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सामान्य अध्ययन-3: देशज रूप से प्रौद्योगिकी का विकास एवं नई प्रौद्योगिकी का विकास; सीमावर्ती क्षेत्रों में सुरक्षा संबंधी चुनौतियाँ एवं उनका प्रबंधन।
संदर्भ: भारत ने अमेरिका के साथ प्रस्ताव एवं स्वीकृति पत्र (LOA) पर हस्ताक्षर किए हैं। इसके तहत विदेशी सैन्य बिक्री (FMS) मार्ग के माध्यम से भारतीय सेना के लिए जेवलिन एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल (ATGM) प्रणाली की खरीद की जाएगी।
भारत-अमेरिका जेवलिन समझौते की मुख्य बिंदु
- समझौता: भारतीय सेना ने 28 अगस्त 2026 को प्रस्ताव एवं स्वीकृति पत्र पर हस्ताक्षर किए, जिससे भारत अमेरिकी FMS कार्यक्रम के तहत जेवलिन प्रणाली का ग्राहक बन गया।
- खरीद पैकेज: इस समझौते के तहत लगभग 100 FGM-148 जेवलिन एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल प्रणालियों की खरीद की जाएगी, जिसकी अनुमानित लागत 93 मिलियन अमेरिकी डॉलर है।
- परिचालन क्षमता: इस खरीद का उद्देश्य भारतीय सेना की मैन-पोर्टेबल एंटी-आर्मर क्षमता को मजबूत करना है। जेवलिन एक उन्नत ‘फायर-एंड-फॉरगेट’ (दागो और भूल जाओ) प्रणाली है, जिसका उपयोग बख्तरबंद लक्ष्यों को निशाना बनाने के लिए किया जाता है।
- औद्योगिक सहयोग: यह समझौता भारतीय और अमेरिकी कंपनियों के बीच पारस्परिक रूप से लाभकारी सह-उत्पादन तथा व्यापक रक्षा-औद्योगिक सहयोग की संभावनाओं पर चर्चा का मार्ग प्रशस्त करता है।
- लंबे समय से लंबित खरीद: भारत की जेवलिन प्रणाली में रुचि 2010 से रही है। प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और उत्पादन व्यवस्था को लेकर मतभेदों के कारण पहले के प्रयास आगे नहीं बढ़ सके थे। इसके बाद भारत ने इज़राइल की स्पाइक एंटी टैंक गाइडेड मिसाइल प्रणाली की खरीद की दिशा में कदम बढ़ाया।
जेवलिन एंटी-टैंक मिसाइल प्रणाली को समझना
- जेवलिन (FGM-148) एक एकल-सैनिक द्वारा संचालित, मैन-पोर्टेबल, मध्यम दूरी की ‘फायर-एंड-फॉरगेट’ एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल (ATGM) है, जिसे बख्तरबंद वाहनों और मजबूत किलेबंद ठिकानों को निशाना बनाने के लिए डिजाइन किया गया है। इसका निर्माण आरटीएक्स और लॉकहीड मार्टिन के जेवलिन संयुक्त उपक्रम द्वारा किया जाता है।
- फायर-एंड-फॉरगेट क्षमता: इसमें लगा इन्फ्रारेड सीकर प्रक्षेपण से पहले लक्ष्य को लॉक में सक्षम बनाता है। मिसाइल दागे जाने के बाद स्वयं लक्ष्य की ओर निर्देशित होती है, जिससे ऑपरेटर तुरंत सुरक्षित स्थान ले सकता है या अपनी स्थिति बदल सकता है।
- टॉप-अटैक क्षमता: मिसाइल बख्तरबंद वाहनों की ऊपरी सतह को निशाना बना सकती है, जहाँ सामान्यतः सुरक्षा अपेक्षाकृत कमजोर होती है। इसके अतिरिक्त, इसमें सीधे-अटैक मोड में संचालन की क्षमता भी होती है।
- सॉफ्ट-लॉन्च: इसकी सॉफ्ट-लॉन्च प्रणाली बंद या सीमित स्थानों से भी मिसाइल दागने की सुविधा देती है, जिससे पैदल सेना की सामरिक क्षमता और लचीलापन बढ़ता है।
- स्वदेशी क्षमता की पूरक: जेवलिन भारत को तत्काल आयातित एंटी-टैंक क्षमता प्रदान करती है, जबकि भारत की स्वदेशी मैन-पोर्टेबल एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल (MPATGM) प्रणाली को सेना में शामिल किए जाने की दिशा में विकास जारी है। इस प्रकार, भारत दीर्घकालिक आत्मनिर्भरता/स्वदेशीकरण के लक्ष्य को बनाए रखते हुए अपनी अल्पकालिक आवश्यकताओं को पूरा कर सकता है।
