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सामान्य अध्ययन-3: विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी—विकास तथा उनके अनुप्रयोग और दैनिक जीवन पर प्रभाव; विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में भारतीयों की उपलब्धियाँ।

संदर्भ: आदित्य-L1 के प्रेक्षणों का उपयोग करने वाले एक नए अध्ययन में सौर सक्रिय क्षेत्रों में बड़ी सौर ज्वालाओं से कुछ घंटे पहले होने वाली छोटी एवं अल्पकालिक चमक की पहचान की गई है। इससे सौर ज्वालाओं के निर्माण की प्रक्रिया को समझने और अंतरिक्ष-मौसम के पूर्वानुमान में सुधार के लिए नई जानकारी प्राप्त हुई है।

आदित्य-L1 अध्ययन में क्या पाया गया?

  • ज्वाला-पूर्व क्षणिक घटनाएँ: शोधकर्ताओं ने प्रमुख सौर ज्वालाओं से पहले के घंटों के दौरान सक्रिय क्षेत्रों में अनेक छोटी एवं अल्पकालिक क्षणिक चमक का पता लगाया।
  • स्थानीयकृत पूर्ववर्ती गतिविधि: ये घटनाएँ उन्हीं स्थानों के आसपास केंद्रित थीं, जहाँ बाद में प्रमुख सौर ज्वालाएँ उत्पन्न हुईं, जो ज्वाला के विकास के साथ इनके स्थानिक संबंध को दर्शाता है।
  • चुंबकीय ऊर्जा का विमोचन: कुछ क्षणिक घटनाओं में संबंधित एक्स-किरण संकेत भी पाए गए, जिससे संकेत मिलता है कि इनमें चुंबकीय ऊर्जा का छोटे पैमाने पर विमोचन हुआ।
  • सौर ज्वाला के निर्माण की संभावित प्रक्रिया: निष्कर्षों से संकेत मिलता है कि छोटे पैमाने पर बार-बार होने वाले ऊर्जा विमोचन से सक्रिय क्षेत्र में चुंबकीय क्षेत्र धीरे-धीरे अस्थिर हो सकते हैं, जो अंततः एक बड़ी सौर ज्वाला के निर्माण में योगदान दे सकते हैं।
  • शोध सहयोग: इस अध्ययन का नेतृत्व मणिपाल प्राकृतिक विज्ञान केंद्र और मणिपाल उच्च शिक्षा अकादमी के शोधकर्ताओं ने किया। इसमें भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन/अंतरिक्ष विभाग तथा अन्य शैक्षणिक संस्थानों के वैज्ञानिक भी शामिल थे। यह अध्ययन रॉयल एस्ट्रोनॉमिकल सोसाइटी की मासिक पत्रिका में प्रकाशित हुआ।

आदित्य-L1 के बारे में

  • भारत की पहली समर्पित सौर वेधशाला: आदित्य-L1 सूर्य के व्यापक अध्ययन के लिए समर्पित भारत का पहला अंतरिक्ष-आधारित वेधशाला श्रेणी का मिशन है। इसे 2 सितंबर 2023 को पीएसएलवी-C57 के माध्यम से प्रक्षेपित किया गया था।
  • एल1 का अनुकूल स्थान: यह अंतरिक्ष यान सूर्य-पृथ्वी के L1 बिंदु के चारों ओर प्रभामंडल कक्षा में कार्य करता है, जो पृथ्वी से लगभग 15 लाख किमी दूर स्थित है।
  • प्रमुख लाभ: इसका स्थान सूर्य का निरंतर और निर्बाध अवलोकन संभव बनाता है, क्योंकि यहाँ सूर्य पेलोड के सामने किसी ग्रह या उपग्रह के आने अथवा ग्रहण की स्थिति उत्पन्न नहीं होती। साथ ही, यह सौर विकिरण और चुंबकीय विक्षोभों का पृथ्वी के वायुमंडल एवं चुंबकीय क्षेत्र से प्रभावित होने से पहले ही अवलोकन करने में सक्षम बनाता है।
  • सात पेलोड: आदित्य-L1 में स्वदेश में विकसित सात पेलोड लगाए गए हैं—इनमें से पाँच का विकास भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (इसरो) ने तथा दो का विकास इसरो के सहयोग से भारतीय शैक्षणिक संस्थानों ने किया है।
  • मिशन का उद्देश्य: यह सूर्य की विभिन्न परतों और घटनाओं का अध्ययन करता है, जिनमें प्रकाशमंडल, वर्णमंडल और किरीटमंडल, साथ ही सौर ज्वालाएँ, कोरोनल मास इजेक्शन (सीएमई), सौर पवन तथा अंतरिक्ष-मौसम अनुसंधान से संबंधित अन्य प्रक्रियाएँ शामिल हैं।

आदित्य-L1 ने इन शुरुआती संकेतों का पता कैसे लगाया?

