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सामान्य अध्ययन-3: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन।

संदर्भ: ‘विश्व वायु गुणवत्ता रिपोर्ट 2025’ के अनुसार, भारत में PM2.5 का तीन वर्षों में सबसे निचला स्तर दर्ज किए जाने के बावजूद, यह विश्व के सबसे प्रदूषित देशों में से एक बना हुआ है।

रिपोर्ट के मुख्य बिंदु

वैश्विक प्रवृत्ति:

  • पाकिस्तान विश्व का सबसे प्रदूषित देश है, उसके बाद बांग्लादेश, ताजिकिस्तान, चाड और कांगो लोकतांत्रिक गणराज्य का स्थान है।
  • मध्य और दक्षिण एशिया विश्व का सबसे अधिक प्रभावित क्षेत्र बना हुआ है।
  • केवल 13 देशों/क्षेत्रों (जिनमें फ्रेंच पोलिनेशिया, प्यूर्टो रिको, आइसलैंड, ऑस्ट्रेलिया और एस्टोनिया शामिल हैं) ने विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के वार्षिक PM2.5 दिशा-निर्देशों का पालन किया।
  • वर्ष 2025 में विश्व के केवल 14% शहरों ने ही WHO के दिशानिर्देशों का पालन किया, जो कि 2024 के 17% की तुलना में कम है। वायु गुणवत्ता में इस गिरावट का आंशिक संबंध वनाग्नि और जलवायु परिवर्तन से है।

भारत-विशिष्ट निष्कर्ष:

  • भारत में पार्टिकुलेट मैटर (PM2.5) की सांद्रता तीन वर्षों के निचले स्तर पर रही, हालांकि यह अभी भी विश्व का छठा सबसे प्रदूषित देश है।
  • वर्ष 2023 में, भारत वैश्विक स्तर पर तीसरे स्थान पर था जिसके पहले केवल बांग्लादेश और पाकिस्तान का स्थान था जबकि 2024 में यह पांचवें स्थान पर था।
  • वर्ष 2025 में भारत का जनसंख्या-भारांक वार्षिक औसत PM2.5 सांद्रता 48.9 µg/m³ थी, जो 2024 (50.6 µg/m³) से 3% और 2023 (54.4 µg/m³) से 10% कम है; इसके बावजूद यह विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) के 5 µg/m³ के दिशा-निर्देश से लगभग 10 गुना अधिक है।
  • लोनी (उत्तर प्रदेश) को वैश्विक स्तर पर सबसे प्रदूषित शहर बताया गया है, जहाँ वार्षिक PM2.5 स्तर 112 µg/m³ से अधिक है, इसके ठीक बाद होतन (चीन) और बर्नीहाट (मेघालय) का स्थान है।
  • दिल्ली शीर्ष पांच सबसे प्रदूषित शहरों में शामिल है और वैश्विक स्तर पर सबसे प्रदूषित राजधानी बनी हुई है।
  • रिपोर्ट के अनुसार, वर्ष 2024 में विश्व के 100 सबसे प्रदूषित शहरों में से 74 भारत में थे।

पार्टिकुलेट मैटर के बारे में

  • यह हवा में निलंबित सूक्ष्म ठोस कणों और तरल बूंदों का एक जटिल मिश्रण है।
  • पार्टिकुलेट मैटर को उत्सर्जन और आकार दोनों के आधार पर वर्गीकृत किया गया है।
  • उत्सर्जन के आधार पर वर्गीकरण:
  • प्राथमिक पार्टिकुलेट मैटर: यदि पार्टिकुलेट मैटर सीधे अपने कण रूप में वायुमंडल में उत्सर्जित होता है, तो इसे प्राथमिक पार्टिकुलेट मैटर कहा जाता है। इसके उदाहरणों में हवा से उड़ने वाली धूल जैसे सड़क की धूल, फ्लाई ऐश, कालिख आदि शामिल हैं।
  • द्वितीयक पार्टिकुलेट मैटर: यदि पार्टिकुलेट मैटर वायुमंडल में रासायनिक अभिक्रियाओं द्वारा बनता है, तो इसे द्वितीयक पार्टिकुलेट मैटर कहा जाता है। इसके उदाहरणों में सल्फेट्स, नाइट्रेट्स आदि शामिल हैं।
  • आकार के आधार पर वर्गीकरण:
    • PM10: ऐसे कण जिनका व्यास 10 माइक्रोमीटर या उससे कम होता है। ये कण इतने सूक्ष्म होते हैं कि सांस के माध्यम से फेफड़ों में जा सकते हैं, लेकिन सामान्यतः नाक और गले द्वारा छान लिए फिल्टर हो जाते हैं।
    • PM2.5: अति सूक्ष्म कण जिनका व्यास 2.5 माइक्रोमीटर या उससे कम होता है। अतः, PM2.5 वास्तव में PM10 का ही एक उपवर्ग है। ये फेफड़ों में गहराई तक प्रवेश कर सकते हैं और यहाँ तक कि रक्तप्रवाह में भी मिल सकते हैं, जिससे ये स्वास्थ्य के लिए अत्यंत हानिकारक बन जाते हैं।
  • वार्षिक औसत PM2.5 के लिए विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) का दिशा-निर्देश 5 µg/m³ है, जबकि PM10 के लिए यह 15 µg/m³ है।

