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सामान्य अध्ययन-2: संघ और राज्यों के कार्य एवं उत्तरदायित्व; संघीय ढाँचे से संबंधित मुद्दे एवं चुनौतियाँ।

संदर्भ: बिहार और झारखंड ने सोन नदी के जल – बँटवारे को लेकर लगभग 25 वर्ष पुराने विवाद को सुलझाने के लिए एक समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किए हैं। इसके तहत अविभाजित बिहार को पहले आवंटित 7.75 मिलियन एकड़-फीट (MAF) जल हिस्से का बँटवारा किया गया है।

सोन जल-बँटवारा समझौते के प्रमुख बिंदु

• समझौता ज्ञापन एवं आवंटन: 31 अगस्त 2026 को हस्ताक्षरित इस समझौते के तहत अविभाजित बिहार के 7.75 मिलियन एकड़-फीट (MAF) जल आवंटन में से 5.75 MAF बिहार और 2 MAF झारखंड को मिलेगा।

• लाभान्वित क्षेत्र: इससे बिहार के भोजपुर, बक्सर, रोहतास, कैमूर, औरंगाबाद, अरवल, गया और पटना तथा झारखंड के पलामू, गढ़वा और अन्य क्षेत्रों में सिंचाई एवं पेयजल की उपलब्धता में सुधार होगा।

• बुनियादी ढाँचा: इस समझौते से लंबे समय से लंबित इंद्रपुरी जलाशय परियोजना को आगे बढ़ाने में मदद मिलने की उम्मीद है, जिसका उद्देश्य बिहार के आठ जिलों में सिंचाई व्यवस्था को सुदृढ़ करना है।

• 2026 का चौथा समझौता: यह समझौता केंद्र के संवाद-आधारित दृष्टिकोण के माध्यम से वर्ष 2026 में कराए गए चौथे प्रमुख अंतर्राज्यीय समझौते के रूप में सामने आया है:

  • नर्मदा: महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान और मध्य प्रदेश के बीच बकाया लागत-साझाकरण देनदारियों का एकमुश्त निपटारा।
  • यमुना: राजस्थान–हरियाणा समझौते के तहत यमुना जल परियोजना के कार्यान्वयन पर सहमति, जिसमें राजस्थान को लगभग 580 MCM जल पहुँचाना शामिल है।
  • किशाऊ: किशाऊ बहुउद्देशीय परियोजना पर हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, दिल्ली, उत्तर प्रदेश, हरियाणा और राजस्थान के बीच सहमति।

सोन नदी: भूगोल एवं महत्त्व

• उद्गम एवं प्रवाह: सोन नदी का उद्गम मध्य प्रदेश में मैकल श्रेणी की अमरकंटक पहाड़ियों से होता है। यह मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, झारखंड और बिहार से होकर बहती हुई पटना के निकट गंगा नदी में मिल जाती है। इसकी कुल लंबाई लगभग 784 किमी है।

• सहायक नदियाँ: इसकी प्रमुख सहायक नदियों में रिहंद, कनहर, उत्तरी कोयल, बनास और गोपद शामिल हैं।

• गंगा नदी तंत्र: यह गंगा की एक प्रमुख दाएँ तट की सहायक नदी है, जो गंगा के मैदान में प्रवेश करने से पहले प्रायद्वीपीय पठार के कुछ हिस्सों को अपवाहित करती है।

• सिंचाई में महत्त्व: यह नदी बिहार की कृषि के लिए महत्त्वपूर्ण है, विशेष रूप से सोन नहर प्रणाली के माध्यम से। इसलिए इसके जल का विनियमित उपयोग क्षेत्र की सिंचाई और ग्रामीण अर्थव्यवस्था के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण है।

सोन जल विवाद को समझना

• 1973 का बाणसागर समझौता: मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश और अविभाजित बिहार ने सोन नदी के जल – बँटवारे तथा बाणसागर बाँध की लागत के बँटवारे पर सहमति व्यक्त की थी।

  • कुल 14.25 MAF जल में से अविभाजित बिहार को 7.75 MAF, जबकि मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश को क्रमशः 5.25 MAF और 1.25 MAF आवंटित किया गया था।

• विभाजन के बाद का मुद्दा: वर्ष 2000 में झारखंड के गठन के बाद भी 7.75 MAF का आवंटन अविभाजित बिहार के पास ही रहा, जिससे यह प्रश्न अनसुलझा रह गया कि उत्तराधिकारी राज्य को इसका कितना हिस्सा मिलना चाहिए।

• विकास संबंधी गतिरोध: झारखंड द्वारा अपने हिस्से को स्पष्ट रूप से निर्धारित करने की माँग को इंद्रपुरी जलाशय परियोजना के लिए उसकी सहमति रोकने से जोड़ा गया, जिससे परियोजना के कार्यान्वयन में लंबे समय तक देरी हुई।

• समझौते की दिशा में कदम: समाधान की दिशा में महत्वपूर्ण प्रगति पूर्वी क्षेत्रीय परिषद के माध्यम से हुई। इसके बाद तकनीकी विचार-विमर्श किया गया तथा केंद्रीय जल आयोग  की भागीदारी से एक मसौदा तैयार एवं अनुमोदित किया गया।

समझौते का महत्त्व

• सिंचाई अवसंरचना को गति: जल आवंटन को लेकर स्पष्टता से इंद्रपुरी जलाशय परियोजना को आगे बढ़ाने में मदद मिल सकती है, जिससे बिहार के आठ जिलों में सिंचाई व्यवस्था सुदृढ़ होगी।

• जल की उपलब्धता में सुधार: इस समझौते से बिहार और झारखंड के ग्रामीण तथा सूखाग्रस्त क्षेत्रों में सिंचाई एवं पेयजल की उपलब्धता बढ़ने की उम्मीद है।

• सहकारी संघवाद को बढ़ावा: यह समझौता लंबे समय से चले आ रहे संसाधन संबंधी विवादों को सुलझाने में अंतर्राज्यीय संवाद, तकनीकी परामर्श और सहमति-निर्माण की क्षमता को दर्शाता है।

• व्यापक विकासात्मक लाभ: जल की बेहतर उपलब्धता से दोनों राज्यों के विशेष रूप से पठारी और सूखा प्रभावित क्षेत्रों में कृषि, ग्रामीण विकास तथा पेयजल सुरक्षा को बढ़ावा मिल सकता है।

आगे की राह

• वार्ता-आधारित तंत्र को मजबूत करना: जल विवादों के गंभीर रूप लेने से पहले ही समयबद्ध संवाद सुनिश्चित करने के लिए अंतर्राज्यीय परिषद और क्षेत्रीय परिषदों का उपयोग किया जाना चाहिए।

• डेटा साझाकरण को संस्थागत रूप देना: वास्तविक जल उपलब्धता को लेकर विवादों को कम करने के लिए नदी प्रवाह मापन, जलवैज्ञानिक आँकड़ों के साझाकरण और निगरानी की संयुक्त रूप से स्वीकृत प्रणालियाँ विकसित की जानी चाहिए।

• जल आवंटन को नदी बेसिन प्रबंधन से जोड़ना: जल-बँटवारे की व्यवस्थाओं को पूरे नदी बेसिन में सिंचाई, पेयजल, पारिस्थितिकीय एवं भूजल आवश्यकताओं के अनुरूप बनाया जाना चाहिए।

• जल उपयोग दक्षता में सुधार: सतही जल संसाधनों पर दबाव कम करने के लिए सूक्ष्म सिंचाई, जलग्रहण क्षेत्र प्रबंधन और भूजल पुनर्भरण को बढ़ावा दिया जाना चाहिए।

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