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सामान्य अध्ययन-1: महिलाओं की भूमिका और महिला संगठन।
सामान्य अध्ययन -2: केंद्र और राज्यों द्वारा जनसंख्या के संवेदनशील वर्गों के लिए कल्याणकारी योजनाएँ और इन योजनाओं का निष्पादन।]
संदर्भ: वैश्विक लैंगिक अंतराल सूचकांक 2026 में भारत 145 अर्थव्यवस्थाओं में 131वें स्थान पर बना रहा, जहाँ उसने अपने लैंगिक अंतराल का 64.5% समाप्त किया। 2025 की तुलना में भारत के स्कोर में मामूली सुधार हुआ, लेकिन उसकी वैश्विक रैंक अपरिवर्तित रही।
वैश्विक लैंगिक अंतराल सूचकांक को समझना
- सूचकांक के बारे में: विश्व आर्थिक मंच (WEF) द्वारा 2006 में शुरू किया गया यह सूचकांक चार आयामों में लैंगिक समानता का आकलन करता है:
- आर्थिक भागीदारी और अवसर
- शैक्षिक उपलब्धि
- स्वास्थ्य और उत्तरजीविता
- राजनीतिक सशक्तीकरण
- 20वाँ संस्करण: 2026 संस्करण में 145 अर्थव्यवस्थाएँ शामिल हैं। इसमें 97 अर्थव्यवस्थाओं का एक स्थिर नमूना भी शामिल है, जिनका 2006 से प्रत्येक संस्करण में आकलन किया गया है। इससे दो दशकों की प्रगति का आकलन संभव होता है।
- मापन: प्रत्येक संकेतक को 0–1 समानता पैमाने पर व्यक्त किया जाता है, जहाँ 1 पूर्ण समानता को दर्शाता है। स्कोर को समाप्त किए गए लैंगिक अंतराल के प्रतिशत के रूप में भी व्यक्त किया जा सकता है। यह सूचकांक विकास या कल्याण के निरपेक्ष स्तरों के बजाय महिलाओं और पुरुषों के बीच सापेक्ष समानता को मापता है।
रिपोर्ट के प्रमुख निष्कर्ष
वैश्विक प्रदर्शन
- समग्र प्रगति: 2026 में वैश्विक लैंगिक अंतराल का 69.2% समाप्त हो चुका है। 2025 और 2026 दोनों में शामिल 143 अर्थव्यवस्थाओं में यह अंतर 0.4 प्रतिशत अंक कम हुआ। 97 अर्थव्यवस्थाओं का स्थिर नमूना 69.4% तक पहुँच गया, जो 2006 के 64.2% से 5.2 प्रतिशत अंक अधिक है।
- समानता प्राप्त करने में लगने वाला समय: किसी भी अर्थव्यवस्था ने पूर्ण लैंगिक समानता प्राप्त नहीं की है। प्रगति की वर्तमान वैश्विक दर के अनुसार पूर्ण समानता अभी भी लगभग 120 वर्ष दूर होने का अनुमान है।
- आयामवार अंतराल: शैक्षिक उपलब्धि (96.9%) और स्वास्थ्य एवं उत्तरजीविता (96.2%) समानता के सबसे निकट हैं, जबकि आर्थिक भागीदारी और अवसर (61.7%) तथा राजनीतिक सशक्तीकरण (22.1%) में बड़े अंतराल बने हुए हैं। वर्ष-दर-वर्ष आधार पर शिक्षा में सबसे अधिक सुधार दर्ज किया गया, जबकि राजनीतिक सशक्तीकरण में गिरावट आई।
- शीर्ष प्रदर्शनकर्ता: आइसलैंड (93%) ने लगातार 17वें वर्ष शीर्ष स्थान बनाए रखा। इसके बाद फिनलैंड (87.2%) और नॉर्वे (85.7%) रहे। नामीबिया (84.5%) उप-सहारा अफ्रीका की सर्वोच्च रैंक वाली अर्थव्यवस्था है, जबकि ऑस्ट्रेलिया (81.9%) पहली बार शीर्ष 10 में शामिल हुआ।
- नेतृत्व और उभरती अर्थव्यवस्था: WEF द्वारा उद्धृत LinkedIn के आँकड़ों के अनुसार, 2026 में महिलाओं का कार्यबल में प्रतिनिधित्व बढ़कर 41.8% हो गया, जबकि वरिष्ठ नेतृत्व में यह 29.6% है। प्रवेश स्तर पर उनका प्रतिनिधित्व 46% से घटकर C-suite स्तर पर 23% रह जाता है। वहीं, AI मूल्य शृंखला में महिलाओं का प्रतिनिधित्व अभी भी कम है।
