संबंधित पाठ्यक्रम
सामान्य अध्ययन: सरकारी नीतियाँ और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए हस्तक्षेप, उनके अभिकल्पन तथा कार्यान्वयन से संबंधित विषय|
सामान्य अध्ययन 3: भारत में भूमि सुधार|
संदर्भ: ग्रामीण विकास मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने डिजिटल इंडिया भूमि अभिलेख आधुनिकीकरण कार्यक्रम (DILRMP) 3.0 के लिए परिचालन दिशानिर्देश जारी किए हैं।
अन्य संबंधित जानकारी
- नए चरण का उद्देश्य केवल व्यक्तिगत भूमि अभिलेखों के डिजिटलीकरण से आगे बढ़कर एक एकीकृत, GIS-आधारित डिजिटल भूमि अभिलेख पारिस्थितिकी तंत्र विकसित करना है, जिससे भूमि संबंधी सेवाओं तक पहुँच बेहतर होगी तथा भूमि विवाद और धोखाधड़ी कम होगी।
- DILRMP 3.0 एक केंद्रीय क्षेत्र योजना है, जिसे 2026–2031 के लिए ₹565.50 करोड़ के परिव्यय के साथ मंजूरी दी गई है।
प्रमुख हस्तक्षेप:

डिजिटलीकरण से एकीकृत भूमि स्टैक तक
- पहले की प्रगति: 99.90% अधिकार अभिलेख (RoRs), 97% भूकर मानचित्र डिजिटलीकृत और 99% उप-पंजीयक कार्यालय (SROs) कम्प्यूटरीकृत किए जा चुके हैं।
- GIS-आधारित भूमि स्टैक: राज्य भू-संदर्भित भूकर मानचित्रों, अधिकार अभिलेखों (RoRs), संपत्ति पंजीकरण और संबंधित न्यायालयीन मामलों को API के माध्यम से एकीकृत करेंगे।
- राष्ट्रीय भूमि स्टैक: राज्य भूमि स्टैक मिलकर एक संघीय राष्ट्रीय भूमि स्टैक का निर्माण करेंगे, जिससे अंतर-संचालनीयता और सूचना का आदान-प्रदान संभव होगा, जबकि डेटा का स्वामित्व और नियंत्रण संबंधित प्राधिकरणों के पास ही रहेगा।
1. आईआईटी–रोपड़
प्रत्येक भूमि खंड के लिए 14-अंकीय भू-आधार
- भू-आधार/ULPIN: प्रत्येक भूमि खंड को 14-अंकीय विशिष्ट पहचानकर्ता दिया जाएगा, जिससे स्पष्ट पहचान, बेहतर सत्यापन और भूमि संबंधी धोखाधड़ी की रोकथाम सुनिश्चित होगी।
- पुराने अभिलेख: भूमि और संपत्ति अभिलेखों को स्कैन करके डिजिटल रूप से संग्रहित किया जाएगा, ताकि उत्तराधिकार अधिकारों को संरक्षित किया जा सके और पैतृक संपत्ति संबंधी विवादों को कम किया जा सके।
- पंजीकरण रिपॉजिटरी: एक सुरक्षित रिपॉजिटरी में पंजीकृत विलेख और भार संबंधी जानकारी उपलब्ध होगी, जिससे स्वामित्व सत्यापन, लेन-देन का इतिहास और संपत्ति की समुचित जाँच में सहायता मिलेगी।
SROs बनेंगे पंजीकरण सेवा केंद्र
- पंजीकरण सेवा केंद्र: 75 अधिक आवागमन वाले SROs को आधुनिक पंजीकरण सेवा केंद्रों (RSKs) में उन्नत किया जाएगा। इन्हें पासपोर्ट सेवा केंद्रों की तर्ज पर विकसित किया जाएगा, जिनमें बेहतर नागरिक सुविधाएँ और डिजिटल कतार प्रबंधन होगा।
- राजस्व न्यायालय: RCCMS को भूमि अभिलेखों से सीधे जोड़ा जाएगा, जिससे लंबित मामलों को कम करने और नामांतरण निपटान में तेजी लाने में मदद मिलेगी।
- शहरी भूमि अभिलेख: NAKSHA पायलट में तीव्रता लाई जाएगी, ताकि GIS-आधारित शहरी भूमि अभिलेख तैयार किए जा सकें और शहरी संपत्ति कार्ड (UrPro Cards) जारी करने में सुविधा हो।
100% केंद्रीय वित्त पोषण और रियल-टाइम निगरानी
- वित्त पोषण: DILRMP 3.0 के अंतर्गत सभी राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों को PFMS के माध्यम से चरणबद्ध, प्रदर्शन-आधारित तंत्र के तहत 100% केंद्रीय वित्त पोषण प्रदान किया जाएगा।
- निगरानी: परियोजना स्वीकृति एवं निगरानी समिति के अंतर्गत उन्नत DILRMP-MIS डैशबोर्ड के माध्यम से प्रगति की रियल-टाइम निगरानी की जाएगी।
- डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना: DILRMP 3.0 का उद्देश्य भूमि प्रशासन के लिए एकीकृत डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) का निर्माण करना है।
डिजिटलीकृत भूमि अभिलेखों की आवश्यकता
