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सामान्य अध्ययन-2: भारत से संबंधित और/अथवा भारत के हितों को प्रभावित करने वाले द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक समूह तथा करार|
सदर्भ: सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्की ने मक्का संयुक्त रक्षा समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं, जिसमें “एक पर हमला, सभी पर हमला” का प्रावधान शामिल है। इसके तहत तीनों देशों में से किसी एक पर सशस्त्र हमला, तीनों पर हमला माना जाएगा। इसकी तुलना नाटो के सामूहिक रक्षा सिद्धांत से की जा रही है।
अन्य संबंधित जानकारी

- यह समझौता पश्चिम एशिया में बढ़ते सुरक्षा तनावों के बीच हुआ है, जिसमें ईरान, इज़राइल और ईरान समर्थित समूहों से जुड़े हमले तथा खाड़ी देशों और क्षेत्रीय ऊर्जा मार्गों की सुरक्षा को लेकर बढ़ती चिंताएँ शामिल हैं।
- सामूहिक रक्षा प्रावधान के कारण इस समझौते को “नाटो-शैली” का बताया गया है।
- तुर्की ने संकेत दिया है कि इस ढाँचे का विस्तार अन्य देशों को शामिल करने के लिए किया जा सकता है। मिस्र, कतर और कुवैत उन देशों में शामिल हैं, जिनकी संभावित भागीदारी पर चर्चा की गई है।
मक्का संयुक्त रक्षा समझौते के बारे में
- समझौते में रक्षा सहयोग के सभी पहलुओं को मजबूत करने का प्रावधान है, जिसमें सैन्य समन्वय, संयुक्त रक्षा-उद्योग परियोजनाएँ, प्रौद्योगिकी साझेदारी, रक्षा खरीद और अधिक सैन्य अंतर-संचालनीयता शामिल हैं।
- सऊदी और तुर्की के अधिकारियों ने समझौते को पूरी तरह रक्षात्मक बताया है तथा जोर दिया है कि इसका उद्देश्य किसी सैन्य धुरी या सांप्रदायिक गुट की स्थापना करना अथवा किसी विशेष देश को निशाना बनाना नहीं है।
- यह समझौता तीनों देशों के बीच दीर्घकालिक सैन्य सहयोग पर आधारित है, जिसमें सऊदी–पाकिस्तान रक्षा संबंध तथा बढ़ता हुआ तुर्की–पाकिस्तान और सऊदी–तुर्की रक्षा-उद्योग सहयोग शामिल है।
प्रकृति और दायरा:
- स्वचालित सैन्य हस्तक्षेप नहीं: समझौते में सार्वजनिक रूप से किसी हमले की स्थिति में स्वचालित सैनिक तैनाती, सैन्य बलों की प्रतिबद्धता या सटीक सैन्य प्रतिक्रिया का उल्लेख नहीं किया गया है। इससे सहायता के स्वरूप और सीमा का निर्णय सदस्य देशों के बीच परामर्श के आधार पर होगा।
- संयुक्त कमान संरचना नहीं: नाटो के विपरीत, इसमें सार्वजनिक रूप से स्थायी एकीकृत सैन्य कमान संरचना या विस्तृत सामूहिक रक्षा प्रक्रियाओं की स्थापना नहीं की गई है।
- क्षेत्रीय विस्तार की संभावना: तुर्की ने तीनों हस्ताक्षरकर्ता देशों से आगे इस ढाँचे का विस्तार करने का इरादा व्यक्त किया है, जिससे एक व्यापक क्षेत्रीय सुरक्षा व्यवस्था का निर्माण संभावित है।
भारत के लिए निहितार्थ
- भारत–सऊदी अरब संबंधों पर प्रभाव: पाकिस्तान पर सऊदी अरब की अधिक सुरक्षा निर्भरता से रियाद में इस्लामाबाद का प्रभाव बढ़ सकता है और सऊदी अरब के साथ भारत के रणनीतिक, आर्थिक और ऊर्जा संबंध जटिल हो सकते हैं।
- पाकिस्तान का रणनीतिक और सैन्य प्रभाव: यह समझौता सऊदी अरब की आर्थिक शक्ति और तुर्की की सैन्य एवं रक्षा-औद्योगिक क्षमताओं को जोड़कर पाकिस्तान को मजबूत कर सकता है, जिससे भारत की सुरक्षा संबंधी गणनाएँ प्रभावित हो सकती हैं।
- क्षेत्रीय रक्षा संतुलन में बदलाव: सऊदी अरब–तुर्की–पाकिस्तान के बीच बढ़ता रक्षा सहयोग संयुक्त उत्पादन, प्रौद्योगिकी साझेदारी और सैन्य सहयोग का विस्तार कर सकता है, जिससे पाकिस्तान की पारंपरिक सैन्य क्षमताएँ संभावित रूप से मजबूत हो सकती हैं।
- चीन का कारक: यह समझौता पाकिस्तान के आसपास एक व्यापक गैर-पश्चिमी रक्षा तंत्र को सुदृढ़ कर सकता है, क्योंकि चीन के साथ पाकिस्तान के स्थापित रक्षा संबंध हैं तथा तुर्की और सऊदी अरब के साथ उसका सहयोग बढ़ रहा है।
- समुद्री और ऊर्जा सुरक्षा: फारस की खाड़ी, लाल सागर और अरब सागर में एक मजबूत सुरक्षा ढाँचा भारत की ऊर्जा आपूर्ति, समुद्री व्यापार और पश्चिमी हिंद महासागर में उसके हितों को प्रभावित कर सकता है।
- रणनीतिक अनिश्चितता और भविष्य में विस्तार: अन्य खाड़ी देशों तक विस्तार और गहरी सैन्य प्रतिबद्धताएँ समझौते के क्षेत्रीय प्रभाव को बढ़ा सकती हैं, जिसके लिए भारत को रणनीतिक स्वायत्तता बनाए रखने और खाड़ी देशों के साथ संबंधों को और मजबूत करने की आवश्यकता होगी।

