संबंधित पाठ्यक्रम
सामान्य अध्ययन-3: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण।
संदर्भ: प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ (IUCN) की रेड लिस्ट के अद्यतन प्रकृति संरक्षण के लिए अंतर्राष्ट्रीय संघ (IUCN) की लाल सूची के नवीनतम अद्यतन में एम्परर पेंगुइन (Aptenodytes forsteri) और अंटार्कटिक फर सील (Arctocephalus gazella) को ‘संकटग्रस्त’ श्रेणी में सम्मिलित किया गया है।
अन्य संबंधित जानकारी
• यह पुनर्वर्गीकरण उनकी पूर्ववर्ती संरक्षण स्थिति से महत्वपूर्ण बदलाव को चिन्हित करता है तथा अंटार्कटिका में जलवायु परिवर्तन के तीव्रता से बढ़ते प्रभावों को प्रतिबिंबित करता है।
• अंटार्कटिका ने तीन दशकों में लॉस एंजिल्स के क्षेत्रफल के दस गुना के बराबर बर्फ का आवरण खो दिया है, जिससे पारिस्थितिकी तंत्र व्यवधानों में तीव्रता आई है।
रेड लिस्ट अद्यतन के मुख्य बिंदु

• एम्परर पेंगुइन को ‘निकट संकटग्रस्त’ से ‘संकटग्रस्त’ श्रेणी में अपग्रेड किया गया है; अनुमान दर्शाते हैं कि वर्तमान तापन प्रवृत्तियों को देखते हुए इस शताब्दी के अंत तक इनकी आबादी में लगभग आधी गिरावट आ सकती है।
• अंटार्कटिक फर सील, जो पूर्व में ऐतिहासिक अति-शोषण से उबर चुकी थी, हाल के दशकों में उनकी आबादी में आई तीव्र गिरावट के कारण वे अब ‘कम चिंताजनक’ से ‘संकटग्रस्त’ श्रेणी में स्थानांतरित कर दी गई है।
• रेड लिस्ट का यह आकलन रेखांकित करता है कि प्रत्यक्ष मानवीय शोषण के बजाय जलवायु परिवर्तन, अंटार्कटिका में प्रजातियों की संख्या में कमी के प्राथमिक कारक के रूप में उभरा है।
• इन दोनों प्रजातियों को अब ‘प्रहरी प्रजाति’ (Sentinel species) माना जा रहा है, जिसका अर्थ है कि इनकी घटती आबादी व्यापक पारिस्थितिक व्यवधानों के प्रारंभिक संकेतक के रूप में कार्य करती है।
परिवर्तन के पीछे चालक
• समुद्री बर्फ के आवरण में तीव्र गिरावट: अंटार्कटिक समुद्री बर्फ में आई कमी ने प्रजनन आवासों को गंभीर रूप से प्रभावित किया है। चूँकि एम्परर पेंगुइन स्थिर बर्फ पर निर्भर होते हैं और समय से पूर्व बर्फ के टूटने से चूजों की मृत्यु दर बढ़ जाती है।
• खाद्य श्रृंखला में व्यवधान: महासागरीय तापन ने क्रिल की उपलब्धता को कम कर दिया है, जो दोनों प्रजातियों के लिए प्राथमिक खाद्य स्रोत है, जिससे उनके जीवित रहने और प्रजनन की सफलता प्रभावित हो रही है।
• चरम जलवायु घटनाओं में वृद्धि: चरम जलवायु घटनाओं में वृद्धि, जैसे कि बर्फ का अचानक टूटना और तापमान की विसंगतियाँ, ने प्रजनन स्थलों को अस्थिर कर दिया है और जीवन चक्र में व्यवधान उत्पन्न किया है।
• दीर्घकालिक आवास अनुपयुक्तता: इन परिवर्तनों के संयुक्त प्रभाव से अंटार्कटिक आवास निरंतर अनुपयुक्त बनते जा रहे हैं, जिससे प्रजातियों के दीर्घकालिक पुनरुद्धार की संभावनाएँ कम हो रही हैं।
वैश्विक शासन और अंटार्कटिका के लिए कानूनी फ्रेमवर्क
• अंटार्कटिक संधि प्रणाली (ATS): यह अंटार्कटिका के शासन का आधार है, जो सैन्य गतिविधियों को निषिद्ध करते हुए इस महाद्वीप को शांतिपूर्ण उद्देश्यों, वैज्ञानिक अनुसंधान और अंतर्राष्ट्रीय सहयोग के लिए नामित करती है।
• पर्यावरण संरक्षण पर प्रोटोकॉल (मैड्रिड प्रोटोकॉल, 1991): यह अंटार्कटिका को एक “प्राकृतिक रिज़र्व” घोषित करके, खनिज संसाधन दोहन पर प्रतिबंध लगाकर और पर्यावरणीय प्रभाव आकलन को अनिवार्य बनाकर उन्हें संरक्षण को बढ़ावा देती है।
• अंटार्कटिक समुद्री जीव संसाधन संरक्षण अभिसमय (CCAMLR, 1980): यह दक्षिण ध्रुवीय महासागर के मत्स्य पालन, विशेष रूप से क्रिल के प्रबंधन के लिए ‘पारिस्थितिकी तंत्र-आधारित दृष्टिकोण’ को अपनाता है, और पेंगुइन एवं फर सील जैसी आश्रित प्रजातियों के संरक्षण हेतु समुद्री संरक्षित क्षेत्रों को बढ़ावा देता है।
अंटार्कटिका का पारिस्थितिक महत्व
• वैश्विक जलवायु विनियमन में भूमिका: अंटार्कटिका एल्बेडो प्रभाव के माध्यम से पृथ्वी की जलवायु को विनियमित करता है, और घटता हुआ बर्फ आवरण भूमंडलीय तापन की दर को तीव्र करता है।
• महासागरीय परिसंचरण पर प्रभाव: यह वैश्विक महासागरीय परिसंचरण में प्रमुख भूमिका निभाता है, जो विश्व भर की जलवायु प्रणालियों और मौसम के पैटर्न को प्रभावित करता है।
• समुद्री जैव विविधता को समर्थन: यह क्षेत्र एक जटिल समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र को अक्षुण्ण रखता है, जहाँ प्रमुख प्रजातियों की संख्या में कमी पारिस्थितिक संतुलन को बाधित करती है।
• वैश्विक पारिस्थितिक स्वास्थ्य का संकेतक: अंटार्कटिक पारिस्थितिकी तंत्र में होने वाले परिवर्तन ग्रहीय स्तर पर व्यापक पर्यावरणीय गिरावट के प्रारंभिक चेतावनी संकेत के रूप में कार्य करते हैं।
SOURCES:
Downtoearth
IUCN
BAS
