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सामान्य अध्ययन-3: किसानों की सहायता के लिए ई-प्रौद्योगिकी; प्रौद्योगिकी मिशन।

संदर्भ: कृषि यंत्रीकरण पर उप-मिशन (SMAM) का पूरे देश में तेजी से विस्तार हो रहा है, जिससे किसानों की आधुनिक कृषि यंत्रों तक पहुँच बढ़ रही है और कृषि उत्पादकता तथा दक्षता में सुधार हो रहा है।

अन्य संबंधित जानकारी

  • इसकी शुरुआत के बाद से, SMAM समावेशी कृषि यंत्रीकरण को बढ़ावा देने के लिए एक प्रमुख हस्तक्षेप के रूप में उभरा है, विशेष रूप से लघु और सीमांत किसानों तथा अन्य वंचित समूहों में।
  • इस योजना ने कस्टम हायरिंग केंद्रों (CHCs), फार्म मशीनरी बैंकों (FMBs) और हाई-टेक हब के माध्यम से यंत्रीकरण अवसंरचना का महत्वपूर्ण विस्तार किया है, जिससे साझा आधार पर कृषि उपकरणों तक पहुँच में सुधार हुआ है।
  • योजना के तहत हालिया प्रयासों में भारतीय कृषि को आधुनिक बनाने के लिए ड्रोन-आधारित और परिशुद्ध कृषि तकनीकों को बढ़ावा देने पर भी ध्यान केंद्रित किया गया है।

कृषि यंत्रीकरण पर उप-मिशन (SMAM) के बारे में

  • वर्ष 2014–15 में शुरू किया गया, कृषि यंत्रीकरण पर उप-मिशन (SMAM) राष्ट्रीय कृषि विकास योजना (RKVY) के अंतर्गत एक केंद्र प्रायोजित योजना है।
    • अधिकांश राज्यों के लिए, वित्त पोषण का स्वरूप 60:40 है, जबकि पूर्वोत्तर और हिमालयी राज्यों के लिए यह 90:10 है। केंद्र शासित प्रदेशों को 100% केंद्रीय सहायता मिलती है।
  • यह देश भर में कृषि यंत्रीकरण को बढ़ावा देने का प्रयास करती है, विशेष रूप से उन किसानों के बीच जिनके पास आधुनिक कृषि मशीनरी और उपकरणों तक सीमित पहुँच है।
  • यह योजना यंत्रीकरण को किफायती, सुलभ और समावेशी बनाने के लिए “अंतिम व्यक्ति तक पहुँच” (Reach the unreached) के दृष्टिकोण के अनुरूप है।
    • कृषि यंत्रीकरण की पहुँच को बढ़ाना, विशेष रूप से लघु और सीमांत किसानों के बीच और उन क्षेत्रों में जहाँ कृषि शक्ति की उपलब्धता कम है।
    • आधुनिक मशीनरी को अपनाकर कृषि कार्यों की उत्पादकता, परिचालन दक्षता और समयबद्धता में सुधार करना।
    • फसल कटाई के बाद के प्रबंधन और संधारणीय कृषि को बढ़ावा देते हुए श्रमिकों के कष्टों और खेती की लागत को कम करना।

मुख्य कार्यक्षेत्र

  • कृषि यंत्रीकरण को बढ़ावा देना: आधुनिक कृषि प्रौद्योगिकियों को अपनाने में सुधार के लिए प्रशिक्षण, प्रदर्शनों, परीक्षण और फसल कटाई के बाद के यंत्रीकरण का समर्थन करना।
  • कृषि मशीनरी के लिए वित्तीय सहायता: मशीनरी खरीद के लिए प्रत्यक्ष लाभ हस्तांतरण (DBT) आधारित सब्सिडी प्रदान करना, जिसमें अनुसूचित जाति (SC)/अनुसूचित जनजाति (ST) के किसानों, लघु और सीमांत किसानों तथा पूर्वोत्तर के लाभार्थियों के लिए अधिक सहायता का प्रावधान है।
  • कस्टम हायरिंग केंद्र (CHCs) और फार्म मशीनरी बैंक (FMBs): संस्थागत मॉडलों के माध्यम से कृषि उपकरणों तक साझा पहुँच को सुविधाजनक बनाना, जिससे उन किसानों के लिए यंत्रीकरण किफायती हो सके जो व्यक्तिगत रूप से मशीनरी नहीं खरीद सकते।
  • हाई-टेक और उच्च-उत्पादकता उपकरण केंद्र (Hubs): परिशुद्ध और कुशल कृषि कार्यों के लिए उन्नत, उच्च-क्षमता वाली और फसल-विशिष्ट मशीनरी तक पहुँच को बढ़ावा देना।
  • पूर्वोत्तर क्षेत्र (NER) पर विशेष ध्यान: यंत्रीकरण संबंधी कमियों को दूर करने और पूर्वोत्तर में आधुनिक कृषि उपकरणों तक पहुँच में सुधार के लिए बढ़ी हुई वित्तीय सहायता और क्षेत्र-विशिष्ट हस्तक्षेप प्रदान करना।

