संबंधित पाठ्यक्रम
सामान्य अध्ययन-3: प्रत्यक्ष एवं अप्रत्यक्ष कृषि सब्सिडी और न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) से संबंधित मुद्दे; सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS)—उद्देश्य, कार्यप्रणाली, सीमाएँ एवं सुधार; बफर स्टॉक और खाद्य सुरक्षा से संबंधित मुद्दे; प्रौद्योगिकी मिशन; पशुपालन का अर्थशास्त्र।
संदर्भ: दलहन में आत्मनिर्भरता मिशन ने 11 अक्टूबर 2026 को अपना एक वर्ष पूरा किया। यह घरेलू दलहन उत्पादन को मजबूत करने, आयात पर निर्भरता कम करने और किसानों की आय बढ़ाने के प्रयासों का एक वर्ष है।
दलहन में आत्मनिर्भरता मिशन की प्रमुख विशेषताएँ

- उत्पादन एवं उत्पादकता के लक्ष्य (2030–31 तक): दलहन उत्पादन को 242 लाख टन से बढ़ाकर 350 लाख टन, खेती का क्षेत्रफल 275 लाख हेक्टेयर से बढ़ाकर 310 लाख हेक्टेयर तथा औसत उत्पादकता 881 किग्रा/हेक्टेयर से बढ़ाकर 1,130 किग्रा/हेक्टेयर करना।
- बीज विकास एवं वितरण: छह वर्षों में 87.5 लाख निःशुल्क बीज किट और 126 लाख क्विंटल प्रमाणित बीज वितरित करना।
- जलवायु-अनुकूल बीजों को बढ़ावा देना, बीज की गुणवत्ता, उत्पादकता और प्रोटीन की मात्रा में सुधार करना तथा बीजों के प्रमाणीकरण और पता लगाने की क्षमता के लिए साथी (SATHI) पोर्टल का उपयोग करना।
- खेती का विस्तार: दलहन की खेती का विस्तार 35 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में करना, जिसके लिए धान की कटाई के बाद खाली रहने वाले खेतों तथा अन्य उपयुक्त भूमि को लक्षित करना।
- 489 जिलों को शामिल करने वाले क्लस्टरों के माध्यम से अंतरवर्ती खेती, फसल विविधीकरण और उन्नत कृषि पद्धतियों को बढ़ावा देना।
- सुनिश्चित खरीद एवं मूल्य समर्थन: वर्ष 2025–26 से 2028–29 तक चार वर्षों के लिए, इच्छुक एवं पंजीकृत किसानों द्वारा बिक्री हेतु प्रस्तुत तूर, उड़द और मसूर की 100% उपज की खरीद सुनिश्चित करना। यह खरीद भारतीय राष्ट्रीय कृषि सहकारी विपणन संघ (NAFED) और राष्ट्रीय सहकारी उपभोक्ता महासंघ (NCCF) के माध्यम से की जाएगी।
- प्रधानमंत्री अन्नदाता आय संरक्षण अभियान (PM-AASHA) की मूल्य समर्थन योजना (PSS) के अंतर्गत मूल्य समर्थन प्रदान करना।
- फसल कटाई के बाद का बुनियादी ढाँचा: 1,000 दलहन प्रसंस्करण इकाइयाँ (दाल मिलें) स्थापित करना। प्रसंस्करण एवं पैकेजिंग संबंधी बुनियादी ढाँचे के लिए प्रत्येक पात्र इकाई को ₹25 लाख तक की सहायता प्रदान करना।
- भंडारण में सुधार करना, फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम करना और मूल्य संवर्धन को बढ़ावा देना।
- डिजिटल निगरानी एवं कार्यान्वयन: राष्ट्रीय, राज्य और जिला स्तर पर त्रिस्तरीय संचालन समिति तंत्र का उपयोग करना। प्रदर्शनों के भू-टैगिंग, जियो-फेंसिंग और निगरानी के लिए कृषि मैपर (Krishi Mapper) का उपयोग करना।
- किसानों की पहचान और फसलों की निगरानी के लिए एग्रीस्टैक (AgriStack) तथा डिजिटल फसल सर्वेक्षण का उपयोग करना। खरीद संबंधी सेवाओं और कृषि संबंधी जानकारी के लिए ई-समृद्धि (e-Samriddhi) तथा विस्तार (Vistaar) का उपयोग करना।
मिशन की उपलब्धियाँ
- घरेलू उत्पादन में वृद्धि: दलहन का उत्पादन 2024–25 में 256.83 लाख टन से बढ़कर 2025–26 में 274.09 लाख टन हो गया।
- तीसरे अग्रिम अनुमानों के अनुसार, खेती का क्षेत्रफल 277.20 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 286.46 लाख हेक्टेयर हो गया तथा औसत उत्पादकता 926 किग्रा से बढ़कर 957 किग्रा प्रति हेक्टेयर हो गई।
- आयात व्यय में कमी: दलहन के आयात का मूल्य 2024–25 में ₹46,427.60 करोड़ से 31.52% घटकर 2025–26 में ₹31,793.59 करोड़ हो गया। वहीं, दलहन का निर्यात 13.40% बढ़कर 855 मिलियन अमेरिकी डॉलर से 969.53 मिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया।
