संबंधित पाठ्यक्रम
सामान्य अध्ययन-1: शहरीकरण, उनकी समस्याएँ और उनके रक्षोपाय।
सामान्य अध्ययन -2: शासन के महत्वपूर्ण पक्ष; सरकारी नीतियों और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए हस्तक्षेप और उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन के कारण उत्पन्न विषय।
संदर्भ: हाल ही में नीति आयोग ने “प्रभावी नगर सरकार की ओर अग्रसर – दस लाख से अधिक आबादी वाले शहरों के लिए रुपरेखा” (Moving Towards Effective City Government – A Framework for Million-Plus Cities) शीर्षक से एक विस्तृत रिपोर्ट जारी की है, जो भारत के सबसे बड़े शहरों में शहरी शासन सुधारों की तत्काल आवश्यकता पर प्रकाश डालती है।
अन्य संबंधित जानकारी
• यह रिपोर्ट अत्यंत महत्वपूर्ण है क्योंकि भारत 2047 तक ‘विकसित भारत’ के विजन को साकार करने और 30 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था बनने की ओर अग्रसर है, जिसमें शहरों द्वारा सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में लगभग 70% योगदान देने की अपेक्षा है।
• यह रिपोर्ट ‘दस लाख से अधिक आबादी वाले शहरों’ (Million-plus cities) पर केंद्रित है, जो आर्थिक गतिविधियों, नवाचार और रोजगार सृजन के केंद्रों के रूप में उभर रहे हैं, किंतु कमजोर शासन संरचनाओं के कारण बाधित हैं।
- भारत में दस लाख से अधिक आबादी वाले शहर वे शहरी क्षेत्र या शहरी समूह हैं, जिनकी जनसंख्या 10 लाख से अधिक है।
रिपोर्ट के पीछे तर्क
• भारत तीव्र शहरीकरण के दौर से गुजर रहा है, जहाँ 2036 तक शहरी आबादी 600 मिलियन से अधिक होने का अनुमान है। यह स्थिति बुनियादी ढाँचे और सेवा वितरण पर अत्यधिक दबाव डाल रही है।
• हालाँकि, शहरी शासन में अभी भी निम्नलिखित कारणों से बाधा उत्पन्न होती है:
- विखंडित संस्थागत संरचनाएँ, जहाँ कई एजेंसियाँ एक-दूसरे के कार्यों को ओवरलैप करती हैं।
- परा-राज्यीय एजेंसियों (Parastatal agencies) का प्रभुत्व (जैसे राज्य-नियंत्रित विकास प्राधिकरण – DDA, और जल/सीवरेज बोर्ड जैसी उपयोगिताएँ), जो अक्सर निर्वाचित नगर निकायों की अनदेखी करती हैं।
- शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) को सीमित कार्यात्मक, वित्तीय और प्रशासनिक शक्तियों का हस्तांतरण।
• ये चुनौतियाँ शहरों को कुशल सेवा प्रदाता और विकास के इंजन के रूप में कार्य करने से रोकती हैं, जिसके लिए प्रणालीगत सुधार आवश्यक हैं।
रिपोर्ट के मुख्य निष्कर्ष
• रिपोर्ट रेखांकित करती है कि भारतीय शहरों की विशेषता कमजोर और खंडित नेतृत्व है, जहाँ मेयरों के पास अक्सर सीमित कार्यकारी अधिकार होते हैं।
• नगर निगमों, परा-राज्यीय एजेंसियों (parastatal agencies) और राज्य विभागों के बीच शासन विखंडित है, जिससे भूमिकाओं का दोहराव और अक्षमता पैदा होती है।
• शहरी स्थानीय निकाय (ULBs) वित्तीय रूप से सीमित बने हुए हैं; उनके पास स्वयं के राजस्व स्रोत कम हैं और वे राज्य एवं केंद्र के हस्तांतरण पर अत्यधिक निर्भर हैं।
• शहरी नियोजन, डेटा सिस्टम और परियोजना निष्पादन में क्षमता की कमी है, जो जटिल शहरी चुनौतियों का जवाब देने की शहरों की क्षमता को सीमित करती है।
• परिणामस्वरूप, अपने आर्थिक महत्व के बावजूद, भारतीय शहर विकास के प्रभावी इंजन और सेवा वितरण के केंद्र के रूप में कार्य करने में असमर्थ हैं।
प्रमुख सिफारिशें
• सशक्त नगर सरकारें: रिपोर्ट नियोजन, सेवा वितरण और बुनियादी ढाँचे पर एकीकृत अधिकार के साथ स्पष्ट रूप से परिभाषित, सशक्त नगर सरकारों की स्थापना की सिफारिश करती है।
• प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित मेयर: यह निश्चित कार्यकाल और कार्यकारी शक्तियों वाले प्रत्यक्ष रूप से निर्वाचित मेयरों की वकालत करती है, जिससे शहर के स्तर पर सुदृढ़ नेतृत्व और जवाबदेही सुनिश्चित हो सके।
• परा-राज्यीय एजेंसियों का युक्तिकरण: रिपोर्ट विखंडन को कम करने और समन्वय में सुधार के लिए परा-राज्यीय एजेंसियों को नगर सरकारों के साथ एकीकृत या संरेखित करने का आह्वान करती है।
• शहरी स्थानीय निकायों (ULBs) का राजकोषीय सशक्तिकरण: उन्नत संपत्ति कर प्रणालियों, उपयोगकर्ता शुल्क और पूर्वानुमेय राजकोषीय हस्तांतरण के माध्यम से नगर निगम के वित्त को मजबूत करने पर बल दिया गया है।
• क्षमता निर्माण और व्यावसायीकरण: यह शासन के परिणामों में सुधार के लिए कुशल शहरी कैडर, तकनीकी विशेषज्ञता और संस्थागत सुदृढ़ीकरण की आवश्यकता पर प्रकाश डालती है।
• डेटा-संचालित शहरी शासन: कुशल निर्णय लेने के लिए डिजिटल प्लेटफॉर्म, रियल-टाइम डेटा सिस्टम और साक्ष्य-आधारित नियोजन को अपनाने को बढ़ावा देती है।
रिपोर्ट का महत्व
• आर्थिक चालक के रूप में शहरी विकास: भारत के 30 ट्रिलियन डॉलर की अर्थव्यवस्था की ओर संक्रमण के लिए प्रभावी नगर शासन अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि शहर उत्पादकता और निवेश के केंद्र होंगे।
• बेहतर सेवा वितरण: सुदृढ़ शासन व्यवस्था जल आपूर्ति, अपशिष्ट प्रबंधन, आवास और गतिशीलता जैसी शहरी सेवाओं के बेहतर प्रावधान को सुनिश्चित कर सकती है।
• लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण का सुदृढ़ीकरण: ये सिफारिशें 74वें संविधान संशोधन की मूल भावना को सुदृढ़ करती हैं, जो शहरी स्थानीय निकायों को वास्तविक शक्तियों के हस्तांतरण को बढ़ावा देती हैं।
• वैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता में वृद्धिवैश्विक प्रतिस्पर्धात्मकता में वृद्धि: सुशासित शहर निवेश, नवाचार और वैश्विक मूल्य श्रृंखलाओं को आकर्षित कर सकते हैं, जिससे वैश्विक अर्थव्यवस्था में भारत की स्थिति मजबूत होगी।
