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सामान्य अध्ययन-1: अठारहवीं शताब्दी के मध्य से लेकर वर्तमान समय तक का आधुनिक भारतीय इतिहास—प्रमुख घटनाएँ, व्यक्तित्व एवं मुद्दे।
संदर्भ: 23 अक्टूबर, 2026 को नई दिल्ली स्थित पार्लियामेंट कॉम्प्लेक्स के प्रेरणा स्थल पर कित्तूर रानी चेन्नम्मा की जयंती तथा वर्ष 1824 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के विरुद्ध उनकी विजय की 202वीं वर्षगाँठ मनाई गई।
कित्तूर रानी चेन्नम्मा के बारे में

- जन्म: उनका जन्म 23 अक्टूबर, 1778 क वर्तमान कर्नाटक के बेलगावी जिले के काकती गाँव में एक लिंगायत परिवार में हुआ था।
- प्रारंभिकजीवन: उन्होंने घुड़सवारी, तलवारबाजी और तीरंदाजी का प्रशिक्षण प्राप्त किया।
- 15 वर्ष की आयु में उनका विवाह कित्तूर के राजा मल्लसर्जा से हुआ।
- उत्तराधिकार संकट: वर्ष 1816 में उनके पति तथा वर्ष 1824 में उनके इकलौते पुत्र की मृत्यु के बाद, उन्होंने शिवलिंगप्पा को राजगद्दी का उत्तराधिकारी घोषित करते हुए गोद लिया।
- विद्रोह का कारण: ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने शिवलिंगप्पा के उत्तराधिकार को मान्यता देने से इनकार कर दिया।
- बॉम्बे के गवर्नर से चेन्नम्मा की अपील अस्वीकार कर दी गई, जिसके बाद उन्होंने ब्रिटिश हस्तक्षेप का विरोध किया।
- व्यपगत का सिद्धांत (Doctrine of Lapse): उनका विद्रोह लॉर्ड डलहौजी (1848–1856) के शासनकाल में व्यपगत के सिद्धांत के औपचारिक कार्यान्वयन से पहले हुआ था।
- कित्तूर का प्रथम युद्ध (23 अक्टूबर, 1824): चेन्नम्मा की सेना ने अंग्रेजों को पराजित किया तथा ब्रिटिश अधिकारी सेंट जॉन ठाकरे की मृत्यु हो गई। इस युद्ध में अमातुर बालप्पा ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।
- बंधकों की रिहाई: उनकी सेना ने दो ब्रिटिश अधिकारियों—वाल्टर इलियट और स्टीवेन्सन—को बंदी बना लिया। अंग्रेजों द्वारा शत्रुता समाप्त करने का आश्वासन दिए जाने के बाद उन्होंने दोनों को रिहा कर दिया, लेकिन बाद में अंग्रेजों ने फिर से संघर्ष शुरू कर दिया।
- पराजय और मृत्यु: दिसंबर 1824 में अंग्रेजों के अधिक शक्तिशाली हमले के बाद चेन्नम्मा को बंदी बना लिया गया और बैलहोंगल किले में कैद कर दिया गया, जहाँ 21 फरवरी, 1829 को उनकी मृत्यु हो गई।
कित्तूर रानी चेन्नम्मा की विरासत
- प्रारंभिक औपनिवेशिक-विरोधी प्रतिरोध: वे 1857 के विद्रोह से कई दशक पहले ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के विरुद्ध सशस्त्र विद्रोह का नेतृत्व करने वाले शुरुआती भारतीय शासकों में से एक थीं।
- महिला सशक्तिकरण: वे साहस, महिला नेतृत्व और अन्याय के विरुद्ध प्रतिरोध की एक स्थायी प्रतीक हैं।
- सांस्कृतिक विरासत: उन्हें कन्नड़ लोकगीतों, लावणी प्रस्तुतियों और लोककथाओं के माध्यम से याद किया जाता है। उनके सहयोगियों में संगोली रायन्ना और गुरु सिद्धप्पा भी शामिल थे।
- कित्तूर उत्सव: यह प्रत्येक वर्ष अक्टूबर में आयोजित होने वाला उत्सव है, जो उनकी विजय और कर्नाटक की ऐतिहासिक विरासत की स्मृति में मनाया जाता है।
- राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान: संसद परिसर में उनकी प्रतिमा का अनावरण 11 सितंबर, 2007 को भारत की पूर्व राष्ट्रपति प्रतिभा देवीसिंह पाटिल द्वारा किया गया था।
- परिवहन क्षेत्र में सम्मान: भारतीय रेलवे ने उनके नाम पर रानी चेन्नम्मा एक्सप्रेस का नामकरण किया।
