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सामान्य अध्ययन-3: भारतीय अर्थव्यवस्था और योजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास और रोजगार से संबंधित विषय।
संदर्भ: हाल ही में, सरकार ने थोक मूल्य सूचकांक (WPI) के आधार वर्ष को 2011-12 से संशोधित कर 2022-23 करके और एक नए उत्पादक मूल्य सूचकांक (PPI) की शुरुआत करके भारत के उत्पादक-स्तर के मुद्रास्फीति मापन ढाँचे में एक बड़े बदलाव की घोषणा की।
किए गए परिवर्तन के मुख्य बिंदु
- थोक मूल्य सूचकांक (WPI) के आधार वर्ष में संशोधन: भारतीय अर्थव्यवस्था की बदलती संरचना, वर्तमान उत्पादन प्रणालियों और उपभोग पैटर्न को बेहतर ढंग से दर्शाने के लिए थोक मूल्य सूचकांक (WPI) के आधार वर्ष को 2011-12 से संशोधित कर 2022-23 कर दिया गया है।
- उत्पादक मूल्य सूचकांक (PPI) की शुरुआत: वस्तुओं और सेवाओं दोनों में होने वाले मूल्य परिवर्तनों को शामिल करके उत्पादक-स्तर की मुद्रास्फीति का अधिक व्यापक रूप से मापन करने के लिए भारत एक नया उत्पादक मूल्य सूचकांक (PPI) ढाँचा पेश करेगा।
- चरणबद्ध संक्रमण: मौजूदा WPI श्रृंखला और नया PPI ढाँचा लगभग पांच वर्षों की संक्रमण अवधि के लिए समवर्ती रूप से (साथ-साथ) चलेंगे, जिससे व्यवसायों, नीति-निर्माताओं और सांख्यिकीय एजेंसियों को PPI-आधारित आकलनों और अनुबंधों की ओर धीरे-धीरे स्थानांतरित होने में मदद मिलेगी।
- जारी करने की समयसीमा: संशोधित WPI श्रृंखला और नव विकसित PPI ढाँचा दोनों को 15 जून 2026 को जारी किया जाना निर्धारित है।
नई WPI श्रृंखला के मुख्य बिंदु
- विस्तारित और अद्यतन वस्तु टोकरी: थोक मूल्य सूचकांक (WPI) के तहत शामिल वस्तुओं की कुल संख्या 697 से बढ़ाकर 957 कर दी गई है, जिससे सूचकांक की प्रतिनिधित्वशीलता में सुधार हुआ है और अर्थव्यवस्था में समकालीन उत्पादन पैटर्नों को बेहतर ढंग से शामिल किया जा सका है।
- ऊर्जा क्षेत्र के कवरेज में सुधार: संशोधित श्रृंखला के अंतर्गत ‘विद्युत’ समूह में सौर, पवन और परमाणु ऊर्जा को शामिल किया गया है, जबकि कच्चे पेट्रोलियम और प्राकृतिक गैस को ‘प्राथमिक वस्तुएं’ समूह से हटाकर ‘ईंधन और बिजली’ समूह में स्थानांतरित कर दिया गया है। इससे ऊर्जा की कीमतों की निगरानी के लिए अधिक सुसंगत ढाँचा तैयार हुआ है।
- उत्पादक-उन्मुख भारांश संरचना: नई श्रृंखला में वस्तुओं का भारांश निर्धारित करने के लिए पुरानी ‘नेट ट्रेडेड वैल्यू’ (Net Traded Value) पद्धति के स्थान पर ‘सकल उत्पादन मूल्य’ [Gross Value of Output (GVO)] का उपयोग किया गया है, जो उत्पादक के दृष्टिकोण से वस्तुओं के आर्थिक महत्व को बेहतर ढंग से दर्शाता है।
- आधुनिक संकलन कार्यप्रणाली: संशोधित WPI में एक ‘श्रृंखला-आधारित अल्पकालिक सूचकांक सूत्र’ अपनाया गया है और अनुपलब्ध मूल्य डेटा को संभालने के लिए ‘लक्षित माध्य आरोपण’ (Targeted Mean Imputation) पद्धति की शुरुआत की गई है, जो मुद्रास्फीति मापन की सटीकता, विश्वसनीयता और प्रतिक्रियाशीलता को बढ़ाती है।
नए PPI ढाँचे की मुख्य विशेषताएँ
- व्यापक उत्पादक मूल्य मापन: थोक मूल्य सूचकांक के विपरीत, नया उत्पादक मूल्य सूचकांक (PPI) ढाँचा वस्तुओं और सेवाओं दोनों में होने वाले मूल्य परिवर्तनों को शामिल करेगा, जिससे अर्थव्यवस्था में उत्पादक-स्तर की मुद्रास्फीति का समग्र मापन सुनिश्चित होगा।
