संबंधित पाठ्यक्रम
सामान्य अध्ययन-2: भारतीय संविधान-ऐतिहासिक आधार, विकास, विशेषताएं, संशोधन, महत्वपूर्ण प्रावधान और बुनियादी संरचना; संसद और राज्य विधायिका- संरचना, कार्य, कार्य-संचालन, शक्तियां एवं विशेषाधिकार और इनसे उत्पन्न होने वाले विषय; विभिन्न संवैधानिक पदों पर नियुक्ति और विभिन्न संवैधानिक निकायों की शक्तियां, कार्य और उत्तरदायित्व।
संदर्भ: आम आदमी पार्टी (AAP) ने राज्यसभा के सभापति को एक याचिका प्रस्तुत की है, जिसमें दसवीं अनुसूची के अंतर्गत उन सात राज्यसभा सांसदों को अयोग्य घोषित करने की मांग की गई है, जो सत्ताधारी दल भाजपा में सम्मिलित हो गए हैं।
अन्य संबंधित जानकारी
- राज्यसभा में आम आदमी पार्टी के दस सांसदों में से सात ने त्यागपत्र दे दिया और भाजपा में विलय कर लिया, जिससे उच्च सदन में पार्टी की संख्या बल में महत्वपूर्ण परिवर्तन आया है।
- आम आदमी पार्टी का तर्क है कि यह कदम राजनीतिक दल का वास्तविक विलय नहीं है, बल्कि केवल विधायकों का दलबदल है, इसलिए इसे अयोग्यता के दायरे में लाया जाना चाहिए।
- इसके विपरीत, संबंधित सांसदों ने “विलय अपवाद” के अंतर्गत संरक्षण का दावा किया है, क्योंकि उनकी संख्या विधानमंडल दल के दो-तिहाई के बराबर है। यह स्थिति महत्वपूर्ण संवैधानिक प्रश्न उत्पन्न करती है।
दसवीं अनुसूची / दलबदल विरोधी कानून (ADL) के बारे में
- शुरुआत और उद्देश्य:
- दसवीं अनुसूची को राजनीतिक दलबदल की समस्या के समाधान हेतु 52वें संविधान संशोधन अधिनियम, 1985 द्वारा संविधान में जोड़ा गया था।
- इसका प्राथमिक उद्देश्य है:
- राजनीतिक स्थिरता सुनिश्चित करना।
- अवसरवादी दलबदल (“आया राम गया राम”) को रोकना।
- विधानमंडलों में दलीय अनुशासन बनाए रखना।
- अयोग्यता के आधार: किसी विधायक या सांसद को अयोग्य घोषित किया जा सकता है यदि वह –
- स्वेच्छा से राजनीतिक दल की सदस्यता छोड़ देता है (भले ही औपचारिक त्यागपत्र न दिया हो)।
- पूर्व अनुमति के बिना पार्टी व्हिप के विरुद्ध मतदान करता है या मतदान से अनुपस्थित रहता है।
- चुनाव के पश्चात किसी अन्य राजनीतिक दल में सम्मिलित हो जाता है।
- अपवाद: विलय क्लॉज़
- अयोग्यता तब लागू नहीं होती जब किसी विधानमंडल दल के कम से कम दो-तिहाई सदस्य किसी अन्य दल में विलय के लिए सहमत हो जाते हैं।
- यह प्रावधान 91वें संविधान संशोधन (2003) के बाद भी बरकरार रखा गया था, जिसने पूर्ववर्ती “विभाजन” संबंधी अपवाद को समाप्त कर दिया था।
- निर्णय लेने वाला प्राधिकारी:
- अयोग्यता संबंधी याचिकाओं पर निर्णय पीठासीन अधिकारी (अध्यक्ष/सभापति) द्वारा लिया जाता है।
- यह निर्णय न्यायिक पुनरावलोकन के अधीन है (जैसा कि उच्चतम न्यायालय द्वारा निर्धारित किया गया है)।
उच्चतम न्यायालय के महत्वपूर्ण निर्णय
- किहोतो होलोहन बनाम ज़ाचिल्लु (1992): उच्चतम न्यायालय ने दसवीं अनुसूची की संवैधानिक वैधता को बरकरार रखा, साथ ही दुर्भावना, विकृति और संवैधानिक सिद्धांतों के उल्लंघन जैसे सीमित आधारों पर पीठासीन अधिकारी के निर्णय की न्यायिक समीक्षा की अनुमति दी।
- रवि एस. नायक बनाम भारत संघ (1994): न्यायालय ने यह निर्धारित किया कि “स्वेच्छा से सदस्यता छोड़ना” औपचारिक त्यागपत्र के बिना भी आचरण से अनुमानित किया जा सकता है। न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि पीठासीन अधिकारी एक अर्ध-न्यायिक प्राधिकारी के रूप में कार्य करता है जो प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों से बाध्य है।
- राजेंद्र सिंह राणा बनाम स्वामी प्रसाद मौर्य (2007): न्यायालय ने स्पष्ट किया कि एक वैध विलय के लिए कम से कम दो-तिहाई सदस्यों का किसी अन्य दल में विलय के लिए सहमत होना आवश्यक है, और पीठासीन अधिकारी अयोग्यता याचिकाओं की अनदेखी नहीं कर सकता या मनमाने ढंग से निर्णयों में विलंब नहीं कर सकता।
