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सामान्य अध्ययन-2: महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय संस्थाएँ, एजेंसियाँ और मंच—उनकी संरचना एवं अधिदेश।

सामान्य अध्ययन -3: संरक्षण; आपदा एवं आपदा प्रबंधन।

संदर्भ: संयुक्त राष्ट्र महासभा (UNGA) ने हाल ही में अपने 81वें सत्र के दौरान समुद्र स्तर में वृद्धि पर संयुक्त राष्ट्र घोषणा को अपनाया। इसमें समुद्र स्तर में वृद्धि को एक तेजी से बढ़ती वैश्विक चुनौती के रूप में मान्यता दी गई है, जिसके समाधान के लिए समन्वित अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई आवश्यक है।

अन्य संबंधित जानकारी

  • समुद्र स्तर में वृद्धि पर पहली संयुक्त राष्ट्र घोषणा: यह राजनीतिक घोषणा जलवायु परिवर्तन, विकास, आपदा जोखिम न्यूनीकरण, मानवाधिकार और अंतरराष्ट्रीय कानून से जुड़े आयामों को एक साथ समाहित करती है।
  • प्रकृति और ढाँचा: यह एक राजनीतिक घोषणा है, जो मौजूदा अंतरराष्ट्रीय ढाँचों, विशेष रूप से समुद्र के कानून पर संयुक्त राष्ट्र अभिसमय (UNCLOS), संयुक्त राष्ट्र जलवायु परिवर्तन रूपरेखा अभिसमय (UNFCCC) और पेरिस समझौते को सुदृढ़ करती है; यह कोई नई संधि स्थापित नहीं करती।
  • SIDS का नेतृत्व: यह घोषणा लघु द्वीपीय विकासशील राज्यों (SIDS) द्वारा दशकों से की जा रही वकालत को मान्यता देती है। इसमें 1989 के माले घोषणा-पत्र, 2021 एवं 2023 के प्रशांत द्वीप समूह मंच के घोषणा-पत्रों तथा 2021 एवं 2024 के लघु द्वीपीय राज्यों के गठबंधन (AOSIS) के घोषणा-पत्रों का उल्लेख किया गया है। 

समुद्र स्तर में वृद्धि को समझना

  • समुद्र स्तर क्यों बढ़ रहा है?
  • समुद्र स्तर में वृद्धि (SLR) विश्व के महासागरों के औसत स्तर में होने वाली दीर्घकालिक वृद्धि है। वर्तमान में यह वृद्धि मुख्य रूप से वैश्विक तापन के कारण हो रही है, जिसके पीछे दो प्रमुख प्रक्रियाएँ हैं:
    • तापीय प्रसार: महासागर वैश्विक तापन से उत्पन्न अतिरिक्त ऊष्मा का बड़ा हिस्सा अवशोषित करते हैं। जैसे-जैसे समुद्री जल गर्म होता है, उसका प्रसार होता है और वह अधिक आयतन घेरता है।
    • स्थल-आधारित बर्फ का पिघलना: तापमान में वृद्धि से हिमनदों और हिम चादरों के पिघलने की दर बढ़ती है, जिससे महासागरों में मीठे जल की मात्रा बढ़ती है।
  • घोषणा में भी महासागरीय तापन तथा हिम चादरों और हिमनदों के पिघलने को समुद्र स्तर में वृद्धि के प्रमुख कारणों के रूप में पहचाना गया है और इस बात पर जोर दिया गया है कि यह घटना तेजी से बढ़ रही है।
  • वर्तमान प्रवृत्ति और प्रमुख आँकड़े
    • 2014–2023 के दौरान वैश्विक औसत समुद्र स्तर में प्रति वर्ष औसतन 4.7 मिमी की वृद्धि हुई, जबकि 2024 में यह वार्षिक वृद्धि 5.9 मिमी तक पहुँच गई, जो अब तक दर्ज की गई सबसे अधिक वार्षिक वृद्धि थी।
    • 2025 के अंत तक वैश्विक औसत समुद्र स्तर जनवरी 1993 की तुलना में लगभग 11 सेमी अधिक था। जनवरी 1993 में उपग्रह-आधारित रिकॉर्ड की शुरुआत हुई थी। यह दीर्घकाल में समुद्र स्तर में वृद्धि की बढ़ती गति को दर्शाता है।
    • लगभग 77 करोड़ लोग, यानी मानवता का लगभग दसवाँ हिस्सा, ऐसे तटीय क्षेत्रों में रहते हैं जो उच्च ज्वार रेखा से 5 मीटर से कम ऊँचाई पर स्थित हैं। इसलिए वे समुद्र स्तर में वृद्धि के प्रति विशेष रूप से संवेदनशील हैं।
    • पर्याप्त अनुकूलन और शमन उपायों के अभाव में 2100 तक तटीय शहरों और समुदायों के सामने आने वाले जोखिम कम-से-कम दस गुना बढ़ने का अनुमान है।

