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सामान्य अध्ययन-3: भारतीय अर्थव्यवस्था, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास और रोजगार से संबंधित विषय।
संदर्भ: भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) ने वर्ष 2004 से रुकी हुई नए शहरी सहकारी बैंकों (UCBs) को लाइसेंस देने की प्रक्रिया को फिर से शुरू करने का प्रस्ताव रखा है। इसका उद्देश्य वित्तीय और शासन संबंधी सुदृढ़ता सुनिश्चित करने के लिए कठोर प्रवेश मानदंड निर्धारित करना है।
प्रस्तावित ढाँचे के बारे में
- ऑन-टैप लाइसेंसिंग: भारतीय रिज़र्व बैंक ने निरंतर लाइसेंसिंग ढाँचे के माध्यम से नए शहरी सहकारी बैंकों को लाइसेंस देने की प्रक्रिया फिर से शुरू करने का प्रस्ताव रखा है। हितधारकों से परामर्श के बाद विस्तृत दिशानिर्देश जारी किए जाएंगे।
- पात्र संस्थाएँ: प्रस्ताव में बड़ी, वित्तीय रूप से सुदृढ़ और अच्छी तरह से प्रबंधित सहकारी ऋण समितियों को प्राथमिकता दी गई है, क्योंकि अतीत में शहरी सहकारी बैंकों की अधिकांश विफलताएँ छोटी संस्थाओं से संबंधित रही हैं।
- वित्तीय मानदंड: प्रस्तावित आवेदकों के पास लाइसेंस के समय न्यूनतम ₹300 करोड़ की पूंजी, कम-से-कम 12% CRAR और 3% से अधिक शुद्ध गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां नहीं होना चाहिए।
- रिकॉर्ड एवं कार्यक्षेत्र: आवेदकों का कम-से-कम 10 वर्षों का सक्रिय परिचालन और कम-से-कम पाँच वर्षों का अच्छा वित्तीय रिकॉर्ड होना चाहिए; व्यापक और अधिक विविध ग्राहक आधार के कारण बहु-राज्यीय सहकारी ऋण समितियों को प्राथमिकता दी जा सकती है।
शहरी सहकारी बैंकों (UCBs) के बारे में
- प्रकृति: शहरी सहकारी बैंक, प्राथमिक सहकारी बैंकों के रूप में लाइसेंस प्राप्त सहकारी समितियाँ हैं, जो बैंकिंग विनियमन अधिनियम, 1949 के तहत बैंकिंग व्यवसाय करती हैं।
- वर्तमान स्थिति: 31 मार्च 2025 तक, भारत में 1,457 शहरी सहकारी बैंकों थे, जिनकी कुल परिसंपत्तियाँ ₹7.38 लाख करोड़ और जमा ₹5.84 लाख करोड़ थी।
- भूमिका: ये मुख्य रूप से शहरी और अर्ध-शहरी समुदायों को सेवाएँ प्रदान करते हैं, स्थानीय स्तर पर ऋण और बैंकिंग सेवाएँ उपलब्ध कराते हैं तथा वित्तीय समावेशन को बढ़ावा देते हैं।
- दोहरे नियंत्रण की व्यवस्था: भारतीय रिज़र्व बैंक बैंकिंग कार्यों को विनियमित करता है, जबकि राज्य/केंद्रीय सहकारी प्राधिकरण सहकारी/प्रशासनिक पहलुओं की निगरानी करते हैं, जिससे दोहरे नियंत्रण की व्यवस्था बनती है।
- विनियामक वर्गीकरण: भारतीय रिज़र्व बैंक जमा राशि के आकार के आधार पर चार-स्तरीय ढाँचे का पालन करता है, जिसमें टियर 1 (<₹100 करोड़) से लेकर टियर 4 (≥₹10,000 करोड़) तक शामिल हैं।
शहरी सहकारी बैंकों को लाइसेंस देना क्यों निलंबित किया गया था?
