पाठ्यक्रम 

सामान्य अध्ययन – 3: सिंचाई के विभिन्न प्रकार एवं सिंचाई प्रणालियाँ, कृषि उपज का भंडारण, परिवहन एवं विपणन तथा उनसे संबंधित समस्याएँ एवं बाधाएँ, किसानों की सहायता में ई-प्रौद्योगिकी का उपयोग।

संदर्भ: हाल ही में, केंद्र सरकार ने भारत में जलवायु-सहिष्णु तथा संसाधन-कुशल कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देने के संदर्भ में राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन (NMSA) की प्रगति एवं कार्यान्वयन स्थिति को रेखांकित किया।

राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन (NMSA)

• सरकार ने राष्ट्रीय जलवायु परिवर्तन कार्य योजना के अंतर्गत वर्ष 2014-15 में राष्ट्रीय सतत कृषि मिशन (NMSA) का शुभारंभ किया।

• इस मिशन की परिकल्पना कृषि पर जलवायु परिवर्तनशीलता के प्रतिकूल प्रभावों को कम करने तथा दीर्घकालिक खाद्य एवं आजीविका सुरक्षा सुनिश्चित करने हेतु एक रणनीतिक हस्तक्षेप के रूप में की गई थी।

• मिशन का मुख्य उद्देश्य निम्नलिखित क्षेत्रों पर है: एकीकृत कृषि प्रणाली, मृदा एवं जल संरक्षण, जल के कुशल उपयोग का प्रबंधन, पोषक तत्व प्रबंधन, आजीविका विविधीकरण तथा सतत कृषि पद्धतियाँ।

• वर्ष 2018–19 से NMSA को ‘ग्रीन रिवोल्यूशन – कृषोन्नति योजना’ (GRKY) के अंतर्गत एक उप-योजना के रूप में संचालित किया गया।

• इसके पश्चात वर्ष 2022–23 से इसे प्रधानमंत्री राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (PM-RKVY) की अम्ब्रेला योजना के अंतर्गत पुनर्गठित किया गया, ताकि अभिसरण, प्रशासनिक दक्षता तथा परिणाम-आधारित कार्यान्वयन में सुधार किया जा सके।

• अपने विभिन्न घटकों के माध्यम से NMSA, वर्ष 2030 के संयुक्त राष्ट्र सतत विकास लक्ष्यों (SDGs) विशेषकर SDG 2 (शून्य भूखमरी), SDG 6 (स्वच्छ जल एवं स्वच्छता) तथा SDG 13 (जलवायु कार्रवाई) को समर्थन प्रदान करता है।

NMSA के प्रमुख घटक 

• वर्षा आधारित क्षेत्र विकास (RAD)

  • RAD, एकीकृत कृषि प्रणाली (IFS) के माध्यम से क्षेत्र-आधारित “वाटरशेड प्लस” दृष्टिकोण को बढ़ावा देता है।
  • यह बहुफसली खेती, फसल चक्र, अंतरफसली एवं मिश्रित खेती प्रणालियों को बागवानी, पशुपालन तथा मत्स्य पालन जैसी सहायक गतिविधियों के साथ एकीकृत कर समग्र दृष्टिकोण को प्रोत्साहित करता है, जिससे किसानों की आय एवं लचीलापन बढ़ सके।
  • वर्ष 2014-15 से अब तक वर्षा आधारित क्षेत्र विकास के अंतर्गत ₹2,119.84 करोड़ जारी किए गए हैं, जिसके माध्यम से 8.50 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को आच्छादित किया गया तथा एकीकृत कृषि प्रणाली के माध्यम से 14.35 लाख किसानों को लाभान्वित किया गया। राष्ट्रीय वर्षा सिंचित क्षेत्र प्राधिकरण
  • वर्षा आधारित राष्ट्रीय क्षेत्र प्राधिकरण (NRAA), जिसकी स्थापना वर्ष 2006 में कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय के अंतर्गत की गई थी, वर्षा आधारित क्षेत्र विकास (RAD) घटक हेतु एक ज्ञान साझेदार के रूप में कार्य करता है।

