साथ एकीकरण: बहाली कार्यक्रमों को भारत की जलवायु अनुकूलन, जैव विविधता संरक्षण और सतत विकास की प्रतिबद्धताओं के साथ संरेखित करना।
  • प्रौद्योगिकी और वैज्ञानिक निगरानी का लाभ उठाना: साक्ष्य-आधारित बहाली और निगरानी के लिए भू-स्थानिक उपकरणों, रिमोट सेंसिंग और पारिस्थितिकी तंत्र-स्वास्थ्य संकेतकों का उपयोग बढ़ाना।
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