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सामान्य अध्ययन-3: बुनियादी ढाँचा: ऊर्जा; भारतीय अर्थव्यवस्था और यजना, संसाधनों को जुटाने, प्रगति, विकास और रोजगार से संबंधित विषय।
संदर्भ: केंद्रीय मंत्रिमंडल ने समुद्र मंथन – राष्ट्रीय अपतटीय अन्वेषण योजना को वित्त वर्ष 2030–31 तक कार्यान्वयन के लिए 84,084 करोड़ रुपये के परिव्यय के साथ मंजूरी दी है।
समुद्र मंथन (राष्ट्रीय अपतटीय अन्वेषण योजना) के बारे में

• समुद्र मंथन पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय (MoPNG) की एक केंद्रीय क्षेत्र योजना है, जिसे केंद्रीय मंत्रिमंडल द्वारा मंजूरी दी गई है।
• यह योजना प्रधानमंत्री द्वारा 2025 में स्वतंत्रता दिवस के संबोधन के दौरान लाल किले से व्यक्त किए गए आधुनिक समय के समुद्र मंथन के दृष्टिकोण को साकार करती है, जिसका उद्देश्य भारत की विशाल अपतटीय ऊर्जा क्षमता का दोहन करना है।
- यह भारत की ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने, घरेलू अन्वेषण एवं उत्पादन में तेजी लाने, तकनीकी नेतृत्व को बढ़ावा देने तथा विकसित भारत के दृष्टिकोण को आगे बढ़ाने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
- यह योजना संपूर्ण अपतटीय अन्वेषण मूल्य शृंखला में व्यापक हस्तक्षेपों को शामिल करती है, जिससे देश में अपतटीय अन्वेषण एवं उत्पादन में तेजी लाने के लिए एक एकीकृत पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण होगा।
योजना की प्रमुख विशेषताएँ
• अपतटीय भूकंपीय आँकड़ा अधिग्रहण: भूवैज्ञानिक समझ में सुधार के लिए सीमांत अपतटीय बेसिनों में उच्च-गुणवत्ता वाले भूकंपीय आँकड़ों का बड़े पैमाने पर अधिग्रहण, प्रसंस्करण और व्याख्या, साथ ही वैज्ञानिक ड्रिलिंग।
- अपतटीय आँकड़ा अधिग्रहण के लिए ₹28,534 करोड़ आवंटित किए गए हैं।
• गहरे जल और अति-गहरे जल में अन्वेषणात्मक ड्रिलिंग: लगभग 60 गहरे जल और अति-गहरे जल वाले अन्वेषणात्मक कुओं की ड्रिलिंग में तेजी लाई जाएगी। इसके लिए सरकार पात्र ड्रिलिंग लागत का 50% तक, प्रति कुएँ अधिकतम ₹675 करोड़ की सीमा के अधीन, सहायता प्रदान करेगी।
- अन्वेषणात्मक ड्रिलिंग के लिए ₹43,200 करोड़ आवंटित किए गए हैं।
• साझा अपतटीय अवसंरचना: खोजों के व्यावसायीकरण को सुविधाजनक बनाने के लिए साझा अपतटीय उत्पादन और निकासी अवसंरचना का विकास।
- साझा अवसंरचना से विकास लागत कम करके परियोजनाओं की व्यवहार्यता में सुधार होने की उम्मीद है। इसके लिए ₹10,000 करोड़ आवंटित किए गए हैं।
• तेल एवं गैस विनिर्माण और सेवा क्षेत्र: महत्वपूर्ण अपतटीय उपकरणों और विशिष्ट सेवाओं के घरेलू विनिर्माण एवं स्थानीयकरण को बढ़ावा देने के लिए एकीकृत तेल एवं गैस विनिर्माण और सेवा क्षेत्रों की स्थापना।
- यह पहल मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत के तहत स्वदेशी विनिर्माण को मजबूत करेगी। इसके लिए ₹2,000 करोड़ आवंटित किए गए हैं।
