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सामान्य अध्ययन-2: संघ और राज्यों के कार्य एवं उत्तरदायित्व, संघीय ढाँचे से संबंधित मुद्दे एवं चुनौतियाँ, स्थानीय स्तर तक शक्तियों और वित्त का हस्तांतरण तथा इससे संबंधित चुनौतियाँ।
सामान्य अध्ययन-2: वैधानिक, विनियामक एवं विभिन्न अर्ध-न्यायिक निकाय।
संदर्भ: ओडिशा और छत्तीसगढ़ के बीच महानदी जल विवाद एक बार फिर चर्चा में आ गया है। दोनों राज्य महानदी जल विवाद न्यायाधिकरण (MWDT) के समक्ष चल रही कार्यवाही के साथ-साथ केंद्रीय जल आयोग की मध्यस्थता से समाधान की दिशा में प्रयास कर रहे हैं।
अन्य संबंधित जानकारी

- मई 2026 में महानदी जल विवाद न्यायाधिकरण ने दोनों राज्यों को सौहार्दपूर्ण समाधान पर पहुँचने का अंतिम अवसर दिया और चेतावनी दी कि वार्ता विफल होने पर आगे न्यायनिर्णयन की प्रक्रिया अपनाई जाएगी।
- ओडिशा की शिकायत और सर्वोच्च न्यायालय के हस्तक्षेप के बाद 12 मार्च, 2018 को गठित इस न्यायाधिकरण की वर्तमान अध्यक्ष न्यायमूर्ति बेला एम. त्रिवेदी हैं।
- वार्ता दोबारा शुरू होने के बावजूद दोनों राज्य जल बँटवारे के परस्पर स्वीकार्य सूत्र पर सहमत होने में विफल रहे हैं।
- न्यूनतम गैर-मानसूनी जल प्रवाह और कलमा बैराज सहित अनसुलझे मुद्दों की जाँच के लिए अगली सुनवाई 15 अक्टूबर, 2026 को निर्धारित है।
- केंद्र सरकार ने कार्यवाही पूरी करने के लिए न्यायाधिकरण का कार्यकाल 13 जनवरी, 2027 तक बढ़ा दिया है।
महानदी जल विवाद के बारे में
- यह विवाद लगभग 2016 में शुरू हुआ, जब ओडिशा ने आरोप लगाया कि छत्तीसगढ़ बिना परामर्श के नदी के ऊपरी प्रवाह क्षेत्र में कई बैराज और बाँधों का निर्माण कर रहा है।
- ओडिशा ने निचले तटवर्ती राज्य होने के नाते दावा किया कि इन निर्माणों से निचले क्षेत्रों में जल प्रवाह कम हो गया है, जिससे सिंचाई, पेयजल और विद्युत उत्पादन प्रभावित हो रहे हैं।
- दूसरी ओर, छत्तीसगढ़ ने तर्क दिया कि उसे विकास संबंधी उद्देश्यों के लिए अपने क्षेत्र में जल का उपयोग करने का अधिकार है।
- सर्वोच्च न्यायालय के निर्देश के जवाब में, केंद्र सरकार ने अंतरराज्यीय नदी जल विवाद अधिनियम, 1956 के अंतर्गत 2018 में महानदी जल विवाद न्यायाधिकरण (MWDT) का गठन किया।
विवाद के प्रमुख मुद्दे
- ऊपरी प्रवाह–निचले प्रवाह का संघर्ष: ओडिशा का कहना है कि नदी के ऊपरी प्रवाह क्षेत्र में बनाई गई परियोजनाओं से गैर-मानसूनी अवधि में जल प्रवाह कम हो जाता है, जबकि छत्तीसगढ़ विकास संबंधी आवश्यकताओं के लिए अपने क्षेत्र में जल का उपयोग करने के अपने अधिकार पर जोर देता है।
- जल की उपलब्धता और उपयोग संबंधी विवाद: औसत वार्षिक जल प्रवाह (MAF), वर्तमान जल उपयोग और भविष्य की माँग के अनुमानों को लेकर मतभेद बने हुए हैं। जल का न्यायसंगत बँटवारा निर्धारित करने के लिए ये महत्त्वपूर्ण हैं।
- आँकड़ों का आदान-प्रदान और विश्वास की कमी: विश्वसनीय एवं दोनों राज्यों द्वारा स्वीकार्य जलवैज्ञानिक आँकड़ों की कमी के कारण वार्ता रुकी हुई है। यह दोनों राज्यों के बीच गहरे विश्वास के अभाव को दर्शाता है।
- संघीय एवं शासन संबंधी चुनौतियाँ: विवाद का लंबे समय तक बने रहना, न्यायनिर्णयन में देरी, समन्वय की विफलता और न्यायाधिकरण के निर्णयों के बाद भी उनके क्रियान्वयन को लेकर अनिश्चितता जैसी समस्याओं को उजागर करता है।
आगे की राह
- वार्ता के माध्यम से समाधान: जल की उपलब्धता के स्वतंत्र जलवैज्ञानिक आकलन के आधार पर केंद्रीय जल आयोग (CWC) की मध्यस्थता से ओडिशा और छत्तीसगढ़ के बीच परस्पर स्वीकार्य समाधान को सुगम बनाया जाए।
- संयुक्त निगरानी: कलमा बैराज पर टेलीमेट्री प्रणालियाँ स्थापित की जाएँ, ताकि दोनों राज्य और केंद्रीय जल आयोग (CWC) जल प्रवाह की पारदर्शी निगरानी कर सकें।
- स्थायी न्यायाधिकरण तंत्र: अंतरराज्यीय नदी जल विवादों का समयबद्ध न्यायनिर्णयन सुनिश्चित करने के लिए 2019 के संशोधन विधेयक में प्रस्तावित स्थायी अंतरराज्यीय नदी जल विवाद न्यायाधिकरण को पुनः स्थापित किया जाए।
- नदी बेसिन स्तर पर प्रबंधन: न्यायसंगत जल बँटवारे को बढ़ावा देने और पूरे नदी बेसिन के जल प्रबंधन में समन्वय स्थापित करने के लिए वैधानिक महानदी बेसिन प्रबंधन बोर्ड की स्थापना की संभावनाओं पर विचार किया जाए।