- तेजी से विस्तार और कमजोर संस्थाएँ: 1993 में उदारीकरण के कारण शहरी सहकारी बैंकों का तेजी से विस्तार हुआ; 1993–2001 के बीच लाइसेंस प्राप्त 823 शहरी सहकारी बैंकों में से 31% बाद में वित्तीय रूप से कमजोर हो गए।
- शासन एवं जोखिम संबंधी विफलताएँ: कई शहरी सहकारी बैंकों को कमजोर शासन, अपर्याप्त जोखिम प्रबंधन, प्रबंधन द्वारा धोखाधड़ी और वित्तीय अनियमितताओं का सामना करना पड़ा, विशेष रूप से छोटी संस्थाओं में।
- बैंक विफलताएँ एवं जमाकर्ताओं की चिंताएँ: वित्तीय रूप से कमजोर शहरी सहकारी बैंकों और बैंक विफलताओं ने जमाकर्ताओं की सुरक्षा और वित्तीय स्थिरता को लेकर चिंताएँ बढ़ाईं, जिससे समेकन और मजबूत विवेकपूर्ण सुरक्षा उपायों की आवश्यकता उत्पन्न हुई।
- विनियामक सीमाएँ: दोहरे नियंत्रण की व्यवस्था, जिसमें शहरी सहकारी बैंकों बैंकिंग कार्यों की निगरानी करता था और सहकारी प्राधिकरण प्रबंधन से संबंधित मामलों को देखते थे, ने विनियामक चुनौतियाँ उत्पन्न कीं तथा एक मजबूत कानूनी और पर्यवेक्षी ढाँचे की आवश्यकता को उजागर किया।
भारतीय रिज़र्व बैंक, शहरी सहकारी बैंकों को लाइसेंस देना फिर से क्यों शुरू कर रहा है?
- वित्तीय स्थिति में सुधार: मार्च 2025 तक, शहरी सहकारी बैंकों का औसत CRAR बढ़कर 18% हो गया था, 92% शहरी सहकारी बैंकों का CRAR 12% से अधिक था, जबकि शुद्ध गैर-निष्पादित परिसंपत्तियां 0.7% और प्रावधान कवरेज अनुपात 90.1% था।
- क्षेत्रीय समेकन: शहरी सहकारी बैंकों की संख्या दिसंबर 2003 में 2,104 से घटकर मार्च 2025 में 1,457 हो गई, जो विलय और गैर-व्यवहार्य संस्थाओं के बंद होने के माध्यम से हुआ।
- मजबूत विनियामक ढाँचा: बैंकिंग विनियमन (संशोधन) अधिनियम, 2020 ने सहकारी बैंकों पर RBI की विनियामक शक्तियों को मजबूत किया, जबकि चार-स्तरीय ढाँचे ने विभेदित पर्यवेक्षण को सक्षम बनाया।
- वित्तीय समावेशन की आवश्यकता: भारतीय रिज़र्व बैंक के अनुसार, शहरी सहकारी बैंकों छोटे शहरों और दूरदराज के क्षेत्रों में सेवाएँ प्रदान कर सकते हैं, जबकि क्षेत्र की बेहतर वित्तीय और विनियामक स्थिति सावधानीपूर्वक नियंत्रित प्रवेश के लिए अधिक अवसर प्रदान करती है।
शहरी सहकारी बैंकों के लिए लाइसेंसिंग फिर से शुरू करने का महत्व
- वित्तीय समावेशन का विस्तार: नए शहरी सहकारी बैंकों छोटे शहरों और कम सेवा वाले शहरी/अर्ध-शहरी क्षेत्रों में औपचारिक बैंकिंग और ऋण तक पहुँच को बढ़ा सकते हैं।
- पैमाने एवं विविधीकरण को बढ़ावा: व्यापक भौगोलिक पहुँच वाली बड़ी संस्थाओं को प्राथमिकता देने से अधिक विविध ग्राहक आधार उपलब्ध हो सकता है और लचीलापन बेहतर हो सकता है।
- सहकारी बैंकिंग का पुनरोद्धार: वित्तीय रूप से सुदृढ़ सहकारी ऋण समितियों को पूर्ण बैंकिंग गतिविधियाँ संचालित करने के लिए एक विनियमित मार्ग प्राप्त होगा।
- समावेशन और विवेकपूर्ण स्थिरता के बीच संतुलन: कठोर पूंजी संबंधी मानदंड, परिसंपत्ति गुणवत्ता, शासन और ट्रैक रिकॉर्ड संबंधी आवश्यकताओं का उद्देश्य सहकारी संस्थाओं की स्थानीय पहुँच को मजबूत बैंकिंग मानकों के साथ जोड़ना है।