समुद्र स्तर में वृद्धि के प्रभाव

  • भौतिक और पर्यावरणीय प्रभाव: तटीय बाढ़, तूफानी ज्वार, तटीय अपरदन, स्थायी जलमग्नता, रहने योग्य भूमि की हानि और तटीय पारिस्थितिक तंत्र के क्षरण में वृद्धि हो सकती है।
  • जल और खाद्य सुरक्षा: लवणीय जल का अंतःप्रवेश मीठे जल के स्रोतों और कृषि भूमि को दूषित कर सकता है। साथ ही, तटीय पारिस्थितिक तंत्र पर पड़ने वाले प्रभावों से मत्स्य पालन और जलीय खाद्य प्रणालियाँ भी प्रभावित हो सकती हैं।
  • आर्थिक और अवसंरचनात्मक प्रभाव: समुद्र स्तर में वृद्धि से भवनों, बंदरगाहों, परिवहन नेटवर्क, ऊर्जा एवं जल प्रणालियों, स्वास्थ्य सुविधाओं, पर्यटन और बीमा बाजारों पर खतरा बढ़ सकता है। संयुक्त राष्ट्र की रिपोर्ट के अनुसार, मौजूदा तटीय अवसंरचना को होने वाली क्षति 1.8 ट्रिलियन डॉलर से अधिक हो चुकी है।
  • मानवाधिकार और विस्थापन: इसके प्रभाव पर्याप्त आवास, सुरक्षित पेयजल, स्वच्छता, भोजन, स्वास्थ्य और शिक्षा तक पहुँच जैसे बुनियादी अधिकारों तक विस्तृत हो सकते हैं। संयुक्त राष्ट्र की विशेष रिपोर्ट के अनुसार, तत्काल अनुकूलन उपायों के अभाव में 2050 तक 120 करोड़ तक लोग विस्थापन का सामना कर सकते हैं।

घोषणा के प्रमुख बिंदु

  • ज्ञान, आँकड़े और पूर्व चेतावनी: वैज्ञानिक अवलोकन, आँकड़ा संग्रह, मॉडलिंग, जोखिम आकलन और बहु-जोखिम पूर्व चेतावनी प्रणालियों को सुदृढ़ करने का आह्वान किया गया है। इसमें वैश्विक महासागर अवलोकन प्रणाली और वैश्विक समुद्र स्तर अवलोकन प्रणाली के माध्यम से किए जाने वाले प्रयास भी शामिल हैं। घोषणा पारंपरिक, स्वदेशी और स्थानीय ज्ञान को भी मान्यता देती है तथा क्षमता निर्माण और प्रौद्योगिकी हस्तांतरण का आह्वान करती है।
  • अनुकूलन, वित्त और लचीलापन: विशेष रूप से विकासशील देशों, SIDS और LDCs के लिए सार्वजनिक एवं निजी वित्त में वृद्धि का आह्वान किया गया है। साथ ही समयबद्ध और पूर्वानुमेय वित्त तक पहुँच, प्रकृति-आधारित समाधानों तथा महत्वपूर्ण अवसंरचना की योजना में समुद्र स्तर वृद्धि के अनुमानों को शामिल करने पर जोर दिया गया है।
  • आजीविका, मानव गतिशीलता और सांस्कृतिक विरासत: सामाजिक सुरक्षा और राष्ट्रीय विकास योजनाओं में समुद्र स्तर वृद्धि के जोखिमों को शामिल करने पर जोर दिया गया है। साथ ही आजीविका, महासागर-आधारित आर्थिक गतिविधियों, संवेदनशील समूहों, सांस्कृतिक विरासत और मानव गतिशीलता पर इसके प्रभावों को मान्यता दी गई है।
  • समुद्री क्षेत्र: यह पुष्टि करता है कि UNCLOS के तहत एक बार निर्धारित किए जाने के बाद, समुद्र स्तर में वृद्धि के कारण होने वाले भौतिक परिवर्तनों के बावजूद राज्य अपने समुद्री क्षेत्रों को बनाए रख सकते हैं। साथ ही, उन्हें आवश्यकतानुसार इन क्षेत्रों को अद्यतन करने की क्षमता भी प्राप्त रहती है।
  • राज्य का निरंतर अस्तित्व: यह राज्य के निरंतर अस्तित्व के पक्ष में धारणा की पुष्टि करता है तथा अंतरराष्ट्रीय कानून के अनुरूप राज्य की निरंतरता, संप्रभुता, संप्रभु अधिकार एवं उत्तरदायित्व तथा संयुक्त राष्ट्र की सदस्यता की निरंतरता को मान्यता देता है।
  • मानवाधिकार और कानूनी आयाम: यह कानूनी स्थिरता, निश्चितता और पूर्वानुमेयता पर जोर देता है। साथ ही जलवायु परिवर्तन के संबंध में राज्यों के दायित्वों पर 2025 के अंतरराष्ट्रीय न्यायालय (ICJ) की सलाहकारी राय का उल्लेख करता है और समुद्र स्तर में वृद्धि से प्रभावित लोगों की सुरक्षा का आह्वान करता है।