  • SUIT: यह पेलोड 11 निकट-पराबैंगनी फिल्टरों के माध्यम से सूर्य का अवलोकन करता है। यह सूर्य के ऊपरी प्रकाशमंडल से लेकर वर्णमंडल तक की परतों का अध्ययन करता है।
  • SoLEXS और HEL1OS: ये दोनों पेलोड सौर किरीटमंडल में ऊर्जावान प्रक्रियाओं से संबंधित एक्स-किरण उत्सर्जन को मापते हैं।
  • बहु-तरंगदैर्ध्य प्रेक्षण: निकट-पराबैंगनी और एक्स-किरण प्रेक्षणों को एक साथ मिलाने से वैज्ञानिक यह अध्ययन कर सके कि सौर वायुमंडल की निचली परतों में होने वाली गतिविधियाँ सौर ज्वाला के निर्माण के दौरान किरीटमंडल में होने वाले ऊर्जा विमोचन से किस प्रकार जुड़ी हैं।
  • अंतरिक्ष-आधारित निकट-पराबैंगनी प्रेक्षण क्यों महत्त्वपूर्ण हैं: निकट-पराबैंगनी विकिरण के बड़े हिस्से का पृथ्वी से प्रेक्षण कठिन है, क्योंकि पृथ्वी का वायुमंडल पराबैंगनी विकिरण को अवशोषित कर लेता है। इसलिए अंतरिक्ष से किए गए प्रेक्षण विशेष रूप से महत्त्वपूर्ण हैं।

सौर ज्वालाओं एवं अंतरिक्ष-मौसम को समझना

  • सौर ज्वालाएँ: सूर्य से विद्युतचुंबकीय विकिरण के अचानक और तीव्र विस्फोट को सौर ज्वाला कहा जाता है। ये संचित चुंबकीय ऊर्जा के विमोचन से संबंधित होती हैं।
  • सक्रिय क्षेत्र: सौर ज्वालाएँ मुख्य रूप से चुंबकीय रूप से सक्रिय क्षेत्रों में उत्पन्न होती हैं, जहाँ जटिल चुंबकीय क्षेत्र बड़ी मात्रा में ऊर्जा को संचित कर सकते हैं और फिर उसे मुक्त कर सकते हैं।
  • ज्वाला का वर्गीकरण: एक्स-किरणों की तीव्रता के आधार पर सौर ज्वालाओं को A, B, C, M और X वर्गों में बाँटा जाता है। इनमें X वर्ग की ज्वालाएँ सबसे अधिक तीव्र होती हैं।
  • अंतरिक्ष-मौसम: सौर गतिविधियाँ पृथ्वी के निकट के अंतरिक्ष वातावरण को प्रभावित कर सकती हैं। इससे रेडियो संचार, नौवहन प्रणालियों और उपग्रहों पर प्रभाव पड़ सकता है। साथ ही, अंतरिक्ष यात्रियों और अंतरिक्ष यानों के लिए विकिरण का जोखिम बढ़ सकता है।
  • कोरोनल मास इजेक्शन: सौर ज्वालाओं के साथ कोरोनल मास इजेक्शन (CMEs) भी हो सकते हैं। यदि ये पृथ्वी की ओर निर्देशित हों, तो पृथ्वी के निकट अंतरिक्ष वातावरण में महत्वपूर्ण विक्षोभ उत्पन्न कर सकते हैं।

निष्कर्षों का महत्त्व

  • पहले चेतावनी मिलने की संभावना: ज्वाला से पहले बार-बार दिखाई देने वाले संकेतों की पहचान से सौर ज्वाला के पूर्वानुमान में प्रमुख विस्फोट से पहले दिखाई देने वाले चेतावनी संकेतों की पहचान को शामिल किया जा सकता है।
  • बेहतर अंतरिक्ष-मौसम तैयारी: अधिक विश्वसनीय सौर ज्वाला पूर्वानुमान से उपग्रहों, संचार एवं नौवहन प्रणालियों, अंतरिक्ष यात्रियों तथा अन्य महत्त्वपूर्ण प्रौद्योगिकियों की सुरक्षा के लिए अतिरिक्त समय मिल सकता है।
  • सौर ज्वाला के आरंभ की समझ: ये प्रेक्षण इस संभावना को मजबूत करते हैं कि छोटे पैमाने पर बार-बार होने वाले ऊर्जा विमोचन से प्रमुख सौर ज्वालाओं से पहले चुंबकीय क्षेत्रों में क्रमिक अस्थिरता उत्पन्न होती है।
  • भारत की सौर-विज्ञान क्षमता को मजबूती: यह अध्ययन आदित्य-L1 के विभिन्न तरंगदैर्ध्यों में किए गए प्रेक्षणों के वैज्ञानिक महत्त्व को प्रदर्शित करता है और सौर भौतिकी तथा अंतरिक्ष-मौसम अनुसंधान के क्षेत्र में भारत की क्षमताओं को मजबूत करता है।
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