- कीशम मेघचंद्र सिंह बनाम अध्यक्ष, मणिपुर विधानसभा (2020): न्यायालय ने इस बात पर बल दिया कि दलबदल विरोधी कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए अयोग्यता याचिकाओं पर निर्णय एक उचित समय के भीतर, आदर्श रूप से तीन महीने के भीतर लिया जाना चाहिए।
- पाडी कौशिक रेड्डी बनाम लोकसभा अध्यक्ष (2025): न्यायालय ने समयबद्ध और निष्पक्ष निर्णय प्रक्रिया की आवश्यकता को दोहराया और इस बात पर जोर दिया कि दलबदल के मामलों का न्यायनिर्णयन करते समय अध्यक्ष को एक तटस्थ संवैधानिक अधिकरण के रूप में कार्य करना चाहिए।
दल-बदल विरोधी कानून (ADL) की आलोचनाएं
- विधायी स्वतंत्रता को कम करना: दलबदल विरोधी कानून (ADL) विधायकों की स्वतंत्र निर्णय लेने की क्षमता को सीमित करता है, क्योंकि वे सामान्य विधायी मामलों में भी पार्टी व्हिप से बंधे होते हैं। इससे विमर्शी लोकतंत्र कमजोर होता है।
- आंतरिक दलीय लोकतंत्र का ह्रास: यह कानून व्हिप के माध्यम से कड़े दलीय अनुशासन को लागू करता है, जिससे असहमति के स्वर सीमित हो जाते हैं और निर्णय लेने की शक्ति पार्टी नेतृत्व के हाथों में केंद्रित हो जाती है।
- पीठासीन अधिकारी के पास अत्यधिक विवेकाधीन शक्तियाँ: अयोग्यता के मामलों पर निर्णय लेने की शक्ति अध्यक्ष या सभापति के पास होती है, जो प्रायः पक्षपातपूर्ण तरीके से कार्य करते हैं। इससे निष्पक्षता की कमी और पूर्वाग्रह संबंधी चिंताएं उत्पन्न होती हैं।
- विलय प्रावधान का दुरुपयोग: ‘दो-तिहाई विलय’ के अपवाद का उपयोग अक्सर बड़े पैमाने पर दलबदल को वैध बनाने के लिए किया जाता है, जिससे राजनीतिक अवसरवाद को रोकने का मूल उद्देश्य ही विफल हो जाता है।
- निर्णय लेने में विलंब: अयोग्यता याचिकाओं पर निर्णय लेने में अत्यधिक विलंब के कारण दलबदल करने वाले सदस्य अपने पद पर बने रहते हैं, जिससे इस कानून की प्रभावशीलता कम हो जाती है।
सिफारिशें
- दिनेश गोस्वामी समिति: इसने अनुशंसा की थी कि दलबदल विरोधी कानून को केवल अविश्वास प्रस्ताव और इसी तरह के महत्वपूर्ण मतों तक ही सीमित रखा जाना चाहिए, ताकि अन्य विषयों पर विधायी स्वतंत्रता बनी रहे।
- हलीम समिति: इस समिति ने स्पष्टता सुनिश्चित करने और असंगत व्याख्याओं को कम करने के लिए “स्वेच्छा से सदस्यता छोड़ना” वाक्यांश की एक स्पष्ट और सटीक परिभाषा प्रदान करने की सिफारिश की।
- निर्णय लेने की शक्ति स्वतंत्र प्राधिकरण को सौंपना: द्वितीय प्रशासनिक सुधार आयोग (2nd ARC) और संविधान के कामकाज की समीक्षा करने वाले राष्ट्रीय आयोग (NCRWC) दोनों ने यह अनुशंसा की कि अयोग्यता पर निर्णय अध्यक्ष या सभापति के बजाय चुनाव आयोग की सलाह पर राष्ट्रपति या राज्यपाल द्वारा लिया जाना चाहिए।
- एक स्वतंत्र अधिकरण (ट्रिब्यूनल) की स्थापना: रोहिंग्टन फली नरिमन की टिप्पणियों सहित न्यायिक राय बढ़ रही है कि दलबदल के मामलों के न्यायनिर्णयन के लिए एक स्वतंत्र अधिकरण का गठन किया जाना चाहिए, ताकि निष्पक्षता और विश्वसनीयता सुनिश्चित हो सके।
- समयबद्ध न्यायनिर्णयन: विभिन्न समितियों और न्यायिक निर्णयों ने अयोग्यता याचिकाओं के समयबद्ध निपटान की आवश्यकता पर बल दिया है (कीशम मेघचंद्र मामले में उच्चतम न्यायालय द्वारा तीन महीने की समय-सीमा का सुझाव दिया गया है) ताकि दलबदल विरोधी कानून की प्रभावशीलता बनी रहे।
- विलय प्रावधान में सुधार: कई विशेषज्ञों ने ‘दो-तिहाई विलय’ के प्रावधान पर पुनर्विचार करने की आवश्यकता पर बल दिया है, क्योंकि इसके दुरुपयोग ने सामूहिक दलबदल को सक्षम बनाया है, जिससे दलबदल विरोधी कानून का मूल उद्देश्य ही धूमिल हो गया है।