- समानता सुनिश्चित करना: पारदर्शी भूमि अभिलेख निष्पक्ष भूमि सुधारों में सहायता कर सकते हैं और भूमिहीनों, वंचितों, महिलाओं तथा कमजोर वर्गों के अधिकारों की रक्षा कर सकते हैं, साथ ही भूमि संबंधी सेवाओं तक पहुँच में सुधार कर सकते हैं।
- मुकदमेबाजी कम करना: स्पष्ट, सरकार द्वारा समर्थित स्वामित्व अधिकार भूमि विवादों को न्यूनतम कर सकते हैं और न्यायालयों पर बोझ कम कर सकते हैं।
- विकास को बढ़ावा देना: विश्वसनीय भूमि स्वामित्व दस्तावेज लेन-देन संबंधी जोखिमों को कम करते हैं, निवेश को प्रोत्साहित करते हैं तथा भूमि मालिकों को ऋण और बीमा के लिए स्वामित्व दस्तावेजों का उपयोग करने में सक्षम बनाते हैं।
- पारदर्शिता में सुधार: पुराने और बिखरे हुए भूमि अभिलेखों को स्थानिक डेटाबेस और आधार के साथ डिजिटलीकृत एवं एकीकृत करने से सटीकता और पहुँच में सुधार हो सकता है तथा बेनामी संपत्तियों से संबंधित समस्याओं का समाधान करने में सहायता मिल सकती है।
- बेहतर भूमि प्रबंधन: भू-स्थानिक मानचित्रण सटीक सर्वेक्षण और नियोजन को सक्षम बनाता है, जबकि डिजिटल अभिलेख भूमि अधिग्रहण या आपदाओं के दौरान निष्पक्ष और समयबद्ध मुआवजे में सहायता करते हैं।
भूमि अभिलेखों के डिजिटलीकरण से जुड़ी चुनौतियाँ
- भाषाई और सामुदायिक बाधाएँ: भारत की भाषाई विविधता डिजिटल प्रणालियों की समझ को सीमित कर सकती है, जबकि सामुदायिक भूमि स्वामित्व, विशेषकर पूर्वोत्तर राज्यों में, मानकीकृत भूमि स्वामित्व निर्धारण को जटिल बना सकता है।
- अभिलेखों की खराब गुणवत्ता: अस्पष्ट भूमि स्वामित्व दस्तावेज, पुराने भूकर मानचित्र और दर्ज न किए गए भूमि-विभाजन आधिकारिक अभिलेखों और जमीनी वास्तविकताओं के बीच विसंगतियाँ पैदा कर सकते हैं।
- खंडित प्रणालियाँ: भूमि अभिलेख, पंजीकरण अभिलेख, भूकर मानचित्र और राजस्व डेटाबेस अलग-अलग प्राधिकरणों और अलग-अलग प्रारूपों में रखे जाते हैं, जिससे निर्बाध एकीकरण कठिन हो जाता है।
- समन्वय और संसाधन: चूँकि भूमि मुख्य रूप से राज्य का विषय है, इसलिए केंद्र, राज्य और स्थानीय प्राधिकरणों के बीच समन्वय आवश्यक है; अपर्याप्त धनराशि, कर्मचारियों, अवसंरचना और क्षमता निर्माण से कार्यान्वयन और अधिक बाधित होता है।
- जागरूकता और साइबर सुरक्षा: भूमि मालिकों, खरीदारों, विक्रेताओं और किरायेदारों में सीमित जागरूकता भागीदारी में बाधा डाल सकती है, जबकि डिजिटलीकृत अभिलेखों को अनधिकृत पहुँच, हेरफेर और साइबर हमलों का जोखिम रहता है।
आगे की राह
- एकीकृत भूमि प्लेटफॉर्म: भूमि अभिलेखों को संपत्ति पंजीकरण, कर भुगतान और सरकारी सब्सिडी से जोड़ने वाला एकीकृत प्लेटफॉर्म विकसित किया जाए, ताकि भूमि संबंधी सेवाएँ निर्बाध रूप से उपलब्ध हो सकें।
- नियमित अद्यतन और सामुदायिक भागीदारी: नियमित ऑडिट, ड्रोन और उपग्रह चित्रों के माध्यम से सटीक और अद्यतन भूमि अभिलेख सुनिश्चित किए जाएँ तथा स्थानीय समुदायों द्वारा सीमाओं और स्वामित्व का सत्यापन कराया जाए।
- जागरूकता और समावेशन: स्थानीय मीडिया, सामुदायिक बैठकों और सोशल मीडिया के माध्यम से किसानों एवं भूमि मालिकों को ULPIN और डिजिटल भूमि अभिलेखों के बारे में जागरूक किया जाए तथा यह सुनिश्चित किया जाए कि प्लेटफॉर्म महिलाओं और वंचित समुदायों के लिए सुलभ हों।
- त्वरित विवाद समाधान: भारत में भूमि और संपत्ति से संबंधित मामले सभी दीवानी मामलों के लगभग दो-तिहाई हैं। इसलिए पारदर्शिता बढ़ाने और मामलों की निगरानी के लिए समर्पित ऑनलाइन शिकायत एवं विवाद-समाधान प्लेटफॉर्म स्थापित किए जाएँ।
- प्रौद्योगिकी, साझेदारी और क्षमता निर्माण: प्रौद्योगिकी कंपनियों और गैर-सरकारी संगठनों के साथ सार्वजनिक-निजी भागीदारी (PPP) को बढ़ावा दिया जाए, सुरक्षित भूमि लेन-देन के लिए ब्लॉकचेन जैसी अनुसंधान एवं विकास (R&D) तकनीकों में निवेश किया जाए तथा सरकारी अधिकारियों और भूमि अभिलेख अधिकारियों को डिजिटल उपकरणों का प्रशिक्षण दिया जाए।
