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सामान्य अध्ययन-3: देश के विभिन्न भागों में प्रमुख फसलें एवं फसल पैटर्न; किसानों की सहायता में ई-प्रौद्योगिकी; संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण एवं क्षरण।
संदर्भ: 10–12 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में आयोजित शुष्क भूमि कांग्रेस 2026 का समापन शुष्क भूमि पर दिल्ली घोषणा (3D) को अपनाने के साथ हुआ। इसमें वैश्विक दक्षिण में शुष्क भूमि कृषि को रूपांतरित करने के लिए अधिक सहयोग, नवाचार और सामूहिक कार्रवाई का आह्वान किया गया।
अन्य संबंधित जानकारी
- विषय: “दक्षिण-दक्षिण सहयोग के माध्यम से शुष्क भूमि कृषि का रूपांतरण”; कांग्रेस का संयुक्त आयोजन भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) और अंतरराष्ट्रीय अर्ध-शुष्क उष्णकटिबंधीय फसल अनुसंधान संस्थान (आईसीआरआईएसएटी) द्वारा किया गया। यह उनके बीच साझेदारी के 50 वर्ष पूरे होने का भी प्रतीक था।
- वैश्विक भागीदारी: एशिया, अफ्रीका और अमेरिका से 800 से अधिक वैज्ञानिकों, नीति-निर्माताओं, किसान प्रतिनिधियों और विकास साझेदारों ने भाग लिया। इसमें फसल प्रजनन, जलवायु लचीलापन, पोषण और बाजार, कृषि प्रणालियाँ, बीज प्रणालियाँ तथा लैंगिक और युवा समावेशन जैसे विषयों पर विचार-विमर्श किया गया।
- दक्षिण-दक्षिण सहयोग: शुष्क भूमि कांग्रेस का अंतिम दिन दक्षिण-दक्षिण सहयोग के लिए संयुक्त राष्ट्र दिवस (12 सितंबर) के साथ पड़ा।
शुष्क भूमियाँ : ये क्यों महत्वपूर्ण हैं?
- शुष्क भूमि में सीमित और परिवर्तनशील जल उपलब्धता वाले क्षेत्र शामिल होते हैं तथा इनमें शुष्क, अर्ध-शुष्क और शुष्क उप-आर्द्र क्षेत्र शामिल हैं।
- ये विश्व के लगभग 45% भू-भाग को कवर करते हैं और इनमें 2 अरब से अधिक लोग निवास करते हैं, जिनमें से कई छोटे जोत वाली कृषि पर निर्भर हैं तथा जलवायु परिवर्तनशीलता, भूमि क्षरण और जल की कमी का सामना करते हैं।
- प्रमुख संवेदनशीलताएँ:
- अनियमित वर्षा और बार-बार पड़ने वाला सूखा
- जल की कमी और बढ़ता तापमान
- भूमि और मृदा का क्षरण
- कम कृषि उत्पादकता
- जलवायु और बाजार संबंधी झटकों के प्रति ग्रामीण आजीविकाओं की संवेदनशीलता
- खाद्य सुरक्षा का महत्व: शुष्क भूमियाँ वैश्विक खाद्य सुरक्षा के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण हैं, जबकि उनकी संवेदनशीलता के कारण आजीविका और पोषण को बनाए रखने के लिए लचीली कृषि प्रणालियाँ आवश्यक हैं।
- रूपांतरण की आवश्यकता: इसलिए चुनौती केवल सूखे से निपटना नहीं है, बल्कि उत्पादक, लचीली और टिकाऊ शुष्क भूमि कृषि-खाद्य प्रणालियों का विकास करना है।
शुष्क भूमियों पर नई दिल्ली घोषणापत्र की प्रमुख विशेषताएँ
- दक्षिण-दक्षिण एवं त्रिकोणीय सहयोग: वैश्विक दक्षिण में ज्ञान, प्रौद्योगिकियों और सफल कृषि मॉडलों के आदान-प्रदान के लिए सीमा-पार सहयोग को मजबूत करना।
- नवाचार से व्यापक स्तर तक: सिद्ध कृषि नवाचारों को केवल अलग-अलग अनुसंधान या पायलट परियोजनाओं तक सीमित रखने के बजाय उनके अंगीकरण, अनुकूलन और व्यापक स्तर पर विस्तार में तेजी लाना।
- विज्ञान, आँकड़े एवं पूर्वानुमान: विश्वसनीय आँकड़ा एवं सूचना प्रणालियों को मजबूत करना तथा शुष्क भूमि कृषि की उभरती चुनौतियों के लिए योजना-निर्माण के केंद्र में पूर्वानुमान को रखना।
- जीवंत प्रयोगशालाएँ: कृषि अनुसंधान को क्षेत्रीय प्रथाओं और नीति-निर्माण से जोड़ने वाली साझा नवाचार प्रयोगशालाओं या जीवंत प्रयोगशालाओं को बढ़ावा देना।
- संस्थागत साझेदारियाँ: राष्ट्रीय कृषि अनुसंधान प्रणालियों, अंतरराष्ट्रीय संगठनों, विकास साझेदारों और अन्य हितधारकों के बीच सहयोग को मजबूत करना, ताकि वैज्ञानिक ज्ञान को व्यावहारिक समाधानों में परिवर्तित किया जा सके।
शुष्क भूमि कृषि के लिए भारत की पहल
- डब्ल्यूडीसी-पीएमकेएसवाई 2.0: प्रधानमंत्री कृषि सिंचाई योजना के वाटरशेड विकास घटक के अंतर्गत वर्षा-आधारित और क्षरित क्षेत्रों में वाटरशेड विकास, वर्षा जल संचयन, मृदा एवं नमी संरक्षण तथा आजीविका सहायता को बढ़ावा दिया जाता है।
- रिवार्ड कार्यक्रम: आँकड़ों, प्रौद्योगिकी और संस्थागत क्षमता निर्माण का उपयोग करके वाटरशेड प्रबंधन और कृषि लचीलेपन में सुधार करता है।
- आईसीएआर अनुसंधान: सूखा-सहिष्णु फसलों, वर्षा-आधारित कृषि प्रणालियों, मृदा-जल संरक्षण और जलवायु अनुकूलन पर ध्यान केंद्रित करता है।
- मोटे अनाज को बढ़ावा: कम जल और शुष्क भूमि परिस्थितियों के अनुकूल मोटे अनाज तथा अन्य जलवायु-लचीली फसलों को बढ़ावा देता है।
- सूक्ष्म सिंचाई: सूक्ष्म सिंचाई के माध्यम से जल के कुशल उपयोग को बढ़ावा देती है तथा वाटरशेड-आधारित उपायों को सुदृढ़ करती है।