SMAM के अंतर्गत प्रमुख उपलब्धियाँ

  • अपनी शुरुआत से लेकर अब तक, ₹9,404.47 करोड़ की केंद्रीय सहायता ने देश भर के किसानों को 21.61 लाख कृषि मशीनें वितरित करने में सहायता की है।
  • इस योजना के अंतर्गत 27,554 कस्टम हायरिंग केंद्र (CHCs), 25,608 फार्म मशीनरी बैंक (FMBs) और 646 हाई-टेक हब स्थापित किए गए हैं। साथ ही, व्यक्तिगत लाभार्थियों की संख्या 2.07 लाख (2020–21) से बढ़कर 2.32 लाख (2024–25) हो गई है।
  • कृषि ड्रोन को बढ़ावा देने के तहत, 40,918 हेक्टेयर क्षेत्र में 40,928 प्रदर्शन आयोजित किए गए हैं, जो परिशुद्ध कृषि को अपनाने में सहायक सिद्ध हो रहे हैं।

भारतीय कृषि में यंत्रीकरण की आवश्यकता

  • कृषि यंत्रीकरण का निम्न स्तर: भारत में कृषि यंत्रीकरण का स्तर लगभग 47–48% आंका गया है, जो यह दर्शाता है कि कृषि में उत्पादकता और दक्षता में सुधार की काफी संभावना है।
  • छोटी और खंडित जोत: 86% से अधिक परिचालन जोत लघु और सीमांत किसानों के पास होने के कारण, मशीनरी तक किफायती पहुँच सुनिश्चित करने के लिए कस्टम हायरिंग केंद्र (CHCs) और फार्म मशीनरी बैंक (FMBs) जैसे साझा-पहुँच मॉडल अनिवार्य हैं।
  • श्रमिकों की कमी और बढ़ती लागत: ग्रामीण क्षेत्रों में श्रमिकों की बढ़ती कमी और मजदूरी की बढ़ती लागत ने कृषि कार्यों को समय पर पूरा करने और शारीरिक श्रम पर निर्भरता कम करने के लिए यंत्रीकरण को महत्वपूर्ण बना दिया है।
  • परिशुद्ध और संधारणीय कृषि की आवश्यकता: कुशल आदान उपयोग, जलवायु-अनुकूल कृषि और फसल कटाई के बाद के नुकसान को कम करने के लिए ड्रोन और परिशुद्ध कृषि उपकरणों सहित आधुनिक मशीनरी को अपनाना आवश्यक हो गया है।

चुनौतियाँ

  • यंत्रीकरण में क्षेत्रीय विषमताएँ: यंत्रीकरण का स्तर राज्यों में असमान बना हुआ है; पूर्वी और पूर्वोत्तर क्षेत्र पंजाब और हरियाणा जैसे कृषि की दृष्टि से उन्नत राज्यों की तुलना में पीछे हैं।
  • सामर्थ्य और तकनीकी बाधाएँ: मशीनरी की उच्च लागत और सीमित तकनीकी क्षमता ड्रोन और परिशुद्ध कृषि उपकरणों जैसी उन्नत मशीनरी को अपनाने में बाधा उत्पन्न करती है।
  • अपर्याप्त सहायक अवसंरचना: मरम्मत सुविधाओं, कुशल ऑपरेटरों, विस्तार सेवाओं और फसल कटाई के बाद के यंत्रीकरण के बुनियादी ढांचे में अंतराल कृषि मशीनरी के प्रभावी और व्यापक उपयोग को सीमित करता है।

आगे की राह

  • साझा यंत्रीकरण अवसंरचना का विस्तार: आधुनिक मशीनरी तक किफायती पहुँच प्रदान करने के लिए, विशेष रूप से कम यंत्रीकरण स्तर वाले क्षेत्रों में, कस्टम हायरिंग केंद्रों (CHCs), फार्म मशीनरी बैंकों (FMBs) और हाई-टेक हब का दायरा बढ़ाना।
  • परिशुद्ध और डिजिटल कृषि को बढ़ावा: लक्षित प्रोत्साहनों और क्षमता निर्माण के माध्यम से ड्रोन, परिशुद्ध कृषि और अन्य उन्नत तकनीकों को प्रोत्साहित करना।
  • लघु और सीमांत किसानों के लिए समर्थन मजबूत करना: उन्नत उपकरणों को अधिक किफायती और सुलभ बनाने के लिए ऋण पहुँच, सब्सिडी वितरण और किसान उत्पादक संगठन (FPO) आधारित यंत्रीकरण मॉडलों को बेहतर बनाना।
  • क्षेत्रीय और क्षमता निर्माण अंतराल पर ध्यान: पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में यंत्रीकरण को प्राथमिकता देना, साथ ही संधारणीयता अपनाने के लिए प्रशिक्षण, रखरखाव सेवाओं और ग्रामीण तकनीकी सहायता प्रणालियों को सुदृढ़ करना।

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