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सामान्य अध्ययन-3: स्वास्थ्य, शिक्षा और मानव संसाधन से संबंधित सामाजिक क्षेत्र/सेवाओं के विकास एवं प्रबंधन से संबंधित विषय।

संदर्भ: आयुष मंत्रालय ने आयुर्वेद, सिद्ध, यूनानी और होम्योपैथी के अंतर्गत सामान्य त्वचा रोगों के प्रबंधन के लिए योग को शामिल करते हुए मानक उपचार दिशानिर्देश (STGs) जारी किए हैं। इनका उद्देश्य मानकीकरण, गुणवत्ता आश्वासन और साक्ष्य-आधारित नैदानिक ​​अभ्यास को बढ़ावा देना है।

त्वचा संबंधी रोगों के प्रबंधन हेतु प्रमुख दिशानिर्देश

  • दायरा एवं कवरेज: पाँच सामान्य रोगों—सोरायसिस, डर्मेटाइटिस, विटिलिगो, पित्ती (अर्टिकेरिया) और डर्मेटोफाइटोसिस को शामिल किया गया है। आयुर्वेद, सिद्ध, यूनानी और होम्योपैथी के लिए अलग-अलग नैदानिक दिशानिर्देश दिए गए हैं।
  • निदान: रोग की पुष्टि करने और जटिलताओं का आकलन करने के लिए नैदानिक लक्षण, निदान के मानदंड, विभेदक निदान तथा प्रासंगिक जाँचों को शामिल किया गया है।
  • उपचार एवं अनुवर्ती देखभाल: प्रत्येक चिकित्सा पद्धति के अनुसार उपचार प्रोटोकॉल, रोग की गंभीरता का आकलन, आहार एवं जीवनशैली संबंधी सलाह तथा उपचार के प्रति प्रतिक्रिया की निगरानी का प्रावधान किया गया है।
  • रेफरल: गंभीर या जटिल स्थितियों, निदान में अनिश्चितता, उपचार की विफलता तथा एनाफिलेक्सिस के साथ होने वाली पित्ती जैसी आपातकालीन स्थितियों में रोगी को उच्चतर स्वास्थ्य केंद्र पर भेजने के मानदंड निर्धारित किए गए हैं।
  • रोकथाम एवं योग: निवारक उपायों, त्वचा की देखभाल, तनाव प्रबंधन तथा प्रासंगिक योगाभ्यास, श्वास संबंधी अभ्यासों और ध्यान को शामिल किया गया है।
  • विकास एवं सत्यापन: इन दिशानिर्देशों को आयुष अनुसंधान परिषदों और आधुनिक चिकित्सा विशेषज्ञों के परामर्श से तैयार किया गया है। इसमें शास्त्रीय ग्रंथों और वैज्ञानिक साक्ष्यों की समीक्षा की गई। प्रारूप प्रोटोकॉल का दिल्ली के प्राथमिक एवं द्वितीयक स्वास्थ्य देखभाल केंद्रों में कार्यरत चिकित्सा अधिकारियों के साथ क्षेत्रीय परीक्षण किया गया और उनकी प्रतिक्रिया को शामिल किया गया।
  • अपेक्षित लाभ: इनका उद्देश्य उपचार में एकरूपता, गुणवत्ता आश्वासन, तर्कसंगत नैदानिक निर्णय लेने, व्यावसायिक प्रशिक्षण और अनुसंधान को बढ़ावा देना तथा स्वास्थ्य सेवा वितरण में आयुष की भागीदारी को मजबूत करना है।

आयुष (आयुर्वेद, योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी) के बारे में

  • आयुष मंत्रालय की स्थापना 9 नवंबर 2014 को भारत में स्वास्थ्य देखभाल की पारंपरिक प्रणालियों के विकास और प्रसार को बढ़ावा देने के लिए की गई थी।
  • इसका पूर्ववर्ती संस्थान, भारतीय चिकित्सा पद्धति एवं होम्योपैथी विभाग, मार्च 1995 में स्थापित किया गया था। नवंबर 2003 में इसका नाम बदलकर आयुर्वेद, योग एवं प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध और होम्योपैथी विभाग कर दिया गया।
  • आयुष के अंतर्गत प्रमुख चिकित्सा पद्धतियाँ
    • आयुर्वेद: इसका उद्देश्य शरीर में संरचनात्मक एवं क्रियात्मक घटकों के संतुलन को बनाए रखना है। इसके मूलभूत सिद्धांतों में पंचमहाभूत (पाँच तत्व) और त्रिदोष (वात, पित्त एवं कफ) शामिल हैं।
    • योग: यह एक समग्र अनुशासन है, जिसमें शारीरिक स्वास्थ्य और मानसिक कल्याण को बढ़ावा देने के लिए शारीरिक अभ्यासों, श्वास तकनीकों और मानसिक नियंत्रण को एकीकृत किया जाता है।
    • यूनानी: इसकी उत्पत्ति यूनान में हुई थी। अरब और फ़ारसी विद्वानों ने इसका आगे विकास किया तथा मध्यकाल में यह भारत पहुँची। यह व्यक्ति की प्रकृति, आहार नियमन और जीवनशैली प्रबंधन पर बल देती है।
    • सिद्ध: यह दक्षिण भारत की तमिल परंपराओं से उत्पन्न एक पारंपरिक चिकित्सा पद्धति है। इसमें तीन दोषों—वातम्, पित्तम् और कफम्—के संतुलन पर बल दिया जाता है तथा स्वास्थ्य के शारीरिक, शारीरिक-क्रियात्मक और मनोवैज्ञानिक पहलुओं पर विचार किया जाता है।
    • होम्योपैथी: इसका विकास सैमुअल हैनीमैन ने किया था। यह समरूप से समरूप का उपचार के सिद्धांत, व्यक्ति-विशिष्ट उपचार और अत्यधिक तनुकृत औषधियों के उपयोग पर आधारित है।
    • प्राकृतिक चिकित्सा: यह प्रकृति के माध्यम से उपचार पर आधारित एक चिकित्सा पद्धति है। इसमें शरीर की प्राकृतिक उपचार क्षमता को बढ़ावा देने के लिए पाँच प्राकृतिक तत्वों—आकाश, वायु, अग्नि, जल और पृथ्वी (पंचमहाभूत)—का उपयोग किया जाता है। इसका उद्देश्य केवल रोग का उपचार करना नहीं, बल्कि संपूर्ण व्यक्ति के स्वास्थ्य पर ध्यान देना है।

विनियमन एवं गुणवत्ता आश्वासन

  • विधिक ढाँचा: औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 और औषधि एवं प्रसाधन सामग्री नियम, 1945, आयुर्वेद, सिद्ध और यूनानी (ASU) औषधियों के लिए नियामक ढाँचा प्रदान करते हैं।
  • लाइसेंसिंग एवं गुणवत्ता नियंत्रण: राज्य सरकारें औषधियों के निर्माण और बिक्री को नियंत्रित करने वाले संबंधित प्रावधानों को लागू करने के लिए लाइसेंसिंग प्राधिकरण नियुक्त करती हैं।
  • वैधानिक सलाहकार निकाय:
    • आयुर्वेद, सिद्ध, यूनानी औषधि तकनीकी सलाहकार बोर्ड (ASUDTAB): ASU औषधियों से संबंधित तकनीकी मामलों पर सलाह देता है।
    • आयुर्वेद, सिद्ध, यूनानी औषधि परामर्श समिति (ASUDCC): सभी राज्यों में अधिनियम के एकसमान प्रशासन को बढ़ावा देने में सहायता करती है।
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