घोषणा का महत्व

  • समुद्र स्तर में वृद्धि को बहुआयामी शासन संबंधी मुद्दा बनाती है: यह समुद्र स्तर में वृद्धि को केवल पर्यावरणीय समस्या के रूप में देखने के बजाय इसे जलवायु परिवर्तन, अनुकूलन, आपदा जोखिम न्यूनीकरण, वित्त, विकास, मानवाधिकार और अंतरराष्ट्रीय कानून से जोड़ती है।
  • द्वीपीय राज्यों के लिए अधिक निश्चितता प्रदान करती है: समुद्री क्षेत्रों और राज्य की निरंतरता से संबंधित इसके प्रावधान द्वीपीय क्षेत्रों में होने वाले भौतिक परिवर्तनों से उत्पन्न प्रमुख कानूनी चिंताओं को संबोधित करते हैं। यह SIDS के लिए विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
  • पूर्व-तैयारी आधारित कार्रवाई को मजबूत करती है: अवलोकन, जोखिम आकलन, पूर्व चेतावनी और दीर्घकालिक योजना पर जोर देने से आपदा के बाद राहत-केंद्रित प्रतिक्रिया से हटकर पूर्व तैयारी और प्रत्यास्थता पर अधिक ध्यान दिया जा सकता है।
  • विकास और मानव कल्याण की रक्षा करती है: घोषणा यह मान्यता देती है कि समुद्र स्तर में वृद्धि विकास संबंधी उपलब्धियों को कमजोर कर सकती है तथा विशेष रूप से संवेदनशील विकासशील देशों में आजीविका, अवसंरचना, स्वास्थ्य, खाद्य प्रणालियों और सांस्कृतिक विरासत को प्रभावित कर सकती है।

चुनौतियाँ

  • कार्यान्वयन का अंतराल: घोषणा की राजनीतिक प्रतिबद्धताओं और सिद्धांतों को राष्ट्रीय नीतियों, वित्तपोषण तथा समन्वित अंतरराष्ट्रीय कार्रवाई में परिवर्तित करने के लिए निरंतर और प्रभावी कार्यान्वयन आवश्यक होगा।
  • अनुकूलन-वित्त का बड़ा अंतराल: विकासशील देशों को 2035 तक अनुकूलन के लिए प्रतिवर्ष 310–365 अरब डॉलर की आवश्यकता होने का अनुमान है, जबकि 2023 में अंतरराष्ट्रीय सार्वजनिक अनुकूलन वित्तपोषण केवल 26 अरब डॉलर था।
  • वैज्ञानिक एवं क्षमता संबंधी बाधाएँ: विशेष रूप से महासागरों, SIDS और संवेदनशील तटीय क्षेत्रों में निरंतर महासागरीय अवलोकन, आँकड़ों तथा जोखिम-मूल्यांकन की क्षमता में महत्वपूर्ण अंतराल बने हुए हैं।
  • कानूनी संरक्षण भौतिक प्रभावों को रोक नहीं सकता: राज्य की निरंतरता और समुद्री क्षेत्रों की स्थिरता भूमि-हानि, जलमग्नता, पारिस्थितिकी तंत्र के क्षरण, विस्थापन या रहने योग्य क्षेत्रों के लिए उत्पन्न खतरों को समाप्त नहीं कर सकती।

आगे की राह

  • विज्ञान-आधारित अनुकूलन को सुदृढ़ करना: विशेष रूप से संवेदनशील क्षेत्रों में निरंतर महासागरीय अवलोकन, मॉडलिंग, जोखिम-मूल्यांकन, जलवायु संबंधी सूचना तथा बहु-आपदा पूर्व चेतावनी प्रणालियों का विस्तार करना।
  • वित्त एवं क्षमता संबंधी अंतराल को पाटना: विकासशील देशों, विशेष रूप से SIDS और LDCs के लिए पर्याप्त, पूर्वानुमेय और सरल पहुँच वाली अनुकूलन वित्त व्यवस्था, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण तथा क्षमता निर्माण सुनिश्चित करना।
  • लचीले एवं जन-केंद्रित तटीय क्षेत्र विकसित करना: समुद्र स्तर वृद्धि के अनुमानों को बुनियादी ढाँचे और विकास नियोजन में शामिल करना, इंजीनियरी उपायों के साथ प्रकृति-आधारित समाधानों का संयोजन करना तथा आजीविका, मानवाधिकारों और सांस्कृतिक विरासत की रक्षा करना।
  • निरंतर अंतरराष्ट्रीय अनुवर्ती कार्रवाई सुनिश्चित करना: समुद्री क्षेत्रों, राज्य की निरंतरता, मानव गतिशीलता तथा संस्थागत सहायता से संबंधित घोषणा के सिद्धांतों को व्यावहारिक कार्रवाई में परिवर्तित करना और बहुपक्षीय समन्वय को जारी रखना।
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