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सामान्य अध्ययन -2: भारत से संबंधित और/अथवा भारत के हितों को प्रभावित करने वाले द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक समूह तथा करार।

संदर्भ:  भारत और जापान ने पेरिस समझौते के अनुच्छेद 6.2 के तहत संयुक्त क्रेडिटिंग तंत्र (JCM) के कार्यान्वयन नियमों को अंगीकृत किया है। यह ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में कमी, कार्बन क्रेडिट सृजन और सतत विकास पर द्विपक्षीय सहयोग के लिए एक परिचालन ढांचा स्थापित करता है।

संयुक्त क्रेडिटिंग तंत्र के कार्यान्वयन नियमों (JCM) के बारे में

  • संयुक्त क्रेडिटिंग तंत्र (JCM) एक परियोजना-आधारित द्विपक्षीय कार्बन क्रेडिटिंग तंत्र है, जिसे जापान द्वारा 2013 में शुरू किया गया था।
  • इसका उद्देश्य कम कार्बन वाली प्रौद्योगिकियों, उत्पादों, प्रणालियों, अवसंरचना और शमन कार्यों को बढ़ावा देना है, जो ग्रीनहाउस गैस (GHG) उत्सर्जन को कम करते हैं या हटाते हैं।
  • भारत और जापान ने JCM को स्थापित करने के लिए 7 अगस्त 2025 को सहयोग ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए।
  • उद्देश्य:
    • भारत में उन्नत कम-कार्बन प्रौद्योगिकियों के प्रसार को बढ़ावा देना।
    • ग्रीनहाउस गैस (GHG) उत्सर्जन में मापनीय कमी या उसे हटाने के लक्ष्य को प्राप्त करना।
    • भारत में सतत विकास का समर्थन करना।
    • भारत और जापान दोनों के ‘राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान’ (NDCs) की उपलब्धि में योगदान देना।

पेरिस समझौते के अनुच्छेद 6.2 के बारे में

  • पेरिस समझौते को 2015 में COP-21 में अपनाया गया था।
  • इसका उद्देश्य है:
    • वैश्विक तापमान वृद्धि को पूर्व-औद्योगिक स्तर से 2°C से काफी नीचे तक सीमित रखना।
    • तापमान वृद्धि को 1.5°C तक सीमित रखने के प्रयासों को जारी रखना।
  • देश इन लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए अपने ‘राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान’ (NDCs) प्रस्तुत और कार्यान्वित करते हैं।
  • अनुच्छेद 6 जलवायु कार्रवाई में अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के लिए एक ढांचा प्रदान करता है, जिसमें कार्बन बाजार और गैर-बाजार दृष्टिकोण शामिल हैं।
  • इसमें शामिल हैं:
    • अनुच्छेद 6.2 – सहकारी दृष्टिकोण
    • अनुच्छेद 6.4 – शमन और सतत विकास के लिए तंत्र
    • अनुच्छेद 6.8 – गैर-बाजार दृष्टिकोण
  • अनुच्छेद 6.2: सहकारी दृष्टिकोण
    • देशों को अपने जलवायु लक्ष्यों (NDCs) को पूरा करने के लिए एक-दूसरे के साथ स्वेच्छा से सहयोग करने का अवसर प्रदान करने में सक्षम बनाता है।
    • ‘अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर हस्तांतरित शमन परिणामों’ (Internationally Transferred Mitigation Outcomes – ITMOs) के हस्तांतरण की अनुमति देता है। इन्हें आमतौर पर अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर मान्यता प्राप्त कार्बन क्रेडिट कहा जाता है।
    • यह तंत्र भाग लेने वाले देशों द्वारा तैयार की गई द्विपक्षीय या बहुपक्षीय व्यवस्थाओं के माध्यम से कार्य करता है।
    • इसे एक विकेंद्रीकृत ढांचा माना जाता है, जहाँ प्रशासन का कार्य मुख्य रूप से UNFCCC के बजाय स्वयं भाग लेने वाले देशों द्वारा किया जाता है।
    • उत्सर्जन कटौती की दोहरी गणना की रोकथाम के लिए, यह तंत्र मजबूत लेखांकन प्रणालियों, पूर्ण पारदर्शिता, पर्यावरणीय अखंडता और ‘संबंधित समायोजन’ की अनिवार्यता सुनिश्चित करता है।

महत्व

  • जलवायु कार्रवाई और NDC उपलब्धि: यह पेरिस समझौते के तहत भारत और जापान को अपने संबंधित ‘राष्ट्रीय स्तर पर निर्धारित योगदान’ (NDC) लक्ष्यों को पूरा करने के लिए सहयोग को मजबूत करता है। साथ ही, यह सत्यापन योग्य उत्सर्जन कटौती प्राप्त करने के लिए एक संरचित तंत्र प्रदान करता है।
  • कम-कार्बन प्रौद्योगिकियों में निवेश: यह नवीकरणीय ऊर्जा, ऊर्जा दक्षता, औद्योगिक डीकार्बोनाइजेशन, स्वच्छ अवसंरचना और उन्नत जलवायु प्रौद्योगिकियों में निवेश को प्रोत्साहित करता है।
  • प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और क्षमता निर्माण: यह जापान की उन्नत कम-कार्बन प्रौद्योगिकियों और विशेषज्ञता के हस्तांतरण को सुगम बनाता है, साथ ही भारत में तकनीकी क्षमताओं और संस्थागत क्षमता को बढ़ाता है।
  • कार्बन बाजार का विकास: यह भारत को अनुच्छेद 6 के तहत उभरते अंतर्राष्ट्रीय कार्बन बाजार तंत्रों के साथ एकीकृत करता है और उच्च गुणवत्ता वाले कार्बन क्रेडिट उत्पन्न करने व उनके हस्तांतरण के अवसरों का सृजन करता है।
  • सतत विकास के लाभ: यह जलवायु शमन के साथ-साथ सतत विकास परिणामों को बढ़ावा देते हुए उत्सर्जन में कमी लाने और आर्थिक विकास का समर्थन करता है।
  • पर्यावरणीय अखंडता: यह कार्बन क्रेडिट की विश्वसनीयता और पारदर्शिता सुनिश्चित करने के लिए मजबूत ‘निगरानी, प्रतिवेदन एवं सत्यापन’ (MRV) प्रणालियों, तृतीय-पक्ष सत्यापन और ‘संबंधित समायोजनों’  को स्थापित करता है।
  • अनुच्छेद 6.2 के मॉडल के रूप में महत्व: JCM को अनुच्छेद 6.2 के तहत द्विपक्षीय सहकारी दृष्टिकोण के सबसे उन्नत उदाहरणों में से एक माना जाता है। यह भविष्य में अंतर्राष्ट्रीय कार्बन बाजार सहयोग के लिए एक व्यावहारिक मॉडल के रूप में कार्य करता है।
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