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सामान्य अध्ययन-3: बुनियादी ढाँचा: ऊर्जा, बंदरगाह आदि।

संदर्भ: भारत ने भारत- कोरिया गणराज्य व्यापक फ्रेमवर्क ‘VOYAGES’ के तहत थूथुकुडी, तमिलनाडु में देश के पहले मेगा ग्रीनफील्ड शिपयार्ड के विकास के लिए एक ऐतिहासिक त्रिपक्षीय समझौता ज्ञापन (MoU) पर हस्ताक्षर किए।

अन्य संबंधित जानकारी

  • इस समझौते पर एचडी कोरिया शिपबिल्डिंग एंड ऑफशोर इंजीनियरिंग (HD KSOE), नेशनल शिपबिल्डिंग एंड हैवी इंडस्ट्रीज पार्क – तमिलनाडु (NSHIP-TN) और सागरमाला फाइनेंस कॉर्पोरेशन लिमिटेड (SMFCL) ने हस्ताक्षर किए हैं। SMFCL पत्तन, पोत परिवहन और जलमार्ग मंत्रालय के प्रशासनिक नियंत्रण में है।
  • इस परियोजना को भारत-कोरिया समुद्री सहयोग ढांचे “VOYAGES” (विजन फॉर ऑपरेशन ऑफ यार्ड एसिस्टेड ग्रोथ विद एफिशिएंसी एंड स्केल) के तहत विकसित किया जा रहा है, जो जहाज निर्माण, शिपिंग और समुद्री रसद (लॉजिस्टिक्स) में भारत और दक्षिण कोरिया के बीच गहरे होते रणनीतिक सहयोग को दर्शाता है।
  • यह परियोजना भारत के ‘मैरीटाइम अमृत काल विजन 2047’ (MAKV 2047) का हिस्सा है, जिसका लक्ष्य भारत को विश्व के शीर्ष पांच जहाज निर्माण देशों में शामिल करना है और इसका लक्ष्य 2047 तक प्रति वर्ष 4.5 मिलियन ग्रॉस टनेज (GT) जहाज निर्माण उत्पादन का है।

परियोजना की मुख्य विशेषताएँ

  • थूथुकुडी में प्रस्तावित मेगा ग्रीनफील्ड शिपयार्ड की वार्षिक जहाज निर्माण क्षमता 2.5 मिलियन ग्रॉस टनेज (GT) परिकल्पित की गई है, जो इसे भारत की सबसे बड़ी वाणिज्यिक जहाज निर्माण सुविधाओं में से एक और MAKV 2047 के वार्षिक 4.5 मिलियन GT जहाज निर्माण उत्पादन के लक्ष्य में एक प्रमुख योगदानकर्ता बनाती है।
  • इस परियोजना से सहायक उद्योगों, समुद्री इंजीनियरिंग आपूर्ति श्रृंखलाओं, रसद सेवाओं और समुद्री विनिर्माण इकोसिस्टम के विकास के माध्यम से लगभग 15,000 प्रत्यक्ष नौकरियों के साथ-साथ पर्याप्त अप्रत्यक्ष रोजगार के अवसरों का सृजन होने की अपेक्षा है।
  • प्रस्तावित मेगा शिपयार्ड को थूथुकुडी में NSHIP-TN द्वारा विकसित किए जा रहे थूथुकुडी शिपबिल्डिंग क्लस्टर की मुख्य सुविधा के रूप में विकसित किया जाएगा।

परियोजना का महत्व

  • भारत के समुद्री विनिर्माण इकोसिस्टम को सुदृढ़ करना: एक बड़े स्तर के एकीकृत जहाज निर्माण क्लस्टर का विकास घरेलू विनिर्माण, समुद्री उपकरणों के स्थानीयकरण और वैश्विक समुद्री मूल्य श्रृंखलाओं में भारत के एकीकरण को बढ़ावा दे सकता है।
  • रणनीतिक और आर्थिक लचीलेपन में वृद्धि: घरेलू जहाज निर्माण क्षमता का विस्तार विदेशी शिपयार्डों पर निर्भरता को कम कर सकता है, समुद्री रसद के लचीलेपन को मजबूत कर सकता है और हिंद-प्रशांत क्षेत्र में भारत की रणनीतिक स्थिति को मजबूत कर सकता है।
  • रोजगार और तटीय औद्योगीकरण को बढ़ावा: इस परियोजना से सागरमाला कार्यक्रम के तहत सहायक उद्योगों, रसद बुनियादी ढांचे, समुद्री सेवाओं और तटीय आर्थिक विकास को बढ़ावा देकर दक्षिण भारत में औद्योगीकरण को गति मिलने की उम्मीद है।
  • भारत-दक्षिण कोरिया रणनीतिक साझेदारी को प्रगाढ़ करना: यह परियोजना उन्नत विनिर्माण, समुद्री प्रौद्योगिकी, रसद और औद्योगिक बुनियादी ढांचे के विकास में भारत और दक्षिण कोरिया के बीच बढ़ते सहयोग को दर्शाती है।

भारत के जहाज निर्माण क्षेत्र का सिंहावलोकन

  • वैश्विक जहाज निर्माण बाजार में भारत की हिस्सेदारी 1% से भी कम है, जो चीन (47%), दक्षिण कोरिया (25%) और जापान (18%) से काफी पीछे है। ये देश उन्नत तकनीक और एकीकृत औद्योगिक इकोसिस्टम के माध्यम से इस क्षेत्र में अपना वर्चस्व बनाए हुए हैं।
  • अपनी सीमित वैश्विक हिस्सेदारी के बावजूद, भारत को पास महत्वपूर्ण समुद्री लाभ प्राप्त हैं:
    • 7,500 किलोमीटर से अधिक लंबी तटरेखा।
    • 13 प्रमुख बंदरगाह और 200 से अधिक गैर-प्रमुख (गौण) बंदरगाह।
    • देशभर में 30 से अधिक शिपयार्ड।
    • एक सुदृढ़ समुद्री कार्यबल, जिसमें भारत दुनिया के लगभग 10% नाविकों का योगदान देता है।
  • भारत के जहाज निर्माण उद्योग में तीव्र वृद्धि देखी जा रही है, जिसका उद्योग मूल्यांकन वर्ष 2022 के लगभग 90 मिलियन अमेरिकी डॉलर से बढ़कर वर्ष 2024 में लगभग 1.12 बिलियन अमेरिकी डॉलर हो गया है। वहीं, वर्ष 2024 में वैश्विक जहाज निर्माण बाजार का मूल्य लगभग 150 बिलियन अमेरिकी डॉलर था।
  • भारत विदेशी शिपिंग कंपनियों को प्रति वर्ष लगभग 75–90 बिलियन अमेरिकी डॉलर का माल ढुलाई शुल्क भी भुगतान करता है, जो घरेलू जहाज निर्माण और समुद्री रसद क्षमताओं को मजबूत करने के रणनीतिक महत्व को रेखांकित करता है।

SOURCES :
DD INDIA
PIB
IBEF

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