- बहु-आयामी संरचना: इस ढाँचे के अंतर्गत आउटपुट पीपीआई, इनपुट पीपीआई और सर्विसेज पीपीआई शामिल होंगे, जिससे उत्पादकों द्वारा प्राप्त कीमतों, इनपुट लागत के दबावों और सेवा-क्षेत्र की मुद्रास्फीति की अलग-अलग निगरानी की जा सकेगी।
- सेवा क्षेत्र का एकीकरण: भारतीय अर्थव्यवस्था में सेवाओं के बढ़ते महत्व को स्वीकार करते हुए, प्रारंभिक सर्विसेज पीपीआई के तहत सात सेवाओं को शामिल किया जाएगा, जो इस प्रकार हैं: बैंकिंग, प्रतिभूति लेनदेन, बीमा, पेंशन फंड का प्रबंधन, रेलवे, हवाई यात्रा – यात्री और दूरसंचार।
- उत्पादन के विभिन्न चरणों में मुद्रास्फीति की बेहतर ट्रैकिंग: इनपुट लागत और आउटपुट कीमतों दोनों को एक साथ दर्ज करके, यह नया ढाँचा अर्थव्यवस्था के भीतर लागत निर्माण और मुद्रास्फीति के संचरण का बेहतर आकलन करने में मदद करेगा।
- · चरणबद्ध और अंतर्राष्ट्रीय मानकों के अनुरूप कार्यान्वयन: सर्विसेज पीपीआई (Services PPI) को शुरू में त्रैमासिक आधार पर जारी किया जाएगा। इस संपूर्ण ढाँचे को अंतर्राष्ट्रीय स्तर पर स्वीकृत उत्पादक-मूल्य मापन पद्धतियों के अनुरूप तैयार किया गया है।
Why is India Shifting from WPI to PPI?
- वैश्विक सर्वोत्तम प्रथाओं के साथ संरेखण: अधिकांश उन्नत और उभरती अर्थव्यवस्थाएँ उत्पादक-स्तर की मुद्रास्फीति के प्राथमिक संकेतक के रूप में थोक मूल्य सूचकांक (WPI) के बजाय उत्पादक मूल्य सूचकांक (PPI) का उपयोग करती हैं, जिससे यह संक्रमण एक महत्वपूर्ण सांख्यिकीय सुधार बन जाता है।
- भारत की आर्थिक संरचना का बेहतर प्रतिबिंब: चूंकि भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में सेवा क्षेत्र का एक बड़ा हिस्सा है, इसलिए केवल वस्तुओं को शामिल करने वाला सूचकांक संपूर्ण अर्थव्यवस्था के उत्पादक-मूल्य परिवर्तनों को मापने के लिए अब पर्याप्त नहीं है।
- अधिक व्यापक मुद्रास्फीति मापन: इनपुट लागतों, आउटपुट कीमतों और सेवा कीमतों की निगरानी करके, पीपीआई (PPI) उत्पादन श्रृंखला में मुद्रास्फीति के दबावों की अधिक संपूर्ण तस्वीर प्रदान करता है।
- मुद्रास्फीति संचरण का बेहतर विश्लेषण: पीपीआई (PPI) उपभोक्ताओं तक लागत पहुँचने से पहले ही लागत के दबावों की पहचान करने में मदद कर सकता है, जिससे अर्थव्यवस्था के भीतर मुद्रास्फीति के संचरण को बेहतर ढंग से समझा जा सकता है।
सुधार का महत्व
- भारत के सांख्यिकीय ढाँचे का आधुनिकीकरण: पीपीआई (PPI) की शुरुआत और डब्ल्यूपीआई (WPI) का संशोधन पिछले एक दशक से भी अधिक समय में भारत के मुद्रास्फीति मापन ढाँचे में सबसे महत्वपूर्ण सुधारों में से एक है, जो आर्थिक सांख्यिकी को समकालीन वास्तविकताओं के अनुरूप बनाता है।
- बेहतर आर्थिक और नीतिगत निर्णय लेना: एक अधिक व्यापक उत्पादक-मूल्य मापन से मुद्रास्फीति का पूर्वानुमान लगाने, व्यवसायों के मूल्य निर्धारण निर्णयों और साक्ष्य-आधारित मौद्रिक, राजकोषीय एवं औद्योगिक नीति-निर्माण में सुधार होगा।
- राष्ट्रीय आय के अनुमान में सुधार: समय के साथ, सांकेतिक मूल्यों को वास्तविक मूल्यों में बदलने के लिए पीपीआई (PPI) डेटा का अधिक प्रभावी ढंग से उपयोग किया जा सकता है, जिससे जीडीपी (GDP) अनुमान और क्षेत्रवार विकास दर के मापन में सुधार होगा।
- क्षेत्र-विशिष्ट विश्लेषण को बढ़ावा देना: इनपुट, आउटपुट और सेवाओं के लिए अलग-अलग सूचकांक होने से नीति-निर्माताओं और व्यवसायों को क्षेत्रवार लागत गतिशीलता और उभरते मुद्रास्फीति के रुझानों की गहरी समझ प्राप्त होगी।