- खरीद में प्रगति: 17 जून 2026 की राष्ट्रीय सहकारी उपभोक्ता महासंघ (NCCF) डैशबोर्ड की स्थिति के अनुसार, नौ राज्यों में 10.55 लाख टन दलहन की खरीद हुई। किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) के भुगतान के रूप में सीधे ₹7,047 करोड़ जारी किए गए तथा पंजीकृत 7.74 लाख किसानों में से 4.69 लाख किसानों को लाभ मिला।
- प्रसंस्करण बुनियादी ढाँचे का विस्तार: प्रस्तावित 1,000 प्रसंस्करण इकाइयों में से पहले चरण में राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को 528 इकाइयाँ आवंटित की गईं। वहीं, प्रधानमंत्री किसान संपदा योजना के संबंधित घटक के अंतर्गत स्वीकृत 23 दलहन प्रसंस्करण इकाइयों में से 18 पूरी हो चुकी हैं।
- बीज वितरण का विस्तार: रबी 2025–26 के दौरान दलहन की खेती को बढ़ावा देने के लिए कुल 9.25 लाख निःशुल्क बीज किट वितरित की गईं। इसमें धान की कटाई के बाद खाली रहने वाले खेतों में दलहन की खेती को बढ़ावा देना भी शामिल है।
- मूल्य समर्थन में सुधार: वर्ष 2026–27 के लिए न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) बढ़ाकर उड़द के लिए ₹8,200 प्रति क्विंटल, तूर के लिए ₹8,450 प्रति क्विंटल और मसूर के लिए ₹7,000 प्रति क्विंटल कर दिया गया। ये दरें संबंधित फसलों की 2024–25 की दरों की तुलना में अधिक हैं।
चुनौतियाँ एवं सुधार के क्षेत्र
- मांग और आपूर्ति के बीच लगातार अंतर: दलहन का विश्व का सबसे बड़ा उत्पादक होने के बावजूद, भारत घरेलू मांग को पूरा करने के लिए दलहन का आयात करता है। आत्मनिर्भरता प्राप्त करने के लिए उत्पादन में निरंतर वृद्धि आवश्यक है।
- कृषि उत्पादकता का निम्न स्तर: उत्पादकता अभी भी मिशन के 1,130 किग्रा प्रति हेक्टेयर के लक्ष्य से कम है। उपज में अंतर, उन्नत किस्मों को सीमित रूप से अपनाना और क्षेत्रीय भिन्नताएँ उत्पादन को सीमित करती हैं।
- जलवायु एवं बाजार संबंधी अनिश्चितताएँ: जलवायु में परिवर्तनशीलता, कीटों के हमले और कीमतों में उतार-चढ़ाव किसानों के उत्पादन, लाभप्रदता तथा दलहन की खेती का विस्तार करने की इच्छा को प्रभावित कर सकते हैं।
- बीज एवं मूल्य श्रृंखला संबंधी बाधाएँ: गुणवत्तापूर्ण बीजों की समय पर उपलब्धता, पर्याप्त भंडारण एवं प्रसंस्करण सुविधाएँ और बीज प्रणालियों में निजी क्षेत्र की अधिक भागीदारी निरंतर विकास के लिए महत्त्वपूर्ण हैं।
आगे की राह
- अनुसंधान एवं बीज प्रणालियों को मजबूत करना: अधिक उपज देने वाली, कम अवधि में पकने वाली और जलवायु-अनुकूल किस्मों का विकास करना तथा बीजों की उपलब्धता, प्रमाणीकरण, पता लगाने की क्षमता और क्षेत्र-विशिष्ट योजना में सुधार करना।
- सतत खेती का विस्तार: धान की कटाई के बाद खाली रहने वाले खेतों तथा वर्षा-आधारित क्षेत्रों में दलहन की खेती को बढ़ावा देना, अंतरवर्ती खेती एवं फसल विविधीकरण को प्रोत्साहित करना तथा भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR), कृषि विज्ञान केंद्रों और राज्य के कृषि विभागों के माध्यम से किसानों को प्रशिक्षित करना।
- बाजार एवं मूल्य की सुनिश्चितता में सुधार: समय पर खरीद और भुगतान सुनिश्चित करना, स्थानीय खरीद केंद्रों को बेहतर बनाना तथा किसानों की अनिश्चितता कम करने के लिए कीमतों की निगरानी में सुधार करना।
- एकीकृत मूल्य श्रृंखला का निर्माण: प्रसंस्करण, भंडारण और पैकेजिंग सुविधाओं का विस्तार करना, किसान उत्पादक संगठनों (FPOs) को मजबूत करना तथा मांग और पोषण सुरक्षा बढ़ाने के लिए सार्वजनिक वितरण प्रणाली और स्कूली भोजन में दलहन को शामिल करने की संभावनाओं का पता लगाना।