• एकीकृत अपतटीय अन्वेषण पारिस्थितिकी तंत्र: योजना में डिजिटल कार्यक्रम प्रबंधन, क्षमता निर्माण, प्रौद्योगिकी अपनाने, हितधारक सहभागिता और अंतरराष्ट्रीय संपर्क के लिए विशेष प्रावधान शामिल हैं।

- इन उपायों का उद्देश्य देश में अपतटीय अन्वेषण एवं उत्पादन के लिए एक एकीकृत पारिस्थितिकी तंत्र का निर्माण करना है।
योजना की आवश्यकता
• भारत की आयातित कच्चे तेल पर निर्भरता पिछले दशक में 77% से बढ़कर लगभग 88% हो गई है।
• भारत की प्राकृतिक गैस की आवश्यकता का लगभग 50% आयात किया जाता है।
• पुराने तेल और गैस क्षेत्रों में धीरे-धीरे उत्पादन में गिरावट के कारण घरेलू कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस का उत्पादन दबाव में बना हुआ है।
• भारत के अपतटीय तलछटी बेसिनों के बड़े हिस्से, विशेष रूप से गहरे जल और अति-गहरे जल वाले क्षेत्र, अभी भी कम अन्वेषित हैं।
• अपतटीय हाइड्रोकार्बन अन्वेषण में बहुत अधिक पूंजी की आवश्यकता, लंबी अवधि और महत्वपूर्ण भूवैज्ञानिक एवं वाणिज्यिक जोखिम शामिल होते हैं।
• अति-गहरे जल वाले क्षेत्रों (1,500 मीटर से अधिक जल गहराई) में एक कुएँ की ड्रिलिंग की लागत ₹950 करोड़ से ₹2,400 करोड़ तक हो सकती है, जबकि व्यावसायिक रूप से व्यवहार्य खोज की कोई गारंटी नहीं होती।
• उच्च अन्वेषण लागत और अनिश्चित परिणामों ने सीमांत अपतटीय अन्वेषण में निवेश को सीमित किया है।
• भारत की बढ़ती ऊर्जा मांग को पूरा करने के लिए कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस के नए घरेलू स्रोत आवश्यक हैं, ताकि आयात पर निर्भरता कम की जा सके और ऊर्जा सुरक्षा में सुधार किया जा सके।
योजना का महत्व
• ऊर्जा सुरक्षा को सुदृढ़ करने में सहायक: आयातित कच्चे तेल और प्राकृतिक गैस पर निर्भरता कम करती है तथा वैश्विक ऊर्जा बाजार में उतार-चढ़ाव के प्रति लचीलापन बढ़ाती है।
• अपतटीय हाइड्रोकार्बन संसाधनों का दोहन: गहरे जल, अति-गहरे जल और सीमांत बेसिनों में अन्वेषण को गति देती है तथा 600 मिलियन मीट्रिक टन से अधिक तेल समतुल्य (MMTOE) के भंडार में वृद्धि को सुगम बनाती है।
• घरेलू उत्पादन और तकनीकी क्षमताओं को बढ़ावा: घरेलू तेल और प्राकृतिक गैस उत्पादन में वृद्धि करती है तथा उन्नत अपतटीय अन्वेषण प्रौद्योगिकियों को बढ़ावा देती है।
• मेक इन इंडिया को बढ़ावा देने और रोजगार के अवसरों का सृजन करने में सहायक: मेक इन इंडिया और आत्मनिर्भर भारत के तहत स्वदेशी विनिर्माण को मजबूत करती है, अपतटीय उपकरणों एवं सेवाओं के स्थानीयकरण को बढ़ावा देती है तथा बड़े पैमाने पर रोजगार का सृजन करती है।
• निवेश और आर्थिक विकास को बढ़ावा देती है: अन्वेषण एवं उत्पादन मूल्य शृंखला में महत्वपूर्ण निवेश को प्रोत्साहित करती है, साझा अपतटीय अवसंरचना का विकास करती है तथा उद्योग, नवाचार और आर्थिक विकास के लिए दीर्घकालिक अवसरों का सृजन करती है।