पार्टिकुलेट मैटर प्रदूषण के प्रभाव

  • स्वास्थ्य पर प्रभाव: यह श्वसन और हृदय संबंधी रोगों का कारण बनता है; PM2.5 फेफड़ों और रक्तप्रवाह में प्रवेश कर सकता है, जिससे अकाल मृत्यु होती है।
  • पर्यावरणीय प्रभाव: इसके कारण धुंध का निर्माण होता है, दृश्यता कम हो जाती है और फसलों तथा पारिस्थितिकी तंत्र को नुकसान पहुँचता है।
  • आर्थिक प्रभाव: इससे स्वास्थ्य देखभाल की लागत में वृद्धि होती है और श्रम उत्पादकता में कमी आती है।
  • सामाजिक प्रभाव: यह संवेदनशील समूहों (बच्चों, बुजुर्गों, गरीबों) को असमान रूप से प्रभावित करता है, जिससे असमानता और अधिक बढ़ती है।
  • शहरी जीवन सुगमता पर प्रभाव: यह शहरों में जीवन की गुणवत्ता को कम करता है, जिससे पर्यटन, प्रवासन पैटर्न और समग्र कल्याण प्रभावित होता है।

पार्टिकुलेट मैटर प्रदूषण को कम करने के लिए सरकार द्वारा की गईं पहल

  • राष्ट्रीय स्वच्छ वायु कार्यक्रम (NCAP): पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC) द्वारा जनवरी 2019 में शुरू किए गए इस कार्यक्रम का उद्देश्य राष्ट्रीय परिवेशी वायु गुणवत्ता मानकों (NAAQS) को पूरा करने में विफल  रहे 131 शहरों में वायु गुणवत्ता में सुधार लाना है। इसका लक्ष्य आधार वर्ष 2017 की तुलना में PM प्रदूषण में 40% तक की कमी लाना है।
  • राष्ट्रीय वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI): पर्यावरण, वन और जलवायु परिवर्तन मंत्रालय (MoEF&CC) द्वारा अक्टूबर 2014 में एक संख्या – एक रंग – एक विवरण के रूप में इसे लॉन्च किया गया था। यह आठ प्रदूषकों के जटिल वायु गुणवत्ता डेटा को आम लोगों तक प्रभावी ढंग से पहुँचाने के लिए एक एकल संख्या (सूचकांक मान), नामकरण और रंग में परिवर्तित करता है।
  • सिस्टम ऑफ एयर क्वालिटी एंड वेदर फॉरकास्टिंग एंड रिसर्च (SAFAR): पृथ्वी विज्ञान मंत्रालय द्वारा बड़े महानगरीय शहरों के लिए शुरू किया गया यह तंत्र, प्रदूषण-नियंत्रण कार्यों की अग्रिम योजना बनाने हेतु रियल टाइम वायु गुणवत्ता डेटा और 1-3 दिनों का पूर्वानुमान प्रदान करता है।
  • ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (GRAP): वर्ष 2017 से दिल्ली-NCR में लागू, GRAP एक आपातकालीन प्रतिक्रिया तंत्र है, जिसे प्रदूषण का स्तर निर्धारित सीमा को पार करने पर सक्रिय किया जाता है। यह वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) के स्तरों के आधार पर चरणबद्ध उपायों का निर्धारण करता है, जैसे कि डीजल जनरेटर, निर्माण कार्यों और ट्रकों के प्रवेश पर प्रतिबंध आदि।
  • वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM): अक्टूबर 2020 में एक संविधिक प्राधिकरण के रूप में गठित, CAQM दिल्ली-NCR और आसपास के क्षेत्रों में वायु गुणवत्ता प्रबंधन की योजना बनाने, समन्वय करने और पर्यवेक्षण के लिए उत्तरदायी है।
  • भारत स्टेज (BS) उत्सर्जन मानक: यूरोपीय उत्सर्जन मानकों के आधार पर तैयार, BS मानक वाहनों से होने वाले प्रदूषकों के उत्सर्जन को सीमित करते हैं। अप्रैल 2020 में, भारत ने BS5 मानकों को छोड़ दिया और सीधे BS6 को अपनाया, ताकि भारत के उत्सर्जन मानकों को वैश्विक मानदंडों के अनुरूप बनाया जा सके और PM तथा NOx (नाइट्रोजन ऑक्साइड) उत्सर्जन में भारी कटौती की जा सके।

Source:
Thehindu
Deccanherald

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