• प्रति बूंद अधिक फसल (PDMC)

  • PDMC का मुख्य उद्देश्य सूक्ष्म सिंचाई तकनीकों, विशेषकर ड्रिप एवं स्प्रिंकलर सिंचाई के माध्यम से खेत स्तर पर जल के कुशल उपयोग को बढ़ावा देना है।
  • वर्ष 2015-16 से लागू इस योजना के अंतर्गत लगभग 109 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को आच्छादित किया गया है तथा ₹26,325 करोड़ की केंद्रीय सहायता जारी की गई है, जिससे जल उपयोग दक्षता में उल्लेखनीय सुधार हुआ है।
  • इसके अतिरिक्त, सरकार ने वर्ष 2025-26 से 2029-30 की पाँच वर्षीय अवधि में 100 लाख हेक्टेयर क्षेत्र को सूक्ष्म सिंचाई के अंतर्गत लाने का लक्ष्य निर्धारित किया है।

• मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन (Soil Health Management – SHM)

  • SHM, स्थान-विशिष्ट एवं फसल-विशिष्ट सतत मृदा प्रबंधन पद्धतियों को प्रोत्साहित करता है, जिनमें अवशेष प्रबंधन, जैविक खेती, स्थूल एवं सूक्ष्म पोषक तत्वों का संतुलित उपयोग, मृदा उर्वरता मानचित्रण तथा मृदा अपरदन एवं भूमि क्षरण को कम करने के उपाय शामिल हैं।
  • SHM के अंतर्गत कार्यान्वित मृदा स्वास्थ्य कार्ड (SHC) योजना किसानों के लिए प्रमुख परामर्श उपकरण के रूप में कार्य करती है।
  • वित्त वर्ष 2025–26 के दौरान लगभग 97.53 लाख मृदा नमूने एकत्रित किए गए तथा 92.87 लाख नमूनों का परीक्षण किया गया, जबकि वर्ष 2015 में योजना के शुभारंभ से फरवरी 2026 तक कुल लगभग 25.79 करोड़ मृदा स्वास्थ्य कार्ड तैयार किए जा चुके हैं।

NMSA का महत्व 

• जलवायु-सहिष्णु कृषि को बढ़ावा: NMSA विविधीकृत कृषि प्रणालियों, संसाधन संरक्षण तथा सतत कृषि पद्धतियों के माध्यम से जलवायु परिवर्तन के प्रति अनुकूलन को समर्थन प्रदान करता है।

• जल एवं मृदा स्थिरता को सुदृढ़ करना: मिशन भूजल क्षरण एवं मृदा अवनयन जैसी समस्याओं से निपटने हेतु कुशल सिंचाई, मृदा स्वास्थ्य प्रबंधन तथा पोषक तत्वों के संतुलित उपयोग को प्रोत्साहित करता है।

• वर्षा आधारित कृषि को समर्थन: वर्षा आधारित एवं संवेदनशील क्षेत्रों पर विशेष ध्यान देकर NMSA जलवायु जोखिमों से अत्यधिक प्रभावित क्षेत्रों में उत्पादकता एवं आजीविका सुरक्षा में सुधार करता है।

• निवेश लागत एवं पर्यावरणीय दबाव में कमी: जैविक इनपुट, एकीकृत कृषि तथा संसाधन-कुशल प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देकर रासायनिक-प्रधान कृषि पद्धतियों पर निर्भरता कम करने में सहायता मिलती है।

• किसानों की आय एवं आजीविका विविधीकरण में सुधार: पशुपालन, मत्स्य पालन, बागवानी तथा कृषि वानिकी को सम्मिलित करने वाली एकीकृत कृषि प्रणालियाँ आय के अनेक स्रोत सृजित करती हैं तथा फसल विफलता के जोखिम को कम करती हैं।

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