भारत का प्रदर्शन
- समग्र: भारत ने 64.5% स्कोर किया और 131वाँ स्थान प्राप्त किया। यह 2006 से 4.3 प्रतिशत अंक का सुधार दर्शाता है, जो मुख्य रूप से शैक्षिक उपलब्धि के कारण हुआ। भारत दक्षिण एशिया की सात अर्थव्यवस्थाओं में छठे स्थान पर है और वैश्विक स्तर पर केवल 14 अर्थव्यवस्थाएँ उससे नीचे हैं।
- आर्थिक भागीदारी और अवसर – 41.2%: भारत के स्कोर में 2025 की तुलना में 0.5 प्रतिशत अंक का सुधार हुआ, लेकिन यह अभी भी 2013 के 44.6% के सर्वोच्च स्तर से 3.5 अंक नीचे है। इस उप-सूचकांक में 20 वर्षों के दौरान भारत का समग्र सुधार केवल 1.5 अंक रहा है। पेशेवर और तकनीकी कर्मियों में समानता 2006 के 26.6% से बढ़कर 2026 में 49.9% हो गई, जबकि श्रम बल भागीदारी में समानता 44.1% और विधायकों, वरिष्ठ अधिकारियों तथा प्रबंधकों में समानता 13.1% है।
- शैक्षिक उपलब्धि – 96.6%: भारत ने माध्यमिक और उच्चतर शिक्षा में नामांकन में पूर्ण समानता तथा प्राथमिक नामांकन में लगभग समानता बनाए रखी है। हालांकि, वयस्क साक्षरता में समानता 82.5% है और समग्र शिक्षा स्कोर पिछले संस्करण की तुलना में 0.5 प्रतिशत अंक घटा है।
- स्वास्थ्य और उत्तरजीविता – 95.6%: भारत ने पिछले संस्करण की तुलना में अपने स्कोर में सुधार किया। हालांकि, जन्म के समय लिंगानुपात अभी भी 2006 के समानता स्तर से लगभग एक प्रतिशत अंक नीचे है।
- राजनीतिक सशक्तीकरण – 24.5%: भारत का यह सर्वोच्च रैंक वाला उप-सूचकांक है, जिसमें वह वैश्विक स्तर पर 67वें स्थान पर है। हालांकि, 2006 से इसका समग्र सुधार केवल 1.8 प्रतिशत अंक है। संसदीय समानता 16.1% है, जबकि मंत्रिस्तरीय समानता 5.9% है। राष्ट्राध्यक्ष संबंधी संकेतक 2021 के 72.3% से घटकर 2026 में 40.7% हो गया है।
भारत में लैंगिक अंतराल को कम करने के लिए की गई पहलें
- लैंगिक उत्तरदायी बजटिंग: लैंगिक बजट विवरण, जिसे 2005–06 में शुरू किया गया था, सार्वजनिक व्यय में लैंगिक पहलुओं को समाहित करता है। वित्त वर्ष 2026–27 में इसके अंतर्गत ₹5.01 लाख करोड़, अर्थात केंद्रीय बजट का 9.37%, दर्ज किया गया।
- शिक्षा: बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ और कस्तूरबा गांधी बालिका विद्यालय बालिकाओं की शिक्षा, विद्यालय में निरंतरता और सशक्तीकरण को समर्थन देते हैं।
- आर्थिक सशक्तीकरण: DAY-NRLM के अंतर्गत स्वयं सहायता समूह, MUDRA और कौशल-विकास संबंधी हस्तक्षेप महिलाओं की आजीविका, वित्तीय पहुँच, उद्यमिता और रोजगार को समर्थन देते हैं।
- सुरक्षा और सशक्तीकरण: मिशन शक्ति संबल और सामर्थ्य के माध्यम से वन स्टॉप सेंटर, महिला हेल्पलाइन, बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ, PMMVY, पालना क्रेच और शक्ति सदन जैसी पहलों को एक साथ लाता है।
