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सामान्य अध्ययन-3: बुनियादी ढाँचा: ऊर्जा; संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण एवं क्षरण, पर्यावरण प्रभाव आकलन।

संदर्भ: केंद्रीय मंत्रिमंडल ने हाल ही में ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर चरण-III (GEC-III) को मंजूरी दी है, जिसका उद्देश्य नवीकरणीय ऊर्जा पारेषण अवसंरचना को सुदृढ़ करना, ग्रिड के लचीलेपन में सुधार करना तथा भारत की विद्युत प्रणाली में बड़े पैमाने पर स्वच्छ बिजली के एकीकरण को सुगम बनाना है।

अन्य संबंधित जानकारी

  • GEC-III: इस योजना का कुल परिव्यय ₹1,86,405 करोड़ है। इसका उद्देश्य अंतर-राज्यीय पारेषण को सुदृढ़ करना, 135 गीगावाट तक नवीकरणीय ऊर्जा के निकासी/पारेषण को सुगम बनाना तथा वित्त वर्ष 2032–33 तक 50 गीगावाट-घंटे (GWh) बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणालियों (BESS) का परिनियोजन करना है।
  • GEC चरण-I: इसे आठ राज्यों में लागू किया जा रहा है और इसके तहत 9,461 सर्किट किलोमीटर (ckm) पारेषण लाइनों का लक्ष्य रखा गया है। 30 जून 2026 तक 9,130 ckm का निर्माण किया जा चुका था। इसके मार्च 2027 तक पूरा होने की उम्मीद है।
  • GEC चरण-II: इसे सात राज्यों में लागू किया जा रहा है। इसके तहत 7,863 ckm पारेषण लाइनों और 24,388 MVA सबस्टेशन क्षमता का लक्ष्य रखा गया है। 30 जून 2026 तक 1,124 ckm लाइनों को चार्ज किया जा चुका था और 6,860 MVA सबस्टेशन क्षमता चालू की जा चुकी थी। परियोजनाओं के 2028 तक पूरा होने की उम्मीद है।

ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर और बैटरी भंडारण को समझना

  • ग्रीन एनर्जी कॉरिडोर (GEC): यह ऐसी पारेषण अवसंरचना है, जो नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन केंद्रों से बिजली को व्यापक विद्युत ग्रिड और उपभोग केंद्रों तक पहुँचाती है।
  • अंतर-राज्यीय पारेषण प्रणाली (InSTS): किसी राज्य के भीतर स्थित पारेषण नेटवर्क, जो विद्युत उत्पादन स्रोतों को व्यापक ग्रिड और मांग केंद्रों से जोड़ते हैं।
  • बैटरी ऊर्जा भंडारण प्रणालियाँ (BESS): ये अतिरिक्त बिजली को संग्रहित करती हैं और उत्पादन कम होने या मांग बढ़ने पर उसे उपलब्ध कराती हैं। इससे सौर एवं पवन ऊर्जा की परिवर्तनशीलता का प्रबंधन करने और ग्रिड के लचीलेपन में सुधार करने में सहायता मिलती है।
  • गीगावाट और गीगावाट-घंटा: गीगावाट विद्युत क्षमता को मापता है, जबकि GWh समय के साथ संग्रहित या आपूर्ति की जाने वाली ऊर्जा की मात्रा को मापता है। GEC-III के तहत 135 GW तक नवीकरणीय ऊर्जा की निकासी और 50 GWh बैटरी भंडारण के परिनियोजन का लक्ष्य रखा गया है।

योजना की प्रमुख विशेषताएँ

  • पारेषण अवसंरचना: ₹1,36,378 करोड़ अंतर-राज्यीय पारेषण प्रणाली (InSTS) के विकास के लिए आवंटित किए गए हैं, जिससे 135 GW तक नवीकरणीय ऊर्जा निकासी संभव होगी।
  • बैटरी भंडारण: 50 GWh BESS के परिनियोजन के लिए ₹50,000 करोड़ का प्रावधान किया गया है। इसे नवीकरणीय ऊर्जा डेवलपर/उत्पादक स्थलों या ग्रिड के लचीलेपन के लिए महत्वपूर्ण अन्य स्थानों पर स्थापित किया जाएगा।
  • केंद्रीय वित्तीय सहायता (CFS): ₹54,082 करोड़ की सहायता प्रदान की जाएगी, जिससे अंतर-राज्यीय पारेषण शुल्क के भार को कम करने और अंतिम उपभोक्ताओं के लिए बिजली की लागत को नियंत्रित करने में मदद मिलेगी।
  • कार्यान्वयन तंत्र: राज्य पारेषण उपयोगिताएँ समग्र कार्यान्वयन एजेंसियों के रूप में कार्य करेंगी। ग्रीनफील्ड परियोजनाओं के लिए टैरिफ-आधारित प्रतिस्पर्धी बोली (TBCB) अपनाई जाएगी, जबकि ब्राउनफील्ड उन्नयन एवं नेटवर्क सुदृढ़ीकरण के लिए कॉस्ट प्लस आधार (CPB) अपनाया जाएगा। TBCB के माध्यम से चयनित पारेषण सेवा प्रदाता निर्माण-स्वामित्व-संचालन-रखरखाव (BOOM) मॉडल का पालन करेंगे।
  • अपेक्षित परिणाम: ग्रिड में भीड़भाड़ और अधिकतम मांग वाले घंटों में नवीकरणीय ऊर्जा की कटौती में कमी, नवीकरणीय ऊर्जा का बेहतर एकीकरण तथा गैर-सौर घंटों के दौरान बिजली की बेहतर उपलब्धता सुनिश्चित होगी। यह योजना वर्ष 2035 तक 900 GW स्थापित गैर-जीवाश्म ईंधन क्षमता के भारत के लक्ष्य में भी योगदान देगी।

आवश्यकता एवं महत्व

  • पारेषण संबंधी बाधाओं का समाधान: लगभग 21 GW नवीकरणीय ऊर्जा क्षमता अस्थायी ग्रिड कनेक्शन पर निर्भर है, जबकि लगभग 12 GW क्षमता को अधिकतम सौर उत्पादन के दौरान निकासी संबंधी प्रतिबंधों का सामना करना पड़ता है। इससे डेवलपर्स के राजस्व और परियोजनाओं की व्यवहार्यता प्रभावित होती है।
  • नवीकरणीय ऊर्जा की कटौती में कमी: वित्त वर्ष 2025–26 में लगभग 6,900 GWh स्वच्छ बिजली पर प्रतिबंध लगाया गया। अलग से, पारेषण संबंधी बाधाओं और ग्रिड-सुरक्षा आवश्यकताओं के कारण अप्रैल–जून के दौरान 8,133 GWh सौर बिजली की कटौती की गई।
  • ग्रिड के लचीलेपन में सुधार: पारेषण का विस्तार बिजली की निकासी को सुगम बनाता है, जबकि BESS अतिरिक्त बिजली को संग्रहित करता है और उत्पादन कम होने या मांग बढ़ने की अवधि में उसका उपयोग संभव बनाता है।
  • ऊर्जा सुरक्षा एवं रोजगार: नवीकरणीय ऊर्जा का बेहतर उपयोग कार्बन उत्सर्जन में कमी को बढ़ावा देता है और जीवाश्म ईंधनों पर निर्भरता कम करता है। वहीं, पारेषण एवं ऊर्जा भंडारण में निवेश से विनिर्माण, निर्माण और ग्रिड प्रबंधन के क्षेत्रों में रोजगार के अवसरों का सृजन होता है।

कार्यान्वयन की चुनौतियाँ

  • भूमि अधिग्रहण और मार्गाधिकार (Right-of-Way): भूमि की व्यवस्था करना, मुआवजे से संबंधित विवादों का समाधान करना और वैधानिक मंजूरियाँ प्राप्त करना पारेषण परियोजनाओं में देरी का कारण बन सकता है।
  • कार्यान्वयन में देरी: GEC के पिछले चरणों में भी क्रियान्वयन संबंधी देरी देखी गई है। GEC-I के मार्च 2027 तक और GEC-II के 2028 तक पूरा होने की उम्मीद है, जो GEC-III के तहत समयबद्ध क्रियान्वयन और प्रभावी निगरानी के महत्व को रेखांकित करता है।
  • भंडारण की अर्थव्यवस्था और आपूर्ति श्रृंखला: बड़े पैमाने पर BESS के परिनियोजन के लिए व्यवहार्य वाणिज्यिक व्यवस्थाओं तथा बैटरियों, घटकों और महत्वपूर्ण खनिजों की विश्वसनीय उपलब्धता आवश्यक है।
  • समन्वय और उपयोग: पारेषण नियोजन का नवीकरणीय ऊर्जा परियोजनाओं, राज्य स्तरीय नेटवर्क और मांग केंद्रों के साथ समन्वय आवश्यक है। परियोजनाओं को समय पर लागू न किया जाना या ग्रिड संचालन में ऊर्जा भंडारण का अपर्याप्त एकीकरण योजना के लाभों को सीमित कर सकता है।

आगे की राह

  • एकीकृत नियोजन: नवीकरणीय ऊर्जा उत्पादन, अंतर-राज्यीय एवं अंतर-राज्यीय पारेषण, ऊर्जा भंडारण के परिनियोजन और मांग के अनुमानों के बीच समन्वय स्थापित किया जाना चाहिए।
  • त्वरित क्रियान्वयन: केंद्र–राज्य समन्वय में सुधार किया जाए तथा भूमि अधिग्रहण, मार्गाधिकार संबंधी प्रक्रियाओं और परियोजना अनुमोदनों को सुव्यवस्थित किया जाए।
  • ऊर्जा भंडारण इकोसिस्टम को सुदृढ़ करना: BESS के लिए व्यवहार्य खरीद एवं राजस्व तंत्र विकसित किए जाएँ तथा घरेलू बैटरी विनिर्माण, अनुसंधान और पुनर्चक्रण को बढ़ावा दिया जाए।
  • परिणाम-आधारित निगरानी: परियोजनाओं के चालू होने, निकाली गई नवीकरणीय बिजली, नवीकरणीय ऊर्जा की कटौती की प्रवृत्तियों और वास्तविक ऊर्जा भंडारण उपयोग की निगरानी की जाए, ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि निवेश से ग्रिड के प्रदर्शन में मापनीय सुधार हो।
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