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सामान्य अध्ययन-2: सांविधिक, विनियामक और विभिन्न अर्ध-न्यायिक निकाय; केंद्र और राज्यों के कार्य और उत्तरदायित्व, संघीय ढाँचा से संबंधित विषय और चुनौतियां।  

संदर्भ: हाल ही में केंद्रीय गृह मंत्री ने छत्तीसगढ़ के बस्तर में केंद्रीय क्षेत्रीय परिषद (CZC – Central Zonal Council) की 26वीं बैठक की अध्यक्षता की।  

अन्य संबंधित जानकारी:

  • इस बैठक में केंद्रीय क्षेत्रीय परिषद के 4 राज्यों – छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के मुख्यमंत्रियों ने भाग लिया।
  • इस बैठक का आयोजन गृह मंत्रालय के अधीन कार्यरत अंतर-राज्य परिषद सचिवालय द्वारा किया गया था, जिसमें छत्तीसगढ़ सरकार मेजबान राज्य के रूप में शामिल थी।

बैठक के मुख्य बिंदु

  • केंद्रीय गृह मंत्री ने कहा कि भारत ने वामपंथी उग्रवाद को समाप्त करने में बड़ी प्रगति की है और देश के “नक्सल-मुक्त” होने के साथ ही अब ध्यान उन क्षेत्रों में विकास को गति देने पर केंद्रित होना चाहिए जो दशकों से उग्रवाद से प्रभावित रहे हैं।
  • बैठक में आंतरिक सुरक्षा, साइबर अपराध, मादक पदार्थ नियंत्रण, सीमा विवाद और कानून व्यवस्था से जुड़े मुद्दों पर सुदृढ़ अंतर-राज्यीय समन्वय पर बल दिया गया।
  • परिषद ने “विकसित भारत” के विजन के प्रति सहकारी संघवाद, सर्वसम्मति-आधारित शासन और केंद्र तथा राज्यों के बीच समन्वित प्रयासों के महत्व को दोहराया।

क्षेत्रीय परिषदों के बारे में

  • क्षेत्रीय परिषदें सांविधिक सलाहकारी निकाय हैं, जिन्हें राज्य पुनर्गठन आयोग (फज़ल अली आयोग) की सिफारिशों के बाद राज्य पुनर्गठन अधिनियम, 1956 के तहत स्थापित किया गया था।
  • इनका गठन निम्नलिखित को बढ़ावा देने के लिए किया गया था:
    • सहकारी संघवाद,
    • राष्ट्रीय एकीकरण,
    • अंतर-राज्यीय समन्वय,
    • और संवाद तथा आम सहमति के माध्यम से क्षेत्रीय विवादों का समाधान।
  • भारत में पांच क्षेत्रीय परिषदें हैं — उत्तरी, मध्य, पूर्वी, पश्चिमी और दक्षिणी; जबकि उत्तर-पूर्वी परिषद एक अलग सांविधिक ढांचे के तहत स्वतंत्र रूप से कार्य करती है।
    • उत्तर-पूर्वी परिषद का गठन उत्तर-पूर्वी परिषद अधिनियम, 1971 द्वारा किया गया था, और इसके सदस्यों में असम, मणिपुर, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश, नागालैंड, मेघालय, त्रिपुरा और सिक्किम शामिल हैं।
  • केंद्रीय गृह मंत्री सभी क्षेत्रीय परिषदों के अध्यक्ष के रूप में कार्य करते हैं, जबकि सदस्य राज्यों के मुख्यमंत्री और दो मंत्री प्रत्येक क्षेत्रीय परिषद में सदस्य होते हैं।
    • केंद्र शासित प्रदेशों (UTs) के मामले में, प्रत्येक केंद्र शासित प्रदेश से दो सदस्य शामिल होते हैं।
    • प्रत्येक मुख्यमंत्री चक्रानुक्रम के आधार पर परिषद के उपाध्यक्ष के रूप में कार्य करता है, जो एक समय में एक वर्ष की अवधि के लिए पद धारण करता है।
  • प्रत्येक क्षेत्रीय परिषद की एक स्थायी समिति होती है, जिसमें सदस्य राज्यों के मुख्य सचिव शामिल होते हैं, जो प्रारंभिक चर्चा करती है और क्षेत्रीय परिषद की बैठकों से पहले मुद्दों को हल करने में मदद करती है।
  • गृह मंत्रालय के अधीन अंतर-राज्य परिषद सचिवालय क्षेत्रीय परिषद की बैठकों के आयोजन और समन्वय के लिए नोडल निकाय के रूप में कार्य करता है।

भारतीय संघ में क्षेत्रीय परिषदों का महत्व

  • सहकारी संघवाद को बढ़ावा देना: क्षेत्रीय परिषदें केंद्र और राज्यों के बीच नियमित संवाद और समन्वय के लिए एक संस्थागत मंच प्रदान करती हैं।
  • अंतर-राज्यीय मुद्दों का शांतिपूर्ण समाधान: ये परिषदें परामर्श और आम सहमति बनाने के माध्यम से सीमाओं, जल बंटवारे, परिवहन और सुरक्षा से जुड़े विवादों को सुलझाने में मदद करती हैं।
  • नीतिगत समन्वय में सुधार: ये परिषदें राष्ट्रीय योजनाओं के समन्वित कार्यान्वयन और राज्यों के बीच सर्वोत्तम शासन प्रथाओं के साझाकरण को सुगम बनाती हैं।
  • राष्ट्रीय एकीकरण को बढ़ावा देना: राज्यों के बीच नियमित राजनीतिक और प्रशासनिक संपर्क क्षेत्रवाद को कम करने और राष्ट्रीय एकता की भावना को बल देने में मदद करता है।
  • क्षेत्रीय और सुरक्षा चुनौतियों का समाधान: क्षेत्रीय परिषदें वामपंथी उग्रवाद, साइबर अपराध, आपदा प्रबंधन और क्षेत्रीय विकास के अंतराल जैसी चुनौतियों के प्रति समन्वित प्रतिक्रिया सुनिश्चित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।

SOURCES
PIB
Interstate Council
Interstate Council
MHA

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