- राजनीतिक प्रतिनिधित्व: नारी शक्ति वंदन अधिनियम, 2023 में लोकसभा और राज्य विधानसभाओं में महिलाओं के लिए एक-तिहाई सीटों के आरक्षण का प्रावधान है, जिसमें SC/ST के लिए आरक्षित सीटों का भी एक-तिहाई हिस्सा शामिल है। इसका कार्यान्वयन जनगणना और परिसीमन प्रक्रिया से जुड़ा हुआ है।
बनी हुई चुनौतियाँ/सीमाएँ
- शिक्षा–रोजगार के बीच अंतर: शैक्षिक उपलब्धि में लगभग समानता आर्थिक भागीदारी के समान स्तर में परिवर्तित नहीं हुई है। भारत का आर्थिक भागीदारी और अवसर स्कोर अभी भी केवल 41.2% है।
- नेतृत्व अंतराल: पेशेवर और तकनीकी प्रतिनिधित्व में उल्लेखनीय सुधार हुआ है, लेकिन विधायकों, वरिष्ठ अधिकारियों और प्रबंधकों में समानता 13.1% पर बनी हुई है, जो वरिष्ठ पदों तक सीमित प्रगति को दर्शाती है।
- देखभाल और कार्यस्थल संबंधी बाधाएँ: अवैतनिक देखभाल संबंधी जिम्मेदारियाँ, अपर्याप्त बाल देखभाल सुविधाएँ, आवागमन संबंधी बाधाएँ और कार्यस्थल सुरक्षा से जुड़ी चिंताएँ महिलाओं के वेतनभोगी रोजगार में प्रवेश, निरंतरता और प्रगति को सीमित कर सकती हैं।
- राजनीतिक प्रतिनिधित्व: राजनीतिक सशक्तीकरण 24.5% के निम्न स्तर पर बना हुआ है, जबकि संसदीय और मंत्रिस्तरीय समानता क्रमशः केवल 16.1% और 5.9% है।
- उभरती प्रौद्योगिकी संबंधी अंतराल: वैश्विक स्तर पर नेतृत्व की विभिन्न सीढ़ियों पर आगे बढ़ने के साथ महिलाओं का प्रतिनिधित्व तेजी से घटता है, जबकि AI-संबंधित भूमिकाओं में उनका प्रतिनिधित्व कम बना हुआ है। इससे यह जोखिम पैदा होता है कि उभरते क्षेत्रों में मौजूदा लैंगिक असमानताएँ बनी रहेंगी।
- सूचकांक की सीमाएँ: यह सूचकांक सापेक्ष लैंगिक समानता को मापता है, न कि निरपेक्ष कल्याण या विकास को। आँकड़ों की उपलब्धता, पद्धतिगत कवरेज और समय-अंतराल के कारण रैंकिंग की व्याख्या राष्ट्रीय और क्षेत्रीय संदर्भों में की जानी चाहिए।
आगे की राह
- शिक्षा और रोजगार के बीच अंतर को कम करना: बालिकाओं की शिक्षा में हुई प्रगति को महिलाओं की अधिक कार्यबल भागीदारी, उद्यमिता और करियर प्रगति में परिवर्तित करना।
- देखभाल और आवागमन संबंधी बाधाओं को कम करना: निरंतर रोजगार को समर्थन देने के लिए किफायती बाल देखभाल, सुरक्षित परिवहन, कार्यस्थल अवसंरचना और लचीली कार्य व्यवस्थाओं का विस्तार करना।
- नेतृत्व की पाइपलाइन को सुदृढ़ करना: नेतृत्व के अवसरों और संस्थागत समर्थन के माध्यम से राजनीतिक, प्रशासनिक और आर्थिक संस्थानों में वरिष्ठ पदों तक महिलाओं की प्रगति में सुधार करना।
- भविष्य की नौकरियों के लिए तैयारी: STEM, डिजिटल प्रौद्योगिकियों और AI में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाना, ताकि उभरते क्षेत्र मौजूदा व्यावसायिक असमानताओं को पुनः उत्पन्न न करें।
- परिणामों पर ध्यान केंद्रित करना: केवल नामांकन या व्यय पर निर्भर रहने के बजाय रोजगार, आय, सुरक्षा और निर्णय-निर्माण से संबंधित लैंगिक-विभाजित आँकड़ों, लैंगिक बजटिंग और परिणाम-आधारित निगरानी को सुदृढ़ करना।
