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सामान्य अध्ययन-2: सरकारी नीतियाँ और विभिन्न क्षेत्रों में विकास के लिए हस्तक्षेप, उनके अभिकल्पन और कार्यान्वयन से संबंधित विषय’ संघीय ढाँचे से संबंधित मुद्दे और चुनौतियाँ।
सामान्य अध्ययन -3: संरक्षण, पर्यावरण प्रदूषण और क्षरण, पर्यावरण प्रभाव का आकलन; आपदा और आपदा प्रबंधन।
संदर्भ: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) द्वारा अंतरिक्ष पर्यावरण के वार्षिक मूल्यांकन के रूप में भारतीय अंतरिक्ष स्थितिजन्य जागरूकता रिपोर्ट 2025 (ISSAR 2025) जारी की गई है।
रिपोर्ट की मुख्य विशेषताएं
- रिकॉर्ड अंतरिक्ष गतिविधि: वर्ष 2025 में अंतरिक्ष युग की शुरुआत के बाद से अब तक की सबसे अधिक लॉन्चिंग देखी गई।
- कुल 328 प्रक्षेपण प्रयास किए गए, जिनमें से 315 सफल रहे। इनके माध्यम से 4198 ज्ञात परिचालन उपग्रहों को कक्षा में स्थापित किया गया।
- चंद्र अन्वेषण गतिविधियों में वृद्धि: वर्ष 2025 में चार चंद्र मिशन भेजे गए, जो चंद्रमा के अन्वेषण में नए सिरे से बढ़ती रुचि को दर्शाते हैं।
- ये सभी मिशन निजी कंपनियों द्वारा लॉन्च किए गए थे। इनमें ब्लू घोस्ट मिशन 1 ने चंद्रमा पर सफलतापूर्वक सॉफ्ट लैंडिंग करने वाला पहला निजी स्वामित्व वाला अंतरिक्ष यान बनकर इतिहास रच दिया।
- बढ़ता अंतरिक्ष संकुलन: विश्व स्तर पर लगभग 1.6 लाख ‘क्लोज-अप्रोच’ (निकट आने वाले) अलर्ट जारी किए गए, जिनमें भारतीय उपग्रहों के लिए बड़ी संख्या में अलर्ट शामिल थे। यह विशेष रूप से निम्न पृथ्वी कक्षा (LEO) में बढ़ते संकुलन का संकेत है।
- अंतरिक्ष मलबे का बढ़ता खतरा: निष्क्रिय उपग्रहों और विखंडन मलबे का संचय टकराव के जोखिम को बढ़ा रहा है, जिससे अंतरिक्ष मलबा अंतरिक्ष संचालन के लिए सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक बन गया है।
- निजी और वाणिज्यिक अंतरिक्ष गतिविधि का उदय: रिपोर्ट निजी संस्थाओं और वाणिज्यिक मिशनों की बढ़ती भूमिका पर प्रकाश डालती है, जिसमें चंद्र मिशन भी शामिल हैं। यह कक्षीय यातायात में वृद्धि में महत्वपूर्ण योगदान दे रहे हैं।
2025 के अंत तक भारतीय अंतरिक्ष परिदृश्य
- परिचालन उपग्रह: 2025 के अंत तक, भारत कुल 144 अंतरिक्ष यानों का संचालन कर रहा था, जिसमें सरकारी, निजी और शैक्षणिक-संस्थानों के उपग्रह शामिल थे।
- भारत सरकार के स्वामित्व वाले परिचालन उपग्रहों की संख्या निम्न पृथ्वी कक्षा (LEO) में 22 और भू-तुल्यकालिक पृथ्वी कक्षा (GEO) में 31 थी।
- प्रक्षेपण गतिविधियां: वर्ष 2025 में श्रीहरिकोटा से पाँच मिशन भेजे गए, जिनमें से चार अपनी निर्धारित कक्षाओं में पहुँचे। GSLV F15 के साथ भारत का ऐतिहासिक 100वाँ प्रक्षेपण संपन्न हुआ, जिसने श्रीहरिकोटा को एक प्रमुख दीर्घकालिक स्पेसपोर्ट के रूप में स्थापित किया।
- डीप स्पेस मिशन: इसके अतिरिक्त, भारत के दो गहरे अंतरिक्ष मिशन—चंद्रयान-2 ऑर्बिटर (CH2O) और सूर्य-पृथ्वी लैग्रेंज बिंदु पर स्थित आदित्य-L1—भी सक्रिय हैं।
- SpaDeX मिशन: पारंपरिक उपग्रहों से इतर, भारत ने SpaDeX मिशन के साथ कक्षीय प्रदर्शनों में प्रगति की। इसने स्वायत्त उपग्रह डॉकिंग और अनडॉकिंग का प्रदर्शन किया, जिससे भविष्य में इन-ऑर्बिट सर्विसिंग, तारामंडल प्रबंधन और मलबे को हटाने वाली प्रौद्योगिकियों का आधार तैयार हुआ।
- मानवयुक्त अंतरिक्ष मिशन: 2025 भारतीय अंतरिक्ष यात्री ग्रुप कैप्टन शुभांशु शुक्ला की ऐतिहासिक यात्रा का भी साक्षी बना, जिन्होंने ड्रैगन क्रू मॉड्यूल में ISS के लिए निजी Axiom 4 मिशन की कमान संभाली।
अंतरिक्ष स्थिरता बनाए रखने हेतु भारत के प्रयास
- संस्थागत तंत्र: इसरो ने अंतरिक्ष वस्तुओं की निगरानी, टक्कर के जोखिमों का आकलन करने और वैश्विक स्थिरता दिशानिर्देशों का अनुपालन सुनिश्चित करने के लिए एक समर्पित मंच के रूप में IS4OM (सुरक्षित और सतत अंतरिक्ष संचालन प्रबंधन हेतु इसरो प्रणाली) की स्थापना की है।
- स्वदेशी SSA क्षमताएं: भारत स्वदेशी अंतरिक्ष परिस्थिति संबंधी जागरूकता (SSA) क्षमताएं विकसित कर रहा है, जैसे प्रोजेक्ट नेत्रा। यह अंतरिक्ष मलबे की ट्रैकिंग और टक्कर के खतरों की भविष्यवाणी करने में सक्षम बनाता है, जिससे विदेशी डेटा पर निर्भरता कम होती है।
- मलबा शमन पहल: इसरो ने ‘मलबा मुक्त अंतरिक्ष मिशन (DFSM) 2030’ पहल शुरू की है, जिसके तहत 2030 तक सभी भारतीय अंतरिक्ष मिशनों से नए कक्षीय मलबे के निर्माण को समाप्त करने की प्रतिबद्धता व्यक्त की गई है।
- टक्कर परिहार और निगरानी: नियमित टक्कर परिहार युद्धाभ्यास (CAMs) और अंतरिक्ष वस्तुओं की निरंतर निगरानी भारतीय उपग्रहों को संभावित खतरों से बचाने में मदद करती है।
- अंतर्राष्ट्रीय सहयोग: भारत बाहरी अंतरिक्ष में जिम्मेदार व्यवहार को बढ़ावा देने के लिए अंतर-एजेंसी अंतरिक्ष मलबा समन्वय समिति (IADC) और IAA अंतरिक्ष मलबा समिति जैसे अंतर्राष्ट्रीय मंचों पर सक्रिय रूप से भाग लेता है।