समझौते का महत्व
- तत्काल क्षमता की कमी को पूरा करना: जेवलिन एक परिपक्व और युद्ध-परीक्षित एंटी-आर्मर क्षमता प्रदान करती है, जबकि भारत की स्वदेशी मैन-पोर्टेबल एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल प्रणाली अभी व्यापक स्तर पर सेना में शामिल किए जाने की दिशा में आगे बढ़ रही है।
- पैदल सैनिकों की उत्तरजीविता क्षमता में वृद्धि: मैन-पोर्टेबिलिटी, फायर-एंड-फॉरगेट मार्गदर्शन और टॉप-अटैक क्षमता का संयोजन एंटी-टैंक टीमों को बख्तरबंद लक्ष्यों पर हमला करने और लगातार मार्गदर्शन के लिए खुले में रुके बिना अपनी स्थिति बदलने में सक्षम बनाता है।
- रक्षा-औद्योगिक साझेदारी को मजबूत करना: यह सौदा पारंपरिक खरीदार-विक्रेता संबंध से आगे बढ़ते हुए सह-उत्पादन और भारतीय रक्षा उद्योग की अधिक भागीदारी का मार्ग प्रशस्त करता है।
- ‘खरीद–निर्माण’ के बीच संतुलन को दर्शाता है: यह अधिग्रहण भारत की उस आवश्यकता को दर्शाता है जिसमें तत्काल परिचालन आवश्यकताओं को आयात के माध्यम से पूरा करने के साथ-साथ दीर्घकालिक रूप से स्वदेशी रक्षा प्रौद्योगिकी एवं विनिर्माण क्षमताओं के विकास के लक्ष्य के बीच संतुलन स्थापित करना आवश्यक है।
चुनौतियाँ और चिंताएँ
- आयात पर निर्भरता: विदेशी खरीद से पुनःपूर्ति, स्पेयर पार्ट्स और जीवनचक्र संबंधी सहायता के लिए बाहरी आपूर्तिकर्ताओं पर निर्भरता बढ़ सकती है।
- प्रौद्योगिकी हस्तांतरण संबंधी चिंताएँ: जेवलिन को लेकर भारत की पिछली वार्ताएँ प्रौद्योगिकी हस्तांतरण से जुड़े मतभेदों से प्रभावित हुई थीं। इसलिए, भविष्य में होने वाला औद्योगिक सहयोग केवल असेंबली तक सीमित न रहकर वास्तविक घरेलू तकनीकी एवं विनिर्माण क्षमता विकसित करने वाला होना चाहिए।
- सीमित पैमाना: जेवलिन प्रणालियों की तत्काल खरीद अकेले भारतीय सेना की आधुनिक बख्तरबंद रोधी हथियार की व्यापक दीर्घकालिक आवश्यकता को पूरा नहीं कर सकती।
- खरीद प्रक्रिया में देरी: जेवलिन की 16 वर्षों की यात्रा यह दर्शाती है कि परिचालन संबंधी तात्कालिकता, प्रौद्योगिकी हस्तांतरण की अपेक्षाओं और स्वदेशी विकास की समय-सीमा के बीच संतुलन स्थापित करना कितना चुनौतीपूर्ण है।
आगे की राह
- शीघ्र सैन्यीकरण/तैनाती सुनिश्चित करना: तत्काल परिचालन आवश्यकता को पूरा करने के लिए आपूर्ति, प्रशिक्षण और लॉजिस्टिक्स सहायता की प्रक्रिया में तेजी लाई जानी चाहिए।
- औद्योगिक लाभ को अधिकतम करना: इस खरीद का उपयोग भारत में विनिर्माण, कलपुर्जा उत्पादन, रखरखाव तथा जीवनचक्र संबंधी सहायता की क्षमताओं को विकसित करने के लिए किया जाना चाहिए।
- स्वदेशी एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल के विकास में तेजी: मैन-पोर्टेबल एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल तथा अन्य स्वदेशी एंटी-आर्मर प्रणालियों के विकास और सेना में शामिल किए जाने की प्रक्रिया को तेज किया जाना चाहिए।
- बहु-स्तरीय एंटी-आर्मर क्षमता विकसित करना: एंटी-टैंक गाइडेड मिसाइल को ड्रोन, युद्धक्षेत्र निगरानी प्रणालियों, सटीक मारक हथियारों और वाहन-आधारित प्रणालियों के साथ एकीकृत किया जाना चाहिए।
- रक्षा खरीद प्रक्रिया में सुधार: लंबे समय तक चली खरीद प्रक्रिया से मिले अनुभवों से सीख लेते हुए प्रौद्योगिकी हस्तांतरण और स्वदेशीकरण के उद्देश्यों को ध्यान में रखते हुए अनावश्यक देरी को कम किया जाना चाहिए।
