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सामान्य अध्ययन-3: प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष कृषि सब्सिडी तथा न्यूनतम समर्थन मूल्य से संबंधित मुद्दे; कृषि उपज के विपणन तथा उससे संबंधित मुद्दे एवं बाधाएँ; किसानों की सहायता में ई-प्रौद्योगिकी।
संदर्भ: प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) ने सितंबर 2026 में अपने छह वर्ष पूरे कर लिए हैं। इस अवधि के दौरान मत्स्य क्षेत्र में उत्पादन, निर्यात, अवसंरचना, प्रौद्योगिकी अपनाने और आजीविका के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति हुई है।
प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना (PMMSY) के बारे में
• शुरुआत एवं परिव्यय: वर्ष 2020–21 में शुरू की गई PMMSY, मत्स्य पालन और जलीय कृषि के समग्र एवं सतत विकास के लिए प्रमुख योजना है, जिसका कुल परिव्यय ₹20,750 करोड़ है।

• उद्देश्य: मछली उत्पादन और उत्पादकता में वृद्धि करना, मछुआरों की आय और रोजगार में सुधार करना, कटाई के बाद के प्रबंधन और मूल्य शृंखलाओं को मजबूत करना, निर्यात को बढ़ावा देना तथा सतत मत्स्य प्रबंधन को प्रोत्साहित करना।
• दायरा: इसमें समुद्री और अंतर्देशीय मत्स्य पालन, जलीय कृषि, समुद्री कृषि, समुद्री शैवाल तथा सजावटी मत्स्य पालन के साथ-साथ मत्स्य अवसंरचना और कल्याण संबंधी हस्तक्षेप शामिल हैं।
• मूल्य-श्रृंखला दृष्टिकोण: यह योजना उत्पादन और प्रौद्योगिकी से लेकर मछली पकड़ने, परिवहन, शीत शृंखला, प्रसंस्करण, विपणन, गुणवत्ता और ट्रेसेबिलिटी (उत्पाद की उत्पत्ति एवं आपूर्ति-शृंखला का पता लगाने की क्षमता) तक पूरी श्रृंखला को कवर करती है।
• क्रियान्वयन: PMMSY में केंद्रीय क्षेत्रक और केंद्र प्रायोजित घटक शामिल हैं, जिन्हें राज्यों/केंद्रशासित प्रदेशों तथा अन्य एजेंसियों के माध्यम से लागू किया जाता है। इसमें मछुआरों, मत्स्य किसानों और मत्स्य क्षेत्र के उद्यमों के लिए लाभार्थी-केंद्रित हस्तक्षेप किए जाते हैं।
PMMSY के छह वर्ष: प्रमुख उपलब्धियाँ
• निवेश: अगस्त 2026 तक, वर्ष 2020–21 से 2025–26 के लिए मत्स्य पालन और जलीय कृषि से संबंधित ₹21,394.88 करोड़ की परियोजनाओं को मंजूरी दी गई थी, जिसमें ₹9,510.89 करोड़ की केंद्रीय हिस्सेदारी शामिल थी। PMMSY को इसके मौजूदा स्वरूप में सितंबर 2026 तक जारी रखा गया है, जिसके लिए BE 2026–27 में ₹2,500 करोड़ आवंटित किए गए हैं।
• उत्पादन एवं निर्यात: मछली उत्पादन 2019–20 में 141.64 लाख टन से बढ़कर 2024–25 में रिकॉर्ड 197.75 लाख टन हो गया, जबकि मत्स्य निर्यात ₹46,663 करोड़ से बढ़कर 2025–26 में ₹73,890 करोड़ हो गया।
• रोजगार: PMMSY ने मत्स्य पालन और जलीय कृषि से संबंधित गतिविधियों में लगभग 58 लाख व्यक्तियों के लिए प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसर सृजित किए हैं।
• अवसंरचना एवं बाजार: मत्स्य बंदरगाहों, मछली उतारने के केंद्रों और ड्रेजिंग के लिए ₹3,741.89 करोड़ की मंजूरी दी गई, जबकि शीत श्रृंखला और विपणन अवसंरचना के लिए ₹2,797 करोड़ का समर्थन प्रदान किया गया, जिससे कटाई के बाद की मूल्य श्रृंखला मजबूत हुई।
• सामूहिक एवं डिजिटल परिवर्तन: 2,195 FFPOs (मत्स्य किसान उत्पादक संगठनों) को ₹544.86 करोड़ का समर्थन प्रदान किया गया, जबकि राष्ट्रीय मत्स्य डिजिटल प्लेटफॉर्म (NFDP) पर सितंबर 2026 तक 37.23 लाख पंजीकरण हो चुके थे। इससे क्षेत्र के औपचारिकीकरण तथा ऋण, बीमा और ट्रेसेबिलिटी (उत्पाद की उत्पत्ति एवं आपूर्ति-श्रृंखला का पता लगाने की क्षमता) तक पहुँच को सुगम बनाया गया।
क्रियान्वयन संबंधी चुनौतियाँ और उभरती कमियाँ
• असमान क्रियान्वयन: संसदीय समीक्षा में पाया गया कि मीठे पानी/खारे पानी की जलीय कृषि तथा जलभराव वाले क्षेत्रों के विकास के तहत 2025–26 में 10,000 हेक्टेयर के लक्ष्य के मुकाबले केवल 2,050 हेक्टेयर क्षेत्र ही प्राप्त किया जा सका। विभाग ने इसका एक कारण योजना के अंतिम चरण के दौरान नई लाभार्थी-केंद्रित गतिविधियों को सीमित मंजूरी दिया जाना बताया।
• ऋण तक पहुँच: मत्स्य लाभार्थियों से प्राप्त 6.83 लाख किसान क्रेडिट कार्ड (KCC) आवेदनों में से 6.77 लाख आवेदन स्वीकार किए गए, लेकिन केवल 4.82 लाख आवेदनों को ऋण स्वीकृत हुआ। यह वास्तविक ऋण तक पहुँच में रूपांतरण को बेहतर बनाने की गुंजाइश को दर्शाता है।
• कटाई के बाद की क्षमता: परिवहन, शीत भंडारण, बर्फ संयंत्रों, बाजारों और मूल्यवर्धित उद्यमों में निरंतर निवेश से कटाई के बाद होने वाले नुकसान को और कम करने तथा उत्पाद से प्राप्त होने वाले वास्तविक मूल्य में सुधार की आवश्यकता स्पष्ट होती है।
• प्रौद्योगिकी एवं सततता: गहन जलीय कृषि के विस्तार के लिए पर्याप्त तकनीकी क्षमता, रोग निगरानी, जैव-सुरक्षा और पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों की आवश्यकता है। इसके साथ ही पकड़ी जाने वाली मत्स्य संपदा (कैप्चर फिशरीज) का जिम्मेदार प्रबंधन भी सुनिश्चित करना आवश्यक है।
PMMSY और भारत की ब्लू इकोनॉमी
• मत्स्य पालन लगभग 3 करोड़ लोगों की आजीविका को बनाए रखता है, विशेष रूप से तटीय और वंचित समुदायों के बीच, साथ ही खाद्य एवं पोषण सुरक्षा, रोजगार और निर्यात में योगदान देता है। भारत विश्व का दूसरा सबसे बड़ा मछली उत्पादक देश है और वैश्विक उत्पादन में लगभग 8% का योगदान करता है।
• PMMSY आधुनिक जलीय कृषि, समुद्री शैवाल, मत्स्य अवसंरचना, शीत शृंखला, प्रसंस्करण, डिजिटल औपचारिकीकरण और उत्पादक संगठनों के माध्यम से इस क्षेत्र को पारंपरिक उत्पादन से आगे विस्तारित कर रही है।
• आरएएस (RAS), बायोफ्लॉक और केज कल्चर जैसी प्रौद्योगिकियाँ, सतत मत्स्य प्रबंधन के साथ, मत्स्य विकास को सतत विकास लक्ष्य 14 (जल के नीचे जीवन) तथा जलीय संसाधनों के सतत उपयोग के व्यापक उद्देश्य के अनुरूप बनाती हैं।
• इस प्रकार, क्षेत्र की ब्लू इकोनॉमी क्षमता उच्च उत्पादकता और मूल्यवर्धन को जलीय संसाधनों के सतत उपयोग के साथ संयोजित करने में निहित है।
आगे की राह
• परिणामों पर ध्यान: निगरानी को केवल परियोजनाओं की मंजूरी से हटाकर उत्पादकता, मछुआरों की आय, कटाई के बाद होने वाले नुकसान में कमी और मूल्यवर्धन में होने वाले मापनीय लाभों पर केंद्रित किया जाए।
• वित्तीय समावेशन को गहरा करना: KCC आवेदनों को स्वीकृत ऋण में परिवर्तित करने की प्रक्रिया में सुधार किया जाए तथा NFDP का उपयोग औपचारिकीकरण, बीमा और वित्त तक पहुँच को मजबूत करने के लिए किया जाए।
• मूल्य शृंखला को पूर्ण करना: शीत श्रृंखला, स्वच्छतापूर्ण मछली उतारने की सुविधाओं, प्रसंस्करण, गुणवत्ता मानकों, ट्रेसेबिलिटी और बाजार संपर्क को प्राथमिकता दी जाए।
• जिम्मेदारीपूर्वक प्रौद्योगिकी का विस्तार: तकनीकी प्रशिक्षण, रोग निगरानी, जैव-सुरक्षा और पर्यावरणीय सुरक्षा उपायों के साथ आधुनिक जलीय कृषि का विस्तार किया जाए।
• सामूहिक संगठनों को सशक्त बनाना: FFPOs और सहकारी समितियों को मजबूत किया जाए, ताकि इनपुट, प्रौद्योगिकी, वित्त और लाभकारी बाजारों तक पहुँच में सुधार हो।
