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सामान्य अध्ययन-2: द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक समूह तथा भारत से संबंधित और/अथवा भारत के हितों को प्रभावित करने वाले करार।
संदर्भ: हाल ही में भारत ने वर्ष 2026 के लिए ब्रिक्स (BRICS) के अध्यक्ष के रूप में, 14-15 मई 2026 को नई दिल्ली में ‘ब्रिक्स विदेश मंत्रियों के शिखर सम्मेलन’ की मेजबानी की।
अन्य संबंधित जानकारी
- यह बैठक “लचीलेपन, नवाचार, सहयोग और संधारणीयता/सतत विकास के लिए निर्माण” विषय के अंतर्गत आयोजित की गई थी।
- बैठक के दौरान वैश्विक और क्षेत्रीय घटनाक्रमों, बहुपक्षीय संस्थानों में सुधार, आर्थिक सहयोग तथा ‘BRICS@20’ की प्राथमिकताओं पर व्यापक चर्चा की गई।
- पिछली बैठकों के विपरीत, यह शिखर सम्मेलन सदस्य देशों के बीच पश्चिम एशिया संघर्ष विशेष रूप से ईरान और संयुक्त अरब अमीरात यानी UAE से जुड़े तनाव पर मतभेदों के कारण एक संयुक्त मंत्री-स्तरीय विज्ञप्ति के बिना ही समाप्त हो गया। इसके स्थान पर भारत ने एक “अध्यक्ष का वक्तव्य और निष्कर्ष दस्तावेज़” जारी किया।
- भारत 1 जनवरी 2026 से ब्रिक्स (BRICS) का वर्तमान अध्यक्ष है और वर्ष 2026 की उत्तरार्ध अवधि में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा।
- भारत वर्ष 2026 में चौथी बार ब्रिक्स की अध्यक्षता करेगा। इससे पहले भारत ने वर्ष 2012, 2016 और 2021 में इसकी अध्यक्षता की थी।
शिखर सम्मेलन के मुख्य परिणाम
- वैश्विक शासन में सुधार
- ब्रिक्स (BRICS) देशों के विदेश मंत्रियों ने वैश्विक शासन संस्थानों को अधिक प्रतिनिधिमूलक, लोकतांत्रिक तथा समकालीन भू-राजनीतिक वास्तविकताओं के प्रति संवेदनशील/उत्तरदायी बनाने के लिए उनमें व्यापक सुधार की आवश्यकता पर बल दिया।
- भारत ने संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद (UNSC) में सुधारों और विकासशील देशों, विशेष रूप से एशिया, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका के देशों के लिए अधिक प्रतिनिधित्व की वकालत की।
- BRICS@20 प्राथमिकताओं पर ध्यान केंद्रित करना: भारत के ‘BRICS@20’ एजेंडे के अंतर्गत चर्चाएं की गईं, जो मुख्य रूप से लचीलेपन, नवाचार, संधारणीयता/सतत विकास, आर्थिक सहयोग तथा वैश्विक दक्षिण के स्वर को सुदृढ़ करने पर केंद्रित थीं।
- पश्चिम एशिया संघर्ष और आंतरिक मतभेद
- इस शिखर सम्मेलन में जारी पश्चिम एशिया संघर्ष को लेकर व्यापक मतभेद देखे गए, विशेष रूप से ईरान और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के दृष्टिकोण के संबंध में, जिसने सर्वसम्मति से एक संयुक्त वक्तव्य को अपनाने की राह में बाधा उत्पन्न की।
- जहाँ एक ओर सदस्य देशों ने व्यापक रूप से संप्रभुता के सम्मान, नागरिकों की सुरक्षा और क्षेत्रीय स्थिरता का समर्थन किया, वहीं दूसरी ओर ईरान, इज़राइल, लाल सागर की सुरक्षा तथा बाहरी शक्तियों की भूमिका के संदर्भ में उनके बीच असहमति रही।
- आतंकवाद-रोधी और सुरक्षा सहयोग: मंत्रियों ने सभी रूपों में आतंकवाद के प्रति अपने सख्त विरोध को दोहराया तथा आतंकवाद, उग्रवाद और पार-राष्ट्रीय संगठित अपराध के खिलाफ उन्नत/संवर्धित अंतर्राष्ट्रीय सहयोग का आह्वान किया।
ब्रिक्स के बारे में
- “BRIC ” शब्द का प्रयोग पहली बार वर्ष 2001 में गोल्डमैन सैक्स के अर्थशास्त्री जिम ओ’नील द्वारा किया गया था, जिसमें उन्होंने G7 अर्थव्यवस्थाओं के प्रभुत्व को चुनौती देने के लिए ब्राजील, रूस, भारत और चीन की विकास क्षमता पर प्रकाश डाला था।
- पहला आधिकारिक BRIC (ब्राजील, रूस, भारत और चीन) शिखर सम्मेलन वर्ष 2009 में रूस के येकातेरिनबर्ग में आयोजित किया गया था। इसके पश्चात वर्ष 2010 में दक्षिण अफ्रीका इसमें शामिल हुआ (जिससे यह ‘BRICS’ बन गया)।
- वर्तमान में, इस समूह में 11 देश शामिल हैं: ब्राजील, चीन, मिस्र, इथियोपिया, भारत, इंडोनेशिया, ईरान, रूस, सऊदी अरब, दक्षिण अफ्रीका और संयुक्त अरब अमीरात।
- ब्रिक्स का पहला बड़ा विस्तार वर्ष 2024 में हुआ, जब मिस्र, इथियोपिया, ईरान, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) इसके सदस्य देश बने। इसके बाद, वर्ष 2025 में इंडोनेशिया भी ब्रिक्स में शामिल हो गया।
- वर्ष 2023 में अर्जेंटीना को भी ब्रिक्स में शामिल होने के लिए आमंत्रित किया गया था, किंतु बाद में अर्जेंटीना ने इस आमंत्रण को अस्वीकार कर दिया, जबकि सऊदी अरब द्वारा अपनी सदस्यता को औपचारिक रूप से अनुमोदित किया जाना अभी शेष है।
- ब्रिक्स देश लगभग 3.6 बिलियन (अरब) की संयुक्त जनसंख्या का प्रतिनिधित्व करते हैं, जो कि विश्व की कुल जनसंख्या का लगभग 48% है।
- क्रय शक्ति समता (PPP) के संदर्भ में, वैश्विक सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में इसकी हिस्सेदारी लगभग 40% है।
- यह ब्लॉक सर्वसम्मति-आधारित निर्णय लेने की प्रक्रिया पर निर्भर करता है। यह मुख्य रूप से एक अनौपचारिक समूह है, जिसका कोई निश्चित चार्टर या स्थायी सचिवालय नहीं है।
- वर्ष 2014 में इसका मुख्यालय शंघाई में स्थापित किया गया और ‘न्यू डेवलपमेंट बैंक’ (NDB), ब्रिक्स देशों तथा अन्य विकासशील अर्थव्यवस्थाओं में बुनियादी ढांचे और सतत विकास परियोजनाओं के लिए वित्तीय सहायता प्रदान करता है।
- ब्रिक्स ‘आकस्मिक आरक्षित व्यवस्था’ (CRA) एक वित्तीय सुरक्षा जाल है, जो भुगतान संतुलन के संकट का सामना कर रहे सदस्य देशों को तरलता (नकदी) सहायता प्रदान करता है।
ब्रिक्स के समक्ष चुनौतियाँ
- भू-राजनीतिक मतभेद: पश्चिम एशिया और यूक्रेन जैसे संघर्षों पर सदस्य देशों के बीच के मतभेद आम सहमति बनाने और सामूहिक कूटनीतिक दृष्टिकोण को लगातार बाधित कर रहे हैं।
- सामंजस्य के साथ विस्तार का संतुलन: ब्रिक्स के तीव्र विस्तार ने इसके वैश्विक प्रभाव को तो बढ़ाया है, लेकिन विविध राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक हितों के कारण इसने आंतरिक समन्वय को अधिक जटिल बना दिया है।
- ब्रिक्स के भीतर आर्थिक विषमता: समूह के भीतर चीन की प्रमुख/वर्चस्वशाली आर्थिक स्थिति सदस्य देशों के बीच निर्णय लेने की प्रक्रिया और प्रभाव में असंतुलन को लेकर चिंताएँ उत्पन्न करती है।
- संस्थागत सीमाएँ: ब्रिक्स के पास एक स्थायी सचिवालय और कानूनी रूप से बाध्यकारी संस्थागत फ्रेमवर्क का अभाव है, जो इसकी क्रियान्वयन क्षमता और दीर्घकालिक नीति समन्वय को सीमित करता है।
