संबंधित पाठ्यक्रम
सामान्य अध्ययन-2: भारत से संबंधित और/या भारत के हितों को प्रभावित करने वाले द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक समूह एवं करार।
संदर्भ: भारत ने 12–13 सितंबर 2026 को नई दिल्ली में 18वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी की, जिसके समापन पर नई दिल्ली घोषणा-पत्र को अपनाया गया।
अन्य संबंधित जानकारी
- विषय: “लचीलेपन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता के लिए निर्माण।”
- मतभेदों के बीच आम सहमति: मई 2026 में आयोजित ब्रिक्स विदेश मंत्रियों की बैठक संयुक्त वक्तव्य जारी करने में विफल रही थी। इसके बावजूद शिखर सम्मेलन में संयुक्त घोषणा-पत्र को अपनाया गया। यह विशेष रूप से ईरान–यूएई संघर्ष को लेकर मतभेदों के बीच भारत की आम सहमति निर्माण की भूमिका को दर्शाता है।
- अगला अध्यक्ष: चीन 2027 में ब्रिक्स की अध्यक्षता संभालेगा और 19वें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन की मेजबानी करेगा।
नई दिल्ली घोषणा-पत्र: प्रमुख परिणाम
- नई दिल्ली घोषणा-पत्र में राजनीतिक, सुरक्षा, आर्थिक, तकनीकी, पर्यावरणीय और विकासात्मक मुद्दों को शामिल किया गया है। इसके प्रमुख परिणामों में शामिल हैं:

भारत की ब्रिक्स अध्यक्षता: प्रमुख पहल
- डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना: सदस्य देशों के बीच डीपीआई समाधानों के ज्ञान-साझाकरण और अपनाने को सुगम बनाने के लिए ब्रिक्स डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI) रिपॉजिटरी और पायलट परियोजनाओं का प्रस्ताव रखा गया।
- स्वास्थ्य एवं मानव विकास: बड़े पैमाने पर संक्रामक रोगों के लिए संक्रामक रोगों के लिए ब्रिक्स एकीकृत प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली तथा ब्रिक्स स्वस्थ जीवनशैली मिशन (2026–2029) को आगे बढ़ाया गया। मानसिक स्वास्थ्य के क्षेत्र में उत्कृष्टता केंद्रों के ब्रिक्स नेटवर्क का भी समर्थन किया गया, जिसमें निमहांस (NIMHANS) को समन्वय केंद्र बनाया गया।
- उद्योग, एमएसएमई एवं कौशल विकास: उद्योग 4.0 और उन्नत डिजिटल-उत्पादन प्रौद्योगिकियों के लिए भारत स्थित ब्रिक्स औद्योगिक दक्षता केंद्र (ICBIC) की स्थापना की गई। इसके साथ ही एमएसएमई सहयोग और कौशल विकास से संबंधित पहलों को भी आगे बढ़ाया गया।
- वित्त एवं विकास: प्रस्तावित ब्रिक्स जोखिम प्रयोगशाला (BRICS Risk Lab), गिफ्ट सिटी, ब्रिक्स विकास एवं वृद्धि कार्यबल तथा ब्रिक्स–एनडीबी ज्ञान पोर्टल को आगे बढ़ाया गया।
- विकास-केंद्रित एजेंडा: भारत ने 50 से अधिक ठोस परिणाम हासिल करने की दिशा में कार्य किया, जिनमें ढाँचे, कार्ययोजनाएँ, दिशानिर्देश, सिद्धांत, मंच और नेटवर्क शामिल हैं। ये पहल लचीलापन, नवाचार, सहयोग और स्थिरता की चार प्राथमिकताओं पर केंद्रित रहीं।

भारत और वैश्विक दक्षिण के लिए महत्त्व
- रणनीतिक स्वायत्तता: ब्रिक्स भारत को प्रमुख शक्तियों और उभरती अर्थव्यवस्थाओं के साथ एक साथ जुड़ने में सक्षम बनाता है, जिससे बढ़ते भू-राजनीतिक विखंडन के बीच भारत का कूटनीतिक दायरा विस्तृत होता है।
- वैश्विक दक्षिण का नेतृत्व: विस्तारित समूह भारत को वित्त, व्यापार, प्रौद्योगिकी, जलवायु और विकास से संबंधित विकासशील देशों की चिंताओं को प्रभावी ढंग से उठाने तथा भारत के विकास अनुभव को साझा करने के लिए एक मजबूत मंच प्रदान करता है।
- सुधारित बहुपक्षवाद: ब्रिक्स भारत की इस मांग को मजबूत करता है कि संयुक्त राष्ट्र, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष (IMF), विश्व बैंक और विश्व व्यापार संगठन (WTO) सहित वैश्विक संस्थाओं में विकासशील देशों को अधिक प्रतिनिधित्व दिया जाए।
- आर्थिक एवं तकनीकी लचीलापन: स्थानीय मुद्रा में भुगतान, लचीली आपूर्ति शृंखलाएँ, महत्त्वपूर्ण खनिज, डिजिटल सार्वजनिक अवसंरचना (DPI), कृत्रिम बुद्धिमत्ता (AI), स्वास्थ्य और उन्नत उद्योगों में सहयोग दक्षिण-दक्षिण आर्थिक एवं तकनीकी सहयोग को मजबूत कर सकता है।
- विकास-केंद्रित सहयोग: भारत की अध्यक्षता ने ब्रिक्स को केवल भू-राजनीतिक समूह के बजाय एक पूरक एवं विकास-केंद्रित मंच के रूप में स्थापित करने का प्रयास किया, जो वैश्विक दक्षिण के लिए व्यावहारिक और व्यापक स्तर पर लागू किए जा सकने वाले समाधानों पर केंद्रित हो।
