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सामान्य अध्ययन-2: भारत से संबंधित और/अथवा भारत के हितों को प्रभावित करने वाले द्विपक्षीय, क्षेत्रीय और वैश्विक समूह तथा करार|
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संदर्भ: हाल ही में भारत-इजरायल द्विपक्षीय निवेश समझौता (BIA) 4 जुलाई 2026 को लागू हुआ है। यह द्विपक्षीय निवेश संबंधों को मजबूत करने और निवेशकों के लिए एक सुरक्षित तथा पूर्वानुमानित निवेश वातावरण प्रदान करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है।
अन्य संबंधित जानकारी
- इस समझौते 8 सितंबर 2025 को नई दिल्ली में हस्ताक्षर किए गए थे और अब दोनों देशों द्वारा आवश्यक घरेलू प्रक्रियाओं को पूरा करने के बाद यह लागू हो गया है।
- यह समझौता 1996 में हस्ताक्षरित पिछली भारत-इजरायल निवेश संधि का स्थान लेगा, जिसे भारत ने 2017 में अपनी निवेश संधि व्यवस्था की समीक्षा के तहत समाप्त कर दिया था।
- इजरायल, भारत के 2016 के बाद के निवेश संधि ढांचे के तहत निवेश समझौता करने वाला पहला OECD सदस्य देश बन गया है।
- यह समझौता सरकारों के लिए वैध सार्वजनिक नीति के उद्देश्यों को पूरा करने हेतु पर्याप्त नीतिगत स्थान बनाए रखते हुए निवेश को बढ़ावा देने और उनकी सुरक्षा करने का प्रयास करता है।
भारत-इजराइल द्विपक्षीय निवेश समझौते के मुख्य बिंदु

- निवेश का परिभाषित दायरा: संधि का संरक्षण केवल उन निवेशों के लिए उपलब्ध है जिन्हें मेज़बान देश के कानूनों के अनुसार स्थापित या अधिग्रहित किया गया हो और जिनमें पूंजी की प्रतिबद्धता, लाभ या अर्जन की प्रत्याशा, और जोखिम उठाने जैसी विशेषताएं हों।
- राष्ट्रीय व्यवहार: प्रत्येक देश दूसरे पक्ष के निवेशकों और उनके निवेशों के साथ ‘समान परिस्थितियों’ में अपने स्वयं के निवेशकों और निवेशों के मुकाबले कम अनुकूल व्यवहार नहीं करेगा, जो कि संधि के प्रावधानों और अपवादों के अधीन होगा।
- अधिग्रहण के विरुद्ध सुरक्षा: निवेश को गैर-कानूनी अधिग्रहण से सुरक्षा प्रदान की गई है। कोई भी अधिग्रहण केवल सार्वजनिक उद्देश्य के लिए, कानून की उचित प्रक्रिया के तहत, गैर-भेदभावपूर्ण आधार पर और उचित मुआवजे के साथ ही किया जाना चाहिए।
- निधियों का निर्बाध हस्तांतरण: निवेशकों को निवेश से संबंधित धन, जिसमें पूंजी, रिटर्न, लाभांश, रॉयल्टी और परिसमापन से प्राप्त राशि शामिल है, को हस्तांतरित करने की अनुमति है, जो लागू कानूनों और निर्दिष्ट सुरक्षा उपायों के अधीन होगा।
- निवेशक-राज्य विवाद निपटान (Investor–State Dispute Settlement – ISDS): यह समझौता विवाद समाधान के लिए एक संरचित तंत्र प्रदान करता है। निवेशकों को सबसे पहले घरेलू कानूनी उपायों का पालन करना होगा। अंतर्राष्ट्रीय मध्यस्थताकेवल तभी शुरू की जा सकती है जब घरेलू कार्यवाही पूरी हो जाए या पांच वर्ष पूरे हो जाएं, जो भी पहले हो।
- कराधान सुरक्षा उपाय: इस समझौते में कराधान संबंधी व्यापक छूट शामिल है, जो निवेशक-राज्य मध्यस्थता के माध्यम से कराधान उपायों को चुनौती देने के दायरे को काफी हद तक सीमित करती है।
- राष्ट्रीय सुरक्षा अपवाद: दोनों देशों के पास राष्ट्रीय सुरक्षा और आवश्यक सुरक्षा हितों की रक्षा के लिए आवश्यक उपाय अपनाने का अधिकार सुरक्षित है।
- विनियमन का अधिकार: BIA स्पष्ट रूप से सरकारों के उस संप्रभु अधिकार को सुरक्षित रखता है जिसके तहत वे जनस्वास्थ्य, पर्यावरण संरक्षण और जन कल्याण जैसे वैध सार्वजनिक नीति उद्देश्यों को प्राप्त करने के लिए विनियमन कर सकती हैं।
समझौते का महत्व
- भारत-इजरायल आर्थिक संबंधों को सुदृढ़ बनाना: यह समझौता दीर्घकालिक द्विपक्षीय निवेश सहयोग और आर्थिक जुड़ाव को बढ़ावा देने के लिए एक आधुनिक संस्थागत ढांचा प्रदान करता है।
- निवेशक विश्वास को बढ़ावा देना: निवेश संरक्षण के स्पष्ट मानक और विवाद-समाधान तंत्र अनिश्चितता को कम करते हैं और निवेश के वातावरण की पूर्वानुमेयता में सुधार करते हैं।
- भारत के नए निवेश संधि ढांचे का प्रमाणीकरण: भारत के संशोधित ढांचे के तहत निवेश समझौते पर हस्ताक्षर करने वाले पहले OECD सदस्य देश के रूप में, इज़रायल की भागीदारी भारत के 2016 के बाद के संधि मॉडल की बढ़ती स्वीकार्यता को दर्शाती है।
- स्थिर सीमा-पार निवेश प्रवाह को बढ़ावा देना: निवेश की सुरक्षा करते हुए संप्रभु नियामक स्थान को संरक्षित रखकर, यह BIA द्विपक्षीय निवेश गतिविधियों को बढ़ाने और आर्थिक एकीकरण को गहरा करने में सहायक होने की अपेक्षा